"बादल और पर्वत "
"बादल और पर्वत "
बादल घिर आये पर्वतों को चूमने लगे !
अपनी बाहों में उसको भरने लगे !
मिलन की प्यास वर्षों से लगी थी !
बस इंतजार करके यूँ आँखें तरसने लगी थी !
गर्म हवाओं के झोंके हमें
एक जगह टिकने नहीं देती थी !
हम इंतजार करते रहते थे
पर हमें मिलने नहीं देती थी !
आज हम पर्वतों से टकरा गए !
वर्षा की बूंदों में व्यथा सारे मिट गए !
हम मिले तो प्रकृति सारी खिल गयी !
अपने लोगों के मिलन से खुशियां सारी मिल गयीं !

