STORYMIRROR

Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

4  

Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

“कवि खटरखंजरी जी का ऑनलाइन पदार्पण"

“कवि खटरखंजरी जी का ऑनलाइन पदार्पण"

2 mins
3

प्रणाम StoryMirror 

सृजन: दैनिक

विधा: हास्य-व्यंग्य कविता /आत्मपरक प्रहसन 

शीर्षक: "कवि खटरखंजरी जी का ऑनलाइन पदार्पण"

घोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित

विश्लेषण :यह कविता ऑनलाइन साहित्यिक मंचों की औपचारिकताओं और तकनीकी विडंबनाओं पर एक मीठा प्रहार है, जहाँ 'उपस्थिति' कविता से बड़ी हो गई है।अंत में चाय की प्याली ही सच्ची कविता बन जाती है — जो बताता है कि साहित्य मंच पर नहीं, जीवन के छोटे आत्मीय कोनों में जीवित है !

दिनाँक:4 अगस्त 2026

———————————

"कवि खटरखंजरी जी का ऑनलाइन पदार्पण"

(हास्य-व्यंग्य कविता /आत्मपरक प्रहसन)

डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'

=======================

पहले राजा का फरमान, ढोलों से था पढ़ा जाता,

फिर माइक-लाउडस्पीकर, गली-गली था गड़गड़ाता।

अब बदला है ज़माना, बदला है अंदाज़ सारा,

हैशटैग और @everyone ने, ले लिया ढोल नगाड़ा।बोले हैलो-टैग वाले, सुनो-सुनो भाई सुनो,

शनिवार ठीक आठ बजे, जुड़ जाना सब जनो।

आ रहे हैं मंच पर, कवि खटरखंजरी महान,

बहुत मनाया तब जाकर, दिया है थोड़ा-सा ध्यान।बोले - आना सभी को है, काव्य-रस बरसाएँगे,

पर हाज़िरी ज़रूर लिखना, तभी मान पाएँगे।

मैंने भी घर में जाकर, ऐलान कर दिया था,

आठ से नौ साधना है, साहित्य वरण किया था।आशा हँस कर बोली, जाइए साधना रमाइए,

मैं Indian Idol देखूँगी, मुझे मत बहकाइए।

और हाँ सुनो, चाय की, आस नहीं लगाइए,

अपने कवि जी से ही, चुस्की माँग के लाइए।शनिवार आया, लैपटॉप खोले हम बैठे,

आठ बजते ही स्क्रीन पर, खटरखंजरी जी ऐंठे।

पंद्रह मिनट तक केवल, गिनती ही गिनते रहे,

कौन आया, कौन छूटा, हाज़िरी बिनते रहे।सोचा लिख दूँ बधाई के, दो मीठे बोल प्यारे,

पर कमेंट बॉक्स बोला, तुम हो कौन हमारे?

लाल अक्षरों में लिख कर, नोटिस चमका था,

"आप मेंबर नहीं हैं" कह के, वो धमका था।कविता जैसी-तैसी थी, पर अदाएँ थीं न्यारी,

तुतलाहट की लय पर, चलती थी कवितारी।

सावन को 'सा-सा-सावन', प्रेम में अटक जाते,

बादल को 'ब-ब-बादल', कविता को 'क-क-कविता' बतियाते।न लय थी, न सुर था, न कोई रस-सार था,

शीर्षक कुछ और था, पाठ कुछ और बेकार था।

न हँसा पाए सबको, न रुला पाए प्यारे,

न मंच संभल पाया, न दिल तक जा पाए सारे।धीरे से लैपटॉप बंद किया, मन में बात समाई,

आशा से बोला - चलो, चाय ही पिलाई जाए भाई।

ये ऑनलाइन कविता का, गतिरोध हो गया भारी,

असली कविता तो बसी है, इस प्याली में ही सारी।

==================

डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'

दुमका झारखंड


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Comedy