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Dinesh paliwal

Inspirational

5  

Dinesh paliwal

Inspirational

।। चाह ।।

।। चाह ।।

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चाह नहीं मैं किसी महल की ,

कोई चोटी या कंगूरा हूँ ,

ना ही चाहूँ वो राह कभी ,

जिन पर मैं बस चल पूरा हूँ ।

ना चाह रही इस जीवन में ,

मेरी हर इच्छा का मान रहे ,

ना चाहत जब जाऊं जग से ,

बस हर मन मेरा ध्यान रहे ।

कब चाहा था हर स्वप्न मेरा ,

मैं चाहूँ तब ही साकार रहे ,

ना ही ये मन मैं रहा कभी ,

जग मेरा चाहा आकार रहे ।

मैंने तो बस जब भी चाहा ,

सबके हित ही मेरा हित हो ,

मेरा हर श्रम उसका प्रतिफल ,

श्री हरि के चरणों अर्पित हो ।

मैं मंदिर की सीड़ी बन कर ,

चूमूँ हर पग जो आता हो,

बनूँ थाल आरती का प्रभु के ,

हर घर आशिष जो लाता हो ।

हर साँस मेरी और हर धड़कन ,

माधव की बंसी सी बजती हो ,

बस सेवा में ही हो संसार मेरा ,

खुशियाँ हर आँगन रजती हो।

ये मानव काया जो पंचतत्व ,

पंचामृत इसमें बस मिल जाये ,

भक्ति करुणा आभार समर्पण ,

ममता से ये अंबुज खिल जाये ।

जाने से पहले इस जग से ,

प्रभु ऐसा लीला मंचन हो जाये ,

मन वृन्दावन मति काशी मय ,

ये नश्वर तन अब कंचन हो जाये ।

ये नश्वर तन अब कंचन हो जाये ।।


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