" कवि सम्मेलन "
" कवि सम्मेलन "
प्रणाम :StoryMirror प्रस्तुति: दैनिक सृजनविधा : "कवि सम्मेलन" एक शुद्ध हास्य-व्यंग्य कविता है, आत्म-व्यंग्य के साथ।शीर्षक : "कवि सम्मेलन"घोषणा : स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित
संदर्भ :कवि सम्मेलन का आँखों देखा हाल
मित्रों, कलम की डायरी से एक पुरानी पर्ची मिली। कवि सम्मेलन बहुत जोर से चल रहा था, सूची में मेरा भी नाम था... फिर जो हुआ, वही इस कविता में है।
यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं, हर उस कवि की कहानी है जो अपनी बारी का इंतज़ार करता रह जाता है।
दिनांक: 6 अक्टूबर 2026
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“कवि सम्मेलन”डॉ . लक्ष्मण झा ‘परिमल’===============कवि सम्मेलनबहुत ज़ोर से चल रहा था,संचालक की सूचीमें मेरा भी नाम था।बहुत से कवि आए थे,कुछ लोग छूट गए थे,उनके भी नाम जोड़े जा रहे थे।संचालक थोड़ा कन्फ्यूज हो गया,किस क्रम में किसको बुलाऊँ,कुछ देर वह स्तब्ध रह गया।बीच-बीच में सिफ़ारिशआ जाती थी -इन्हें काम पर जाना है,कोई अपने बच्चों को घर छोड़करआए हैं, इनकी कविता पहलेकी उद्घोषणा कर दें।वैसे लोगों को एक हीकविता पढ़नी थी,पर एक बार मंच परचढ़ गए तो दो-दोकविताएँ पढ़कर ही छोड़ते थे।मंच, श्रोता सब वही रहेजिन्हें जिनकी बारीआनी थी।कई बार मेरे साथी नेसंचालक से कहा -'परिमल' को तो बुलाओ,पर संचालकभला क्या करता,सिफ़ारिशों की बड़ी लिस्ट थी।मेरा जब नम्बर आयातो सब दर्शक चले गए थे,बस टेंट वाले, माइक वालेऔर सामान इकट्ठाकरने वाले ही रह गए थे।घर जब देर से पहुँचा,श्रीमती जी परेशान हो रही थीं,आते ही कहा -“अब आप यदि कवि सम्मेलनमें जायेंगे तो मैं आत्महत्याकर लूँगी।”===============डॉ. लक्ष्मण झा परिमलदुमका,
