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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Inspirational

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Inspirational

"लेखनी का तप "

"लेखनी का तप "

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नमन"StoryMirror "

दैनिक सृजन

विधा: कविता

शीर्षक: "लेखनी का तप"

दिनाँक: 13 जुलाई 2026

कविता का मर्म है — प्रशंसा प्रसाद हैभोजन नहीं; लेखक का धर्म साधना हैयाचना नहीं। सृजन तपस्या हैसम्मान उसका प्रसाद हो सकता हैपर लक्ष्य नहीं। लेखक को अनासक्त होकर लिखते जाना चाहिएजैसे नदी बहती है सागर से मिलने की अपेक्षा किए बिना।

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"लेखनी का तप"

डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’
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लेखनी याचना का पात्र नहीं,
यह सृजन का अखंड तप है।
झोली पसारना धर्म नहीं इसका,
यह तो स्वयमेव वरदान का शिल्प है।

प्रशस्तिसम्मानपुरस्कार —
यदि पथ में स्वतः आ गिरें,
तो कृतज्ञ हृदय से स्वीकारो,
पर पलक-पाँवड़े कभी न बिछाओ।

'प्रतिदानकी प्रतीक्षा में
कलम को भिक्षुक न बनाओ।
सृजन का धर्म माँगना नहीं,
जलना हैप्रकाश बाँटना है।

देखो 'रश्मिरथीके दिनकर को —
क्या कभी याचना में झुके?
'साकेतके मैथिलीशरण,
'मधुशालाके हरिवंश —
क्या प्रशंसा के द्वार खटखटाए?

नहीं।
उनकी लेखनी ने स्वयं
अपना आकाश रचा,
अपना मार्ग प्रशस्त किया।
शब्द जब तप से तपते हैं,
तो संसार स्वयं नतमस्तक होता है।

सो तुम लिखो — मौनअडिगअनासक्त।
यश आए तो आशीष मान लेना,
न आए तो भी रचना का धर्म न छोड़ना।
यही लेखक की मर्यादा है,
यही सृजन का शाश्वत पंथ है।

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— डॉ. लक्ष्मण झा ‘परिमल’
दुमका

 


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