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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"स्वयंभू आफ़ताब"

"स्वयंभू आफ़ताब"

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आदरणीय “StoryMirror ”मंच को प्रणाम और स्वरचित मौलिक आज की कविता सादर समर्पित !

मूल भाव और विषय:

यह कविता आत्ममुग्धता और झूठी प्रशंसा पर करारा व्यंग्य है। कवि एक ऐसे व्यक्ति का चित्र खींचता है जो गाना नहीं जानता, फिर भी चापलूसों की भीड़ ने उसे 'आफ़ताब' यानी सूरज बना दिया है। अंत में उसे अपनी सीमाओं का बोध होता है। यह उन लोगों पर चोट है जो अपनी अक्षमता पहचानने के बजाय भ्रम में जीते हैं।

दिनाँक: 7 जून 2026

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“स्वयंभू आफ़ताब”डॉ॰लक्ष्मण झा ‘परिमल’================बताओ खुल के तुम मुझको,
हमें गाना नहीं आता।
न सुर है, ताल का संगम,
मज़ा बिल्कुल नहीं आता।नहीं मैं लय में रहता हूँ,
नहीं, संगीत को जानूँ।
कोई जो बात कहता है,
उसे हरगिज नहीं मानूँ।मेरे अपने मुझे सब लोग
प्रशंसा मेरी करते हैं।
समझ में सबको आता है,
नासमझ लोग बनते हैं।कोई भी गीत सुनता ना,
सभी लाजवाब कहते हैं।
मैं खुद को खुद नहीं समझा,
मुझे आफ़ताब कहते हैं।इसी भ्रम में ही रहकर मैं
सदा ही गीत गाता हूँ।
कोई रोके नहीं मुझको,
मैं सबके कान खाता हूँ।समझ मुझे देर से आई:
मैं खुद को गा नहीं सकता।
सुनूँगा अब से मैं गायन,
स्वयं मैं गा नहीं सकता!==================
डॉ॰ लक्ष्मण झा ‘परिमल’
दुमका
7 जून 2026 


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