"अधूरे संकल्पों की नींद "
"अधूरे संकल्पों की नींद "
आदरणीय “StoryMirror ”मंच प्रणाम और स्वरचित मौलिक कविता सादर समर्पित !
मूल भाव और विषय-वस्तु
कविता एक संवेदनशील, जागरूक व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व को पकड़ती है। शुरुआती पंक्तियाँ 'निश्चिंतता' का भ्रम रचती हैं — दिन में नींद आना मानो सब काम पूरे होने का संकेत हो। पर दूसरी ही साँस में वह भ्रम टूटता है। 'चौंककर आँख खुलना' कवि के सामाजिक दायित्व-बोध का प्रतीक है। यह सिर्फ व्यक्तिगत नींद की बात नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध बनाम विश्राम का संघर्ष है। जब तक समाज में कुरीति, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी, असहिष्णुता है, तब तक एक चेतन मन चैन से सो नहीं सकता। कविता का केंद्रबिंदु है: "व्यक्तिगत आराम सामाजिक जिम्मेदारी के आगे गौण है।"
दिनाँक:18 जून 2026
----------------------------
डॉ॰लक्ष्मण झा ‘परिमल’
=====================
आखिर मुझे
अक्सर दिन में
नींद क्यों आती है?
कहीं ऐसा तो नहीं,
सब कार्य संपन्न हो गया,
मैं निश्चिंत हो गया?
अब कोई काम नहीं,
आराम मुझे करना है।
पर मैं तो कुछ ही क्षणों
के बाद चौंक जाता हूँ,
आँखें खुल जाती हैं।
एहसास होता है —
काम तो अभी अधूरा है!
कविता को गढ़ना है,
लोगों तक अपनी बात पहुँचानी है।
कुरीतियों और अंधविश्वास पर
विजय पाना है।
शिक्षा की लौ से
इस जग को चमकाना है।
कुपोषण से बच्चे और माताएँ
मुक्त हों,
बेरोजगारी, असहिष्णुता
फिर न पनपे।
धर्म का सम्मान हो,
प्रजातंत्र की रक्षा हो।
इन विषयों पर
यदि हम लिखते जाएँगे
तो शायद ही हमें
दिन में नींद आएगी।
इन विषयों पर हमारी लेखनी
निरंतर कुछ कहती रहे
तो दिन की कौन कहे,
रातों को भी नींद नहीं आएगी!
================
डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका, झारखंड
18 जून 2026
