नमन"StoryMirror "दैनिक सृजन घोषणा : स्वरचित मौलिक अप्रकाशित विधा : हास्य व्यंग कविता शीर्षक : "गर्ग जी का 'मिस्ड कॉल' मंत्र"
संदर्भ :यह कविता STD बूथ युग की नॉस्टैल्जिया और देसी जुगाड़ के ज़रिए रिश्तों की गर्माहट को हास्य-व्यंग्य में लपेटकर 'मिस्ड कॉल' संस्कृति के जनक, कंजूसी के कलाकार, गर्ग जी के कोडवर्ड से बयां करती है।
दिनाँक :5 जुलाई 2026
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"गर्ग जी का 'मिस्ड कॉल' मंत्र"
(हास्य व्यंग)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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सन् बाइस सौ दो की बात है,
लैंडलाइन का ही राज था,
गली-गली, हर दुकान से सटा,
एक STD बूथ का ताज था।
लंबी-लंबी कतारें लगतीं,
इंतज़ार के पल भारी थे,
सिक्के मुट्ठी में भींचे सब,
रिश्तों के व्यापारी थे।
सितंबर में किस्मत लाई,
पेंशन की फ़ाइल लखनऊ,
महीना भर मेस में कटना था,
और मिल गए यार बेशुमारू।
तीस बरस बाद मिले जो साथी,
मानो सूखे बाग में सावन,
खुशियों के फूल यूं खिले,
जैसे लौट आया हो बचपन।
लखनऊ कैंट के बीचों-बीच,
तोपखाना बाज़ार पुराना,
ज़रूरत का हर सामान मिले,
जेब का दुश्मन, दिल का ठिकाना।
शाम ढले जब आठ बजते,
दोस्तों की टोली निकल पड़ती,
दस बजे तक भी खुली रहतीं,
STD बूथ की दुकानें सजतीं।
एक-एक कर सब बातें करते,
माँ से, बीवी से, यारों से,
मीटर देख पसीना आता,
10, 20, 40 के भारों से।
फिर लौटते मेस की ओर,
एक-दो घंटे बाद ही सही,
जेब हल्की, पर दिल भरा,
बातों की खनक साथ रही।
पर टोली में एक गर्ग था,
अशोक कुमार, कमाल-ए-फ़न,
फ़ोन रोज़ करता था शाम को,
पर बिल के वक़्त बनता अनजान।
मेरा प्रिय, मेरा हमसाया,
एक दिन उसने राज बताया,
"दिल का भेद बहुत गहरा है,
सुनो ज़रा, क्या जुगाड़ लगाया?
बच्चे मेरे रहते पुणे,
उनको कोड सिखा रखा है,
तीन रिंग पे काट दूँ फ़ोन,
तो समझो 'सब कुशल' लिखा है।
ज़रूरी हो तो दो रिंग में,
फ़ौरन फ़ोन उठा लेना,
बातें करनी हों जितनी,
जी भर के कर लेना।
वरना तुम भी समझ जाना,
हम यहाँ ठाठ से जीते हैं,
तुम भी वहाँ मौज मनाओ,
रिंग में ही रिश्ते होते हैं।"
सुनकर मैं आवाक रह गया,
पर राज़ जुबां पे ताला था,
अब तो बीत गईं बातें सब,
पर खुल गया कंजूसी का प्याला!
जुड़ते थे रिश्ते रिंग से तब,
अब 'सीन' हो तो समझो बात,
वो STD की कतारें क्या,
वो 'मिस्ड कॉल' वाली सौगात!
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका उप राजधानी
झारखंड