" पक्षपात "
" पक्षपात "
अभिनंदन StoryMirrorप्रस्तुति: दैनिक सृजनविधा: व्यंग्यात्मक कविताघोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशितशीर्षक: 'पक्षपात'
भूमिका : 'पक्षपात' के संदर्भ में
प्रस्तुत रचना 'पक्षपात' लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक व्यंग्यात्मक दृष्टि है।
साहित्य में व्यंग्य की एक स्वतंत्र और प्रतिष्ठित विधा रही है। कबीर से लेकर हरिशंकर परसाई तक, व्यंग्यकार का धर्म ही रहा है - हँसते-हँसाते चोट करना और सोचने पर विवश करना।
व्यंग्य लिखने का मेरा मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को आहत करना कदापि नहीं है। व्यंग्य का प्रयोजन केवल इतना है कि पाठक उसका रसास्वादन कर आनंदित हों, और साथ ही उसमें निहित नसीहत को ग्रहण करें।
यह स्वाभाविक है कि व्यंग्य से कभी-कभी कुछ लोगों को ठेस पहुँच सकती है, परन्तु मेरी यह रचना केवल मनोरंजन और साहित्यिक अभिव्यक्ति की दृष्टि से कही गई है। यदि इस बहाने कुछ लोगों को आत्म-अवलोकन और आत्म-चिंतन का अवसर मिल सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक समझूँगा।
व्यंग्यात्मक कविता भी साहित्य की एक गंभीर विधा है। मेरा विनम्र निवेदन है कि इसे इसी रूप में स्वीकार किया जाए।
- डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल', दुमका
दिनांक: 19 सितम्बर 2026
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"पक्षपात"
डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
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कहने को लोकतंत्र है, हम सब स्वतंत्र हैं,
पर मानसिकता वही, हम कितने परतंत्र हैं!संविधान की बातें हैं, समता की सौगातें हैं,
मंच से जो कहते हैं, वो केवल बातें हैं। टेंडर निकलता है, नारा लगता है -
आओ, सब भाग लो!
पर भीतर ही भीतर सब तय होता है,
अपनों का ही भाग्य यहाँ जगता है। मंच हमारा है, माइक हमारा है,
गाने वाला भी अपने घर का ही सितारा है। आज मैं गाऊँगा,
कल पत्नी मेरी गाएगी,
फिर बेटा गाएगा,
फिर बिटिया सुर सजाएगी।सुर लगे न लगे, ताल टूटे या जुड़े,
तुम्हें तो सुनना है, तुमने ही तो चुना है,
ईवीएम की उंगली से तुमने जिसे बुना है,
उसी के गीत पर तुम्हें वाह-वाह करना है!
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डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल', दुमका
