“पाठक बनने चला था, 'अनदेखा' बनकर लौटा” (हास्य-व्यंग)
“पाठक बनने चला था, 'अनदेखा' बनकर लौटा” (हास्य-व्यंग)
नमन "StoryMirror "प्रस्तुति:दैनिक सृजनविधा: व्यंग्य कविता / लघु हास्य-व्यंग्यशीर्षक: "पाठक बनने चला था, 'अनदेखा' बनकर लौटा"घोषणा: मौलिक स्वरचित और अप्रकाशित
केंद्रीय भाव: "एकतरफा साहित्यिक संवाद का दर्द"। कवि कह रहा है — मैं सबको पढ़ता हूँ, सराहता हूँ, प्रतिक्रिया देता हूँ, पर जब मैं दूसरों को सराहता हूँ तो बदले में 'सन्नाटा' मिलता है।
दिनाँक:10 जुलाई 2026
-------------------------------
"पाठक बनने चला था, 'अनदेखा' बनकर लौटा"(हास्य-व्यंग)
डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल'
=================
वैसे तो मेरे सामनेकिसी की भी प्रशस्ति आ जाए,
कोई अपने उद्गारों केबंदनवारों से मेरी ग्रीवा को चमकाए,
मैं आभार देने में कभीकंजूसी करता नहीं हूँ।
प्रशस्ति, प्रशंसा और उद्गार के दो शब्दों का जवाब देता ही हूँ।मैं भी अपनी साहित्यिकसमालोचना करता हूँ,
उनकी भी लेखनी कोयदा-कदा पढ़ता भी हूँ।
पर ख्याल आया उद्घोषणाओं का—
"आप भी पढ़ें दूसरों के लेख,संस्मरण, कहानियाँ और कविताएँ।
सिर्फ आपकी लेखनी को ही लोग पढ़ेंगे और आपको ही सराहेंगे— ऐसा नहीं है।
लेखक बनना हो तोपाठक भी बनना सीख लो,
पढ़ो और उनको भी सराहो।"बात तो पते की थी,मेरे जहन में उतर आई थी।
मुझे भी दिखाना और बताना था कि सिर्फ मैं प्रशस्ति करने वालों के लिए ही नहीं बना था।आज सुबह-सुबह जबमैंने कम्प्यूटर खोला,
सामने शर्मा जी की कविता मेरे सामने आई।
मैंने एक बार नहीं,दो बार उसे पढ़ डाला।
बहुत मार्मिक कविता उन्होंने लिखी थी—
लड़की को ससुराल विदा करते हुए उन्होंने कविता का रूप गढ़ा था।
आँखें भर आई थीं और दिल भरा-भरा हुआ था।
मुझे 'नील कमल' 1968 में गाया हुआ गीत"बाबुल की दुआएं लेती जा"
मुहम्मद रफ़ी की याद आ गई!प्रतिक्रिया और टिप्पणी भीउसी अंदाज़ में लिख डाली—
"विलक्षण विदाई गीत आपने लिखा है,
मार्मिक गीत के साथ आपने हिन्दी साहित्य को एक नया उपहार दिया है।"
मैंने अभिनंदन किया और अपने प्रणाम भंगिमा वाला फोटो भी चिपका दिया।
पर देखिए शर्मा जी को—आभार, धन्यवाद और शुक्रिया तक नहीं मुझको दिया!
=================
डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका झारखंड
