प्रणाम :StoryMirrorप्रस्तुति : दैनिक सृजन विधा : सामाजिक चेतना प्रधान मुक्तछंद मुक्तक कविता शीर्षक: "यह कैसी माँ की पूजा"सामाजिक संदेश:यह कविता आज के पलायन की कहानी है। गांव बूढ़े माँ-बाप से खाली हो रहे हैं, बच्चे शहरों में त्योहार मना रहे हैं। यह धर्म पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि धर्म के आचरण पर सवाल उठाती है - कि भक्ति अगर घर की माँ तक नहीं पहुँचती, तो वह कितनी सच्ची है?यह कविता जीवन-अनुभव से निकली हुई लगती है, इसीलिए इसमें इतनी सच्चाई है। यह पाठक को अपराध-बोध नहीं, आत्म-मंथन कराती है !
दिनांक : 21 अक्टूबर 2026 =================
"यह कैसी माँ की पूजा"
डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
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करोड़ों माओं की मूर्तियाँ
बनाई जाती हैं,
दुर्गा माता, काली माता,
शीतला माता, संतोषी माता
और भी अनगिनत
माओं की मूर्तियों
की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
कभी शारदीय पूजा,
कभी वासंती पूजा
के लिए मूर्तियाँ
बनाई जाती हैं।
दिन-रात उनकी पूजा
के लिए यज्ञ-अनुष्ठान
किए जाते हैं।
"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति"
और दुर्गा सप्तशती
मंत्र का जप होता है।
करोड़ों रुपये खर्च करके
पंडाल बनाए जाते हैं।
दांडिया का नाच भी
होता है मनोरंजन के लिए,
DJ की धुन पर
सब नाचते हैं।
पर गाँव में एक माँ
अकेली रहती है।
वृद्धा होने के बावजूद
घर-खलिहान की देखभाल
करती है और अपनी हथेली
को जलाती रहती है।
चार बच्चों की माँ
रहते हुए, इस माँ
को कोई देखने नहीं आता।
सब बच्चे शहरों के
पंडालों में घूम रहे हैं
और माओं की पूजा कर रहे हैं,
पर अपनी माँ अपने
बच्चों के लिए तरस रही है।
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डॉ. लक्ष्मण झा परिमल
दुमका, झारखंड