"कमेंट बॉक्स के महाकवि "
"कमेंट बॉक्स के महाकवि "
नमन"StoryMirror"विधा: कविता (व्यंग्य, हास्य और एक तीखी सच्चाई तीनों का संगम है)शीर्षक: "कमेंट बॉक्स के महाकवि"घोषणा: स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित
संदर्भ: कविता उन लोगों पर करारा तंज है जो किसी भी पोस्ट के कमेंट बॉक्स को अपना "मुशायरा" समझ लेते हैं। मूल पोस्ट का विषय कुछ भी हो, ये "स्वयंभू साहित्य-सेवक" वहाँ अपनी अप्रासंगिक रचना ठेल आते हैं।"बारिश की भविष्यवाणी" पर "धूप-छाँव की ग़ज़ल", "आम के फायदे" पर "इमली का विलाप" — यही है कमेंट बॉक्स के महाकवियों का शगल।
दिनाँक:14 जुलाई 2026
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"कमेंट बॉक्स के महाकवि"डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल'===============हम कभी-कभी दृग्भ्रम केशिकार हो जाते हैं,भटके हुए राही-से,किसी के कमेंट बॉक्स में घुस जाते हैं।
वहाँ अपना काव्य-कलशलेकर प्रदर्शन पर उतर आते हैं,
भले ही मूल पोस्ट मेंबारिश की भविष्यवाणीचल रही हो,
हम अपनी धूप-छाँव कीग़ज़ल सुना आते हैं।कोई बेचारा कविता लिखे,कोई लेख रचता है,
संस्मरण की नाव मेंलघुकथा का दीप जलता है।
विषय होता है "आम के फायदे",
पर हम वहाँ "इमली का विलाप"महाकाव्य पढ़ जाते हैं।कोई सराहे तो ठीक,न सराहे तो भी ठीक,
क्योंकि हम तो स्वयंभूसाहित्य-सेवक हैं,
कमेंट बॉक्स ही अपना मंच,अपना टॉक-शो।
प्रशंसा की फसल बोने आए थे,
पर यहाँ तो सबअपनी-अपनी खेती कर रहे हैं!अब करें तो क्या करें,धर्मसंकट भारी है—
न "आभार" कह सकते,न "धन्यवाद" लिख सकते,
क्योंकि प्रशस्ति-पत्र बाँटने आए थे,
पर यहाँ उल्टा हमें हीशॉल ओढ़ानी पड़ गई।प्रशस्ति बाँटने का शौक हैतो अपनी दीवार सजाओ,
दूसरे के आँगन मेंकवि-सम्मेलन मत लगाओ।
क्योंकि अंत मेंलेखक भी यही सोचता है—
"मैंने लिखा था ‘श्राद्ध’,ये सुना रहे ‘शादी’ के गीत...
धन्य हो प्रभु, धन्य हैंआपके कमेंट-बॉक्स के मीत!"=====================— डॉ. लक्ष्मण झा 'परिमल'
दुमका, झारखंड
