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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"निरंकुश बनने का मज़ा "

"निरंकुश बनने का मज़ा "

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प्रणाम :StoryMirror प्रस्तुति: दैनिक संकलनविधा: आत्म-व्यंग्य कविताशीर्षक: “निरंकुश बनने का मज़ा”घोषणा: स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित


भूमिका: यह कविता व्यंग्य के रूप में लिखी गई है। इसमें बचपन से लेकर बड़े होने तक, मन में कहीं न कहीं सत्ता और नियंत्रण की जो आदत पलती है, उसी पर हल्के-फुल्के मगर तीखे अंदाज़ में कटाक्ष किया गया है। यह किसी दूसरे पर नहीं, बल्कि अपने ही स्वभाव पर हास्य के साथ सोचने का निमंत्रण है। अगर पढ़ते-पढ़ते मुस्कान भी आ जाए और थोड़ा आत्ममंथन भी, तो समझिए व्यंग्य अपना काम कर गया।

दिनांक: 9 अक्टूबर 2026

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“निरंकुश बनने का मज़ा”डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’===============बचपन में तो मैं कुछजानता नहीं था,वर्षा होती थी तोनंगे बदन निकल जाता था।हाथ में एक पतलीछड़ी होती थी,उसे मैं अपनी तलवारमानता था।छोटी-छोटी झाड़ियों कोमैं अपना दुश्मन समझता था,सबकी गर्दनों पर वार करकेअपने को विजयीमान लेता था।थोड़ा बड़ा हुआ,तो कक्षा में मुझे मॉनिटरबना दिया गया।यहाँ भी मैं अपने कोविजयी मानने लगा।कॉलेज में मुझकोNSS का लीडर बना दिया,आर्मी में भी मुझकोसेक्शन कमांडर बना दिया।मुझे भी निरंकुश बनने कीलत मानो लगने लगी।गिरगिट की तरह रंगमैं भी बदला करता था,ऊपर से प्रजातांत्रिक बनने काढोंग सदा रचा करता था।मैं भी हिटलर बनना चाहता था,पर लोगों के सामनेहर हाल में गांधी बनने कानाटक किया करता था।समय बदलता गया,छिहत्तर का हो चला हूँ,पर निरंकुशतामेरे ज़ेहन से नहीं उतरी।अब तो मैं साहित्यिकपरिवेश में उतर गया हूँ।किसी ने मुझे साहित्यिकसमूह का संचालक बना दिया!एक बार फिर सेचौथेपन मेंनिरंकुश बनने कामौका मुझे मिल गया।नियमावली के पुलिंदेसारे सदस्यों के हाथों मेंथमा दिए —“आप लिखते रहें,हम पढ़ते रहेंगे।अपने विचारों सेलोगों को तृप्त करते रहें।कवि-सम्मेलन, वीडियो प्रस्तुति,गायन हो या वादन —सब पर मेरा ही अधिकार!मंत्री कोई भी हो,उद्घाटन मैं ही करूँगा,न्यायाधीश भी मैं ही हूँ,फीता भी मैं ही काटूँगा!मुझे आए या न आए,मैं ही दूँगा सबको ज्ञान,क्योंकि मैं हूँ संचालक— और यही है मेरा फरमान!”चलो, अच्छा ही रहा —निरंकुशता को भी अंतरात्मा सेकभी निकाल न सका।बचपन से अब तकसाथ रही यह आदत मेरी —उम्र बढ़ती गई,मगर हुक्म चलाने का शौककभी बूढ़ा न हुआ!===============— डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’दुमका


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