"बड़ी प्रशस्ति का बुरा अंजाम "
"बड़ी प्रशस्ति का बुरा अंजाम "
नमनStoryMirror
प्रस्तुति: दैनिक कृति
विधा: व्यंग कविता
शीर्षक: “बड़ी प्रशस्ति का बुरा अंजाम"
घोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित
भूमिका:आज का साहित्य अब किताबों में नहीं, व्हाट्सएप और फेसबुक के साहित्यिक ग्रुपों में बसता है। यहाँ रचना से बड़ा है—लाइक, कमेंट और प्रशस्ति का अर्थशास्त्र।
हर ग्रुप में एक अदृश्य संविधान चलता है - तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी। यहाँ एडमिन भगवान हैं, और 'वाह-वाह' ही प्रसाद है।प्रस्तुत कविता इसी नए साहित्यिक बाज़ार की व्यथा-कथा है, जहाँ एक सीधा-सादा रचनाकार दिल खोलकर बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखता है, पर बदले में उसे सिर्फ सन्नाटा और एक अंगूठे का निशान मिलता है। यह कविता उन सभी 'आउटगोइंग' लेखकों को समर्पित है, जिनका 'इनकमिंग' आजकल शिथिल पड़ा हुआ है।
दिनांक: 2 अक्टूबर 2026
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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अजब हो गया,
कल रात सपने में
मेरे साहित्यिक ग्रुप की
एडमिन से मुलाकात हो गई।
बोलीं - "परिमल जी, आप लिखते अच्छे हैं,
पर आप तो बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखते हैं,
दूसरों की रचनाओं को नज़रअंदाज़ करते हैं,
उन्हें भी आपकी चाह होती है।"
मैंने बात शिरोधार्य की,
और सुबह से ही लग गया लाइन में।
मैं बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखता हूँ,
पूरा समीक्षा-पुराण ही रच देता हूँ -
"आपकी लेखनी में भावों का सागर है,
शब्दों में जादू है, अद्भुत है, अपूर्व है!"
पर यहाँ तो मेरा ही
आउटगोइंग हो रहा था,
इनकमिंग का तो जैसे
नेटवर्क ही गायब था।
मेरी तीन पैराग्राफ की प्रशस्ति पर
उधर से एक अंगूठा आता है - 👍
और कभी-कभी तो वो भी नहीं।
अब मैं रोज सपने में
उसी एडमिन का इंतजार करता हूँ,
ताकि कह सकूँ -
"मैडम, मैं तो बड़ी-बड़ी प्रशस्ति लिखता हूँ,
पर यहाँ लेखक वो बड़े हैं,
संवाद करना शान के खिलाफ समझते हैं,
आभार के दो शब्द लिखने में
उनकी कलम को ही लकवा मार जाता है!"
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डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका ,झारखण्ड
