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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"प्रजातंत्र का स्वांग "

"प्रजातंत्र का स्वांग "

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जयहिंद:StoryMirror प्रस्तुति : दैनिक सृजन विधा : व्यंग्यात्मक और हास्य कविता सन्दर्भ : यह कविता व्यवस्था पर नहीं, उस मानसिकता पर है जो प्रजातंत्र का नारा तो लगाती है, पर चाहती है कि नियम सिर्फ दूसरों पर लागू हों।दिनांक :1 अक्टूबर 2026 -------------------------

"प्रजातंत्र का स्वांग"

डॉ लक्ष्मण झा परिमल 

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प्रजातंत्र की बात करने वाले

नारा तो बुलंद करते हैं

लोगों को प्रजातंत्र के

गुण गिनाते हैं

समान अवसर, सबके अधिकारों

की बात सदा करते हैं

प्रजातंत्र में कोई बड़ा-छोटा नहीं,

यह राग अलापते हैं

पर उनमें भी एक लालसा है

कि मैं भी एक बार

निरंकुशता का स्वाद तो चखूँ

मैं IAS बन गया,

अपने निठल्ले को भी IAS

बना डालूँ!

नियम-कायदे लोगों पर

ही लागू होने चाहिए

मुझे इन नियमों से क्या

हम सुपरपावर नहीं हैं

फिर भी टैरिफ लगाएंगे।

हमें गाना आता हो या नहीं

हम रोज़ सबको सुनाएँगे

इस निरंकुशता की परिधि में

किसी को आने नहीं देंगे।

दूसरे को अवसर

देना ही नहीं

उनकी बातों को कभी सुनना नहीं

दूसरे तो बंधे हैं नियमों में, वे कभी गा सकते नहीं।

आपको तो बस तालियाँ बजानी हैं

और प्रशस्ति के फूल बाँधने हैं,

क्योंकि आप सदियों से दलितों में गिने जाते हैं।

प्रजातंत्र की आड़ में

अपनी निरंकुशता की

खेती कर रहे हैं

कोई पीस रहा है तो पिसने दो

हम मौज कर रहे हैं॥

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- डॉ. लक्ष्मण झा परिमल

दुमका, झारखंड


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