"गधा चला हीरो बनने "
"गधा चला हीरो बनने "
नमन:StoryMirrorप्रस्तुति: दैनिक रचना विधा: तीखी व्यंग्यात्मक कविता शीर्षक: “गधा चला हीरो बनने”
संदर्भ: यह केवल हास्य कविता नहीं, आत्मव्यंग्य है। 'गदहा' यहाँ मूर्खता का नहीं, उस ईमानदार रचनाकार का प्रतीक है जो साधना में पिछड़ जाता है। 'मेटा/सलमान' आधुनिक आभासी सफलता का प्रतीक है। कविता में दोहरा व्यंग्य है। पहला - समाज पर जो गुण नहीं, बल्कि रूप देखता है। दूसरा - स्वयं पर जो क्षणिक सफलता में अपनी कमी भूल जाता है।भाषा बोलचाल की, देशज शब्दों से भरी—'हेंचों-हेंचों', 'दुम दबाकर'—यही इसे लोक-कविता बनाती है। लय टूटी-फूटी नहीं, जानबूझकर हकलाहट की लय रखी गई है, जो पात्र के चरित्र को उभारती है। अंतिम पंक्ति "गदहा दुम दबाकर भाग गया" इसका निष्कर्ष है - तकनीक आपको मंच तक पहुँचा सकती है, पर मंच पर टिकना आपकी साधना ही सिखाएगी। फिल्टर चेहरा बदलता है, स्वर !
दिनांक:23 सितम्बर 2026
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“गधा चला हीरो बनने”डॉ . लक्ष्मण झा ‘परिमल’===============लोग मुझे गधा ही नहीं समझते थे,वे सब मुझे गदहा कहने लगे।क्या करूँ, मेरी सूरत ही ऐसी थी।कभी बोलता था तो मेरी आवाज हकलाने लगती थी,कभी तो सुनने वालों को हेंचों-हेंचों सुनाई देती थी।कभी लिखकर कोई लेख-कविता पोस्ट करना मुश्किल हो जाता था,लोग कम पढ़ते थे, मज़ाक अधिक बन जाता था।सबको मेरी रचना में मेरी पूँछ नज़र आती थी,कभी यदि गाने का रियाज़ करने लगा तोहेंचों-हेंचों की आवाज कानों में गूँज जाती थी।सब दूर मुझसे रहते थे,सब बेवकूफ गदहा कहते थे।पर सब गधे के दिन बदलते हैं,यह बात लोग सदियों से कहते हैं।मेटा ने मेरा रंग-रूप बदला,मुझे सलमान बना दिया,अब सब मुझे निहारने लगे,AI ने मुझे हीरो बना दिया।लोग जुड़ने लगे,हजारों मेरे फ्रेंड बनने लगे,मेरी लेखनी को सब पढ़ने लगे,कविताओं को अब सुनने लगे,मेरे तुतलाने को अब लोग अंदाज़ कहने लगे!पर यह पहचान सलमान की अधिक नहीं चली,कुछ दिनों के बाद मंच पर गाने लगा,हकलाना और हेंचों-हेंचों की आवाज छुपा न सका,राज़ खुल गया,गधा दुम दबाकर भाग गया।=====================- डॉ. लक्ष्मण झा "परिमल", दुमका, झारखंड
