" मिथिलाक नारीक बदलल स्वरुप " (मैथिली )
" मिथिलाक नारीक बदलल स्वरुप " (मैथिली )
संदर्भ :-“मिथिलाक नारीक बदलल स्वरूप” कविता मे आधुनिक कालमे मिथिलामे नारीक स्थिति आ ओकर अधिकारक बात कयल गेल अछि । एहिमे नारी कोना आब अपन अधिकारक प्रति जागरूक भ' रहल छथि आ अपन सपना पूरा करबाक लेल आगू बढ़ि रहल छथि तकर वर्णन अछि ।
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" मिथिलाक नारीक बदलल स्वरुप "
(मैथिली )
डॉ लक्ष्मण झा “परिमल “
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आब मात्र कविता धरि
सीमित रहि गेल ,
" चलू प्रियतम
मेला चलू..
हम चूड़ी कीनब ,
हम लहठी कीनब ,
चन्द्रहार लेब
टिकुली ,अल्त्ता
नेल पोलिश लेब "!!
आब गामो मे ऑनलाइन
सब भेट जाइत अछि !
आहां खाली 'पे टियम'
सं पाई पठाऊ
घर बैसल
सब चीज द' जाइत अछि !!
आब हम सओउन मे
नोर अप्पन
किया बहायब ?
मधुमास ,होरी उत्सव मे
अप्पन अंग
किया जरायब ??
ऑनलाइन टिकट कटा
ए० सी ० मे बैइस कें
आहां लग पहुँचि
' धप्पा ' कहि देब !
मन जतय करत
कलकत्ता ..बोम्बॉय
घूमि लेब !!
मोबाइल लैपटॉप क
जमाना छैक ,
गेल जमाना जखन
मनी आर्डर
अबैत छल !
हमर चिठ्ठी डाकिया बाबू
घर ल' अबैत छल !!
आब ए० टी ० ऍम ०
हुनका सं
ल ' लेने छी !
पाईक खगताह लेल
ककरो नहि
मुँह तकैत छी !!
कवि कविता लिखैत रहथू
हम नहि अबला
नारी छी !
आब रणक्षेत्र ..आकाश ..आ ..समुद्र मे
गर्व सं झंडा
फहराबैत छी !!
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डॉ लक्ष्मण झा “परिमल “
