"कृष्ण की होली "
"कृष्ण की होली "
आदरणीय “StoryMirror” मंच को प्रणाम करता हूँ और आज की स्वरचित मौलिक रचना सादर समर्पित करता हूँ !
संदर्भ :---यह ईश्वर और आत्मा के मिलन, भक्ति के माध्यम से एकाकार होने और सभी प्रकार के भेदों को मिटाकर प्रेम में लीन होने के दर्शन को प्रस्तुत करता है।
दिनाँक:--04 मार्च 2026
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“कृष्ण की होली”
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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उड़ेलो रंग मत कान्हा मैं उससे भींग जाऊँगी!
तुम्हारे रंग हैं कितने कहो कैसे हटाऊंगी !!
यही हैं रंग जीवन के सभी रंगों को डालूँगा !
इसी रंगों मैं तुमको तुम्हें सुंदर बनाऊँगा !!
चिढ़ाएगी मेरी सखियाँ कहेगी तुम कहाँ खेली !
मुझे भी साथ रखना था क्यूँ खेली कृष्ण से होली !!
सभी के दिल में बसता हूँ सभी के साथ मैं खेलूँ !
अभी तेरे साथ मैं रहकर तुझे सब रंग मैं दे दूँ !!
सभी के रंग अंतर हैं मिलन से ये चमकते हैं !
सजे हैं फूल रंगों से चमन खिलते ही रहते हैं !!
भिंगोलो तन बदन इसमें मिलन के गीत गाओ तुम !
यही अवसर हैं मिलने का विभेदों को मिटाओ तुम !!
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
4 मार्च 2026
