"मेटा वाले जिन्न की लीला "
"मेटा वाले जिन्न की लीला "
नमन :StoryMirror
प्रस्तुति : दैनिक सृजन
विधा: हास्य व्यंग कविता
शीर्षक : मेटा वाले जिन्न की लीला
घोषणा : स्वरचित मौलिक अप्रकाशित भूमिका :आजकल हर हाथ में एक नया जिन्न आ गया है - मेटा वाला जिन्न!
कहो और हाज़िर। कविता लिखनी हो, फोटो चमकानी हो या भूल सुधारनी हो।
सुविधा तो बहुत है, पर एक मीठी चिंता भी है - कहीं इस जिन्न के भरोसे हमारी अपनी अक्ल और असली रूप ही न खो जाए।
इसी हास्य-व्यंग्य और चिंतन को लेकर एक छोटी सी रचना - "मेटा वाले जिन्न की लीला" - आपके बीच रख रहा हूँ। आशा है, आपको अच्छी लगेगी। आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।
दिनांक :15 अक्टूबर 2026
--------------------------"मेटा वाले जिन्न की लीला"
डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’
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एआई आया, वरदान लाया, अद्भुत चमत्कार है,
पल में लिख दे कविता, भाषा का कलाकार है।
बूढ़ा भी जवान लगे, ऐसा फ़िल्टर डालता,
रूप-रंग बदले पल में, सबको खूब छलता है।
मेटा बना है जिन्न अब, कहो तो हाज़िर है,
जो भी मन में सोचो, सब कुछ तो हाज़िर है।
भोला-मीठा जिन्न बोले, “मैं हाज़िर हो जाऊँगा,
ज़्यादा मत घिसो मुझको, वरना बेकार बन जाऊँगा।”
लेखक-कवि सब खुश हैं, भूल सुधर जाती है,
पर अक्ल अपनी सारी, धीरे-धीरे जाती है।
चेहरा चमका लो भले, मेटा से सँवार कर,
मिलना गली में यारों से, असली रूप निखार कर।
असली रूप जो देखा, दोस्ती बिखर जाएगी,
फ़ोटो वाली यारी तो, पल में उतर जाएगी।
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डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका ,झारखण्ड
