नमनStoryMirror दैनिक सृजन विधा :हास्य -व्यंग कविता घोषणा :मौलिक ,स्वरचित और अप्रकाशित शीर्षक :"झींगुर जी का हिसाब"
सन्दर्भ :आत्मसम्मान बनाम अपमान का हास्य: दरवाजे के नीचे से फेंका कार्ड और गलत नाम छापना मेज़बान की लापरवाही थी, जिसका जवाब झींगुर जी ने "जैसा भोज, वैसा उपहार" वाली कूटनीति से देकर बुजुर्गी की चिढ़ को चतुराई में बदल दिया।अनुभव-जनित व्यंग्य का हास्य: बुफे की लाइन और ठंडे व्यंजनों को देखकर 501 की जगह 151 वाला लिफाफा निकालना, झींगुर जी के "पिछली बार भूखे लौटे" वाले तजुर्बे और मध्यवर्गीय हिसाब-किताब पर करारा व्यंग्य है।
दिनाँक :16 जुलाई 2026
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"झींगुर जी का हिसाब"
(हास्य- व्यंग)
डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'
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उम्र हो चली सत्तर पार,
घुटनों में अब वो धार कहाँ?
झींगुर जी बोले बार-बार,
"लाइन में लगना अधिकार कहाँ?
बुफे का युद्ध, धक्का-मुक्की,
पत्तल पकड़ो, पूड़ी ढूँढो,
बुजुर्ग हूँ मैं, शान का भूखा,
रसगुल्ले को लाइन में क्यों सूँघो?"
कल सुबह जो कार्ड आया,
दरवाजे के नीचे से सरक कर,
न घंटी बजी, न 'राम-राम' हुआ,
बस कागज़ का टुकड़ा धमक कर।
खोल कर देखा, खून खौला,
"डॉ. झींगुरु" लिखा था साफ़,
बोले — "नाम की इज़्ज़त न कर सके,
तो गिफ्ट भी होगा आधा-हाफ़!"
पत्नी बोली, "जाना पड़ेगा,
बुजुर्ग हो तुम मोहल्ले के,
न जाओगे तो लोग कहेंगे,
ऐंठ बहुत है इनके छल्ले में!"
निकले झींगुर जी बन के नेता,
कुरते में दो नीतियाँ रख कर,
बाएँ जेब में 501 की शान,
दाएँ जेब में 151 का डर।
हॉल में घुसे, मुआयना किया,
पनीर रूखा, नान थी ठंडी,
बुफे की लाइन साँप सी लम्बी,
और मिठाई पर मक्खी मंडी।
मुस्कुराए झींगुर, बोले मन में,
"अपमान का ब्याज चुकाऊँगा,
नाम बिगाड़ा तुमने मेरा,
मैं लिफाफा घटाऊँगा!"
झट 151 वाला निकाला,
डाल दिया कन्यादान में,
रजिस्टर पे लिखा — "डॉ. झींगुरु",
और बुदबुदाए अभिमान में —
"जैसा कार्ड, वैसा व्यवहार,
जैसा भोज, वैसा उपहार!"
घर लौटे तो पत्नी पूछे,
"कैसा रहा जलसा जी?"
बोले झींगुर जी जेब टटोल,
"501 बच गया, समझो फ्री!
नाम जो बिगाड़ोगे अगली बार,
तो खाली हाथ ही लौटोगे यार!"
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका, झारखंड