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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"हाथी के दाँत " (कविता )

"हाथी के दाँत " (कविता )

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नमन: StoryMirror प्रस्तुति: दैनिक रचना विधा: कविता आत्म-व्यंग्यघोषणा: स्वरचित मौलिक अप्रकाशित अंतर्निहित संदेशयह कविता किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, एक पूरी प्रवृत्ति पर व्यंग्य है —वरिष्ठता का आवरण ओढ़े हुए आत्म-प्रचार, पढ़े बिना पढ़वाने की इच्छा, लिखे बिना प्रशंसा पाने की लालसा। आपने "बरिष्ठ हूँ, खुद लिखने से बचता रहूँगा" कहकर साहित्यिक बिरादरी में पनप रहे उस वर्ग पर बहुत मीठी चोट की है जो वरिष्ठता को सृजन से बचने का बहाना बना लेता है।यह कविता आत्म-व्यंग्य होते हुए भी एक आईना है, जिसमें आज का अधिकांश सोशल मीडिया साहित्यकार अपना चेहरा देख सकता है।दिनांक:13 अक्टूबर 2026

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"हाथी के दाँत"
(व्यंग्यात्मक कविता)
डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
मैं अपनी
आकृति को विलक्षण बना
लेता हूँ
उम्र मेरी कुछ भी हो
पलक झपकते
जवान बन जाता हूँ
आयुर मेंहदी के रंगों से
बाल सुनहरे
दिखते हैं
दाँतों को खूबसूरत बनाके
खिलखिलाकर हँसते हैं
टाइट जींस का
जमाना अब आ गया है
डबल XXL को छोड़कर
XL का T-shirt मुझे भा गया है
लिबास तो क्षण-क्षण
में मैं बदला करता हूँ
जब जो मुझे अच्छा लगा
Meta से कहता रहता हूँ
मेरा प्रचार बड़ी द्रुत गति से
चारों दिशाओं में हो रहा है
अनेकों साहित्यिक रंगमंचों
से सान्निध्य मेरा हो रहा है
एक कविता को सभी मंचों
पर विनम्रता से पोस्ट करता रहता हूँ
सब कोई प्रशस्ति की मुझे माला पहनाए
यही मैं आशा किया करता हूँ
सुबह उठकर देखता हूँ
किसके-किसके नोटिफिकेशन आए
किस-किसने अपने मधुर बोलों से
मुझको आकर्षित कर पाये
बीच-बीच में मैं
एक विज्ञप्ति फेसबुक ग्रुप में जारी करता हूँ
"सब लोग सभी की रचनाओं को पढ़ें
यही मैं आशा करता हूँ
आप पढ़ेंगे नहीं
कमेंट करेंगे नहीं
तो लेखक की लेखनी का होगा क्या ?
ढाढ़स देंगे नहीं
प्रशस्ति लिखेंगे नहीं
तो लेखक के मनोबल का होगा क्या ?"
इस बात को मैं यदा-कदा
कहता रहूँगा
और वैसे तो मैं वरिष्ठ हूँ
खुद लिखने से मैं बचता रहूँगा !
मुझे कहाँ फुर्सत है
कि लोगों को मैं पढ़ता फिरूँ
हाथी के खाने के दाँत अलग हैं
आखिर किस-किस को दिखलाता फिरूँ ?
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डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका, झारखंड


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