“सूरज की पहली किरण”
“सूरज की पहली किरण”
आदरणीय “StoryMirror ” मंच को अभिनंदन के साथ आज की मेरी स्वरचित मौलिक कविता सादर समर्पित !
संदर्भ:--- यह कविता एक ऐसी यात्रा को दर्शाती है जहाँ व्यक्ति गहरी निराशा से गुजरता है, लेकिन फिर भी आशा, परोपकार और मानवीय मूल्यों को बनाए रखता है, और एक छोटी सी उम्मीद (सूरज की किरण) के सहारे अपने और दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की इच्छा रखता है !
दिनाँक :-- 11 02 2026
“सूरज की पहली किरण”
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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भटक रहा हूँ
राह की तलाश में
चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है
अंबर पर बादल का डेरा है
छुप गए सारे
नक्षत्र के तारे
दिशाहीन हो गया हूँ मैं
बातें तो मेरे ज़हन आयी थीं
रास्ता मिल जाएगा
मंज़िल पाने का सपना
पूरा हो पाएगा
और मैं भूले -भटके
लोगों का पथप्रदर्शक बन जाऊंगा
उनके सपने सजाऊँगा
दुखों को सुखों में बदलना
थोड़ी अटपटी बातें लगतीं होंगी
पर उन्हें मरहम तो लगा सकता हूँ
बोल मीठे बोल सकता हूँ
ढाढ़स ,सांत्वना का मंत्र फूँक सकता हूँ
साथ मिलकर
कांधे से कांधा मिलाकर
एक नई दुनियाँ बसा सकता हूँ
बस एक सूरज की किरण की चाह है
उसी के प्रकाश से
अपने भाग्य का द्वार खोल सकता हूँ !
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका
