आदरणीय "StoryMirror "मंच को सादर प्रणाम के साथ अपनी स्वरचित मौलिक कविता सादर समर्पित
सार: कवि के लिए सच्चा सुख बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि अंतर्मन के खुलेपन, मौन, शांति, मधुरता और संतोष में बसता है। यह सादगी और आत्मिक शांति की कविता है।
दिनाँक: 10 मई 2026
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"अंतर्मन"
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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खुला आकाश
खुली हवाएँ
खुला मन
खुली दिशाएँ
खुला खुला सा सुहाना लगता है !
मौन रहना
मौन चलना
मौन सुनना
मौन साधना
मुझे सदा से ही अच्छा लगता है !
शांत परिवेश
शांत चित
शांत मन
शांत साधना
में रहना ही मुझे अच्छा लगता है !
मधुर संगीत
मधुर बोल
मधुर कल्पना
मधुर आभास
से मेरा मन सदा तृप्त होने लगता है !
वासंती हवा
वासंती महक
वासंती रंग
वासंती परिधान
देखकर हृदय बारबार उछलने लगता है !
छोटी ज़िंदगी
छोटी आशा
छोटी चाहतें
छोटी अभिलाषा
पाकर मुझे भी कुछ कुछ होने लगता है !
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका ,झारखंड
10.05.2026