"व्यंग के वाण "
"व्यंग के वाण "
नमन:StoryMirror प्रस्तुति: दैनिक सृजन विधा: व्यंग्यात्मक कविता शीर्षक: “व्यंग्य के बाण”घोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित
संदर्भ: यह रचना व्यंग्य को हास-परिहास नहीं, बल्कि सत्ता के माथे पर पड़ता तीखा बाण मानती है।
यह बंद कमरों की नहीं, परिवेश की बदहाली से उपजा जागरूक कवि-धर्म है।
जहाँ महफ़िल हँसती है, पर तीर सीधा अकर्मण्य व्यवस्था के कलेजे में धँसता है।
कागज़ी विकास के मिथक को तोड़ती हुई, यह आईना दिखाने के लिए कबीर-धर्म का आधुनिक आह्वान है।
दिनांक: 11 सितम्बर 2026
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“व्यंग्य के बाण”डॉ॰ लक्ष्मण झा ‘परिमल’===============व्यंग्य का प्रतिबिम्ब तीखा और बाण होना चाहिए,दोषियों के वास्ते ये काल-सा कोहराम होना चाहिए।जब निशाने पर लगे और बिलबिला उठे ज़मीर उनका,तब समझिए आईना दिखाना सरेआम होना चाहिए।धुँधला, अस्पष्ट, डगमगाता जिसे अक्स दिखता है,उसका अपना ही कर्मपथ सियासत में बिकता है।जो छोड़ कर्तव्य अपना अकर्मण्य बन बैठे हैं,इतिहास के पन्नों में उनका पतन ही बस लिखता है।व्यंग्य का सृजन कभी भी सहज हो नहीं सकता,बंद कमरों में बैठकर कोई कवि रो नहीं सकता।इर्द-गिर्द बिखरे परिवेश से ही ये जन्मता है,देखकर बदहाली जो चैन से सो नहीं सकता।महफ़िल में सुन के बात सब खुलकर हँसते हैं,पर तीर उनके कलेजे में जाकर धँसते हैं।दोषी के सर पर जब पड़ता है व्यंग्य का हथौड़ा,तब जाके अकर्मण्य हुक्मरान फँसते हैं।ज़िद की हद देखिए, वो अपनी ही धुन में सड़ा रहता है,जनता भूखी मरे, पर वो 'इथेनॉल' पर अड़ा रहता है।सड़क की बदहाली पर ज़रा व्यंग्य करके तो देखो,कागज़ का वो विकास ज़मीन पर मरा पड़ा रहता है।आओ मिलकर व्यवस्था को आईना दिखा दें हम,नेताओं के झूठे दावों की लंका हिला दें हम।खोखली इस सियासत को जगाने की खातिर आज,व्यंग्य और हास्य के मिक्सर का घोल पिला दें हम।==================डॉ॰ लक्ष्मण झा ‘परिमल’दुमका ,झारखंड
