"ईगो "
"ईगो "
अभिनंदन :StoryMirror प्रस्तुति : दैनिक सृजन विधा :आत्मव्यंग्य कविता शीर्षक : "ईगो" घोषणा :स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
भूमिका : यह कविता 'ईगो' केवल एक शब्द नहीं, मनुष्य के भीतर पल रहे एक ऐसे भाव का आख्यान है, जो कभी उसे शिखर पर ले जाता है और कभी अकेला कर देता है। प्रशंसा की भीड़ में कब विनम्रता अहंकार में बदल जाती है, हमें पता ही नहीं चलता। मंच, मालाएँ और तालियाँ जब व्यक्ति को व्यक्ति से बड़ा बना देती हैं, तब आँखों पर चर्बी छा ही जाती है। यह कविता उसी आत्म-स्वीकृति की यात्रा है - जहाँ 'मैं' से उपजा अहंकार अंततः 'मैं' को ही आईना दिखाता है और मनुष्य को अपनी पहचान, अपनी चाल, अपनी आवाज़ तक बदलने पर विवश कर देता है। प्रस्तुत है इसी आत्म-मंथन की एक छोटी सी काव्य-प्रस्तुति - 'ईगो'
दिनांक : 23 अक्टूबर 2026
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