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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"ईगो "

"ईगो "

2 mins
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अभिनंदन :StoryMirror प्रस्तुति : दैनिक सृजन विधा :आत्मव्यंग्य कविता शीर्षक : "ईगो" घोषणा :स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 

भूमिका : यह कविता 'ईगो' केवल एक शब्द नहीं, मनुष्य के भीतर पल रहे एक ऐसे भाव का आख्यान है, जो कभी उसे शिखर पर ले जाता है और कभी अकेला कर देता है। प्रशंसा की भीड़ में कब विनम्रता अहंकार में बदल जाती है, हमें पता ही नहीं चलता। मंच, मालाएँ और तालियाँ जब व्यक्ति को व्यक्ति से बड़ा बना देती हैं, तब आँखों पर चर्बी छा ही जाती है। यह कविता उसी आत्म-स्वीकृति की यात्रा है - जहाँ 'मैं' से उपजा अहंकार अंततः 'मैं' को ही आईना दिखाता है और मनुष्य को अपनी पहचान, अपनी चाल, अपनी आवाज़ तक बदलने पर विवश कर देता है। प्रस्तुत है इसी आत्म-मंथन की एक छोटी सी काव्य-प्रस्तुति - 'ईगो'

दिनांक : 23 अक्टूबर 2026 

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"ईगो" 
डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
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लोग आजकल
मुझसे किनारा करने लगे हैं,
मेरी भंगिमाओं को देखकर
मुझे नज़रअंदाज़ करने लगे हैं।
पहले मेरी आरती उतारी जाती थी,
फूल-मालाओं से मेरी आकृति सजाई जाती थी,
लोग मुझे हरफ़नमौला कहते थकते न थे।
मंच पर जब कुछ बोलता था,
सब सुनकर तालियाँ बजाया करते थे,
मेरे बेसुरे गाने पर भी
तालियाँ बजाते थे।
क्या करूँ,
मैं भी मदमस्त हाथी की तरह चलने लगा,
आँखों पर चर्बी छाने लगी।
मैं किसी को पहचानने से
इनकार करने लगा,
अकर्मण्यता का लिहाफ़
ओढ़ने लगा।
धीरे-धीरे सब लोग
मुझसे दूर जाने लगे,
रंग बदला, रूप बदला,
लोगों को अपना बनाने के लिए
'आ' का सहारा लिया,
आवाज़ बदल डाली,
चाल बदल डाली।
कभी 'सदमा' फ़िल्म का
कमल हासन बना,
'मेरा नाम जोकर' के अंदाज़ में
लोगों को हँसाना चाहा।
जब कोई काम न आया,
तब अपनी पहचान
और हस्ती बदल डाली,
और फिर नई राहों पर
चलना स्वीकार किया।
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डॉ. लक्ष्मण झा परिमल
दुमका, झारखंड 


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