नमन StoryMirror"दैनिक सृजनविषय : हास्य व्यंग कविता विधा : मुक्तक घोषणा : मौलिक स्वरचित अप्रकाशित शीर्षक :"सुर -सम्राट गुरुदेव “
विश्लेषण : हर काल के 'जलसा-प्रेमी' गुरुदेवों पर लागू होती है। स्कूल में गाना गाने वाले गुरुदेव हों, या दफ्तर में कविता सुनाने वाले बॉस, या मंच पर भाषण ठोकने वाले नेता - हम सबने कभी न कभी मजबूरी में तालियाँ बजाई हैं।
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“सुर-सम्राट गुरुदेव”डॉ लक्ष्मण झा परिमल ============मेरे गुरुदेव कोगाना गाने का शौक था,जब भी स्कूल मेंकोई जलसा यासांस्कृतिक प्रोग्राम होता था,उनके गानों से सबआहत हुआ करते थे,पर वे श्रेष्ठ थे, वरिष्ठ थे,उनकी अवहेलनाभला कौन कर सकता था।वाद्य-यंत्र बनारस का रुख करता थाऔर गुरुदेव मगही रीति-लय कीतरफ निकल आते थे।ताल-लय में कभीनज़र नहीं आते थे,सब गायकों के गानेवे ही गाया करते थे।रफी के गानों कोआस्था चैनल के भजन कीतर्ज पर गाया करते थे।हम भागना चाहें तोभाग नहीं सकते थे,क्लास मॉनिटर की निगाहेंहम पर रहती थीं।गाने एक नहीं,दो-चार से कम नहींसुनने पड़ते थे।कमाल की बात यह भी थी किवे लता, आशाऔर अलका की आवाजों मेंभी गा लेते थे।"तुम्हीं मेरी मंदिर,तुम्हीं मेरी पूजा,तुम्हीं देवता हो"गाने लगे,सब छात्र-छात्राओं नेगाने के बाद तालियाँ बजाईंऔर पीछे सेदर्शकों और श्रोताओं ने'वाह-वाह! क्या बात है'कहकर शोर मचाया।प्रोग्राम खत्म होते हीलोगों ने गुरुदेव कोखूब प्रोत्साहित किया,पर उनकी बीवी नेउन्हें कह ही दिया -"अपनी आवाज़ को रिकॉर्ड कर लीजिएऔर खुद सुनकरनिर्णय कीजिएकि आप कितने पानी में हैं?"=====================डॉ० लक्ष्मण झा परिमल, दुमका 20 July 2026