“व्यंग्य का आईना"
“व्यंग्य का आईना"
प्रणाम StoryMirror दैनिक सृजन विधा :कविता मुक्तक शीर्षक : व्यंग का आईना घोषणा : मौलिक स्वरचित और अप्रकाशित “व्यंग्य का आईना"डॉ.लक्ष्मण झा ‘परिमल’==============पता नहीं लोगों नेव्यंग्य की विधाका आविष्कार हीक्यों किया,रहने देते साहित्यको श्रृंगार-रहित,जब आप व्यंग्य कोहृदय से स्वीकार हीनहीं करते हो।हम प्रशंसकों कोअपना बना के रखते हैं,वाहवाही का स्वाद लेते हैं,आप भी उन चापलूसों कोदरबारी कवि समझते हैं।व्यंग्य से पर वे ही तिलमिला जाते हैं,जो आस्तीनों में साँप छुपाए रखते हैं।कई तो व्यंग्यों से ही सुधर जाते हैं,आईना देख खुद ही निखर जाते हैं।हमें प्रशंसा-प्रस्तुतिस्वीकार है परहास्य-व्यंग्यसब बेकार है।व्यक्ति वही सर्वश्रेष्ठ होता है,जो व्यंग्य को भीगले लगाता है।==============- डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
