"मंच का नया गायक "
"मंच का नया गायक "
नमन:StoryMirror प्रस्तुति: दैनिक सृजन विधा: कविता हास्य-व्यंग्यशीर्षक: “मंच का नया गायक”घोषणा: स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
मूल स्वर : हास्य-व्यंग्य और आत्म-अवलोकन
यह कविता विशुद्ध रूप से हास्य-व्यंग्य की श्रेणी में आती है। यह किसी व्यक्ति, पद या संस्था पर सीधा प्रहार नहीं है, बल्कि आस-पास की दैनिक गतिविधियों, सार्वजनिक जीवन की विसंगतियों को देखकर उपजी एक स्वाभाविक साहित्यिक प्रतिक्रिया है! यह आत्मावलोकन के लिए संजीवनी है। मैं यहाँ दर्शक बनकर मंच को देख रहा हूँ और समाज के उस आम नागरिक की पीड़ा को स्वर दे रहा हूँ जो स्वयं को ‘ताली बजाने वाला यंत्र’ महसूस करता है। अतः इसे अन्यथा न लेकर, एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सजग नागरिक की चेतना के रूप में ग्रहण करना ही इसका साहित्यिक औचित्य है।
दिनांक: 3 सितम्बर 2026
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“मंच का नया गायक”डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’===================हर डाल पर एक उल्लू बैठा है,अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या कहिए?कहाँ-कहाँ से फूट पड़ी है,इस अव्यवस्था को क्या कहिए?व्यवस्थापक ही व्यवस्था को जब,अपने हाथों से चरमराता है,सबकी बागडोर फिर अनायास,उसी के हाथों में आ जाता है।मन किया तो फरमान आया,SIR का बिगुल बजवा दिया,मौका देख कर फिर उसी ने,ED का छापा भी लगवा दिया।यह तो अद्भुत नाट्य-मंच है,हम ही गायें, हम ही नाचेंगे,सुर-ताल का ज्ञान नहीं है फिर भी,हम ही गायक कहलायेंगे।कंठ में स्वर हो या न हो,क्या कोई फ़र्क पड़ता है,मंच तो अपना है ही यारो,मेडल पर हक मेरा रहता है।दर्शक झूमे या मुँह बिचकाये,ताली तो पिटवानी ही है,मीडिया पूछे या न पूछे,धूम तो मचानी ही है।करा लो तुम इम्तिहान सारे,सूची में मेरे ही लोग आयेंगे,जहाँ प्रश्न-पत्र सारे छपते हैं,वहाँ निशाँ मेरे पाये जायेंगे।हम तो यंत्र हैं सदियों पुराने,बस दर्शक, ताली बजाने वाले,आप भले कुछ भी सोचो,ऐसे ही हम बनते हैं दिलवाले।===================डॉ॰ लक्ष्मण झा ‘परिमल’दुमका ,झारखंड
