बहुत शौक था मुझे भी
बहुत शौक था मुझे भी
बहुत शौक था मुझे भी औरों की तरह
फिर इक दिन वह गलती भी कर बैठा
शाम का वक़्त और दरिया किनारा था
जिसकी उम्मीद ना थी वह गुनाह कर बैठा
देखा था उसने तिरछी निगाहों से मुझे
इस अदा को अपना नसीब समझ बैठा
मालूम ना था क्या होगा अंजाम उसका
अजनबी को दिल के करीब समझ बैठा
आंखों ही आंखों में बातें भी होने लगी
इसे पहले प्यार का इज़हार समझ बैठा
मुस्कुराकर फिर उसने पलकें जो गिराई
इस ज़िन्दगी से ख़ुद को फरार समझ बैठा
इसे बेवकूफी कहूँ या मेरा दीवानापन
खुद को संभाला मगर दिल पिघल बैठा
देखते ही देखते हवा में जुल्फ लहराई
जैसे आसमां से कोई बादल फिसल बैठा
चेहरे से हटाकर नकाब फेंक दिया उसने
चांद क्या देखा चांदनी रात समझ बैठा
रात के अंधेरे में जाने कहाँ गुम हो गई
शतरंज के खेल में इसे मात समझ बैठा।

