"मेरी साइकिल"
"मेरी साइकिल"
"मेरी साइकिल"
डॉ.लक्ष्मण झा 'परिमल
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मेरी संगिनी, मेरी साइकिल
वह आबाध गति से सड़कों पर दौड़ती है,
और बिना कहे ही मेरे हर संकेत को समझ जाती है।
न कोई शिकवा, न कोई शर्त — बस साथ निभाती है।
यह मुझे पंख-सा सुख देती है, हर मोड़ पर मेरा कहा मानती है।
लोभ से परे, ईर्ष्या से मुक्त, मोह के बंधन से आज़ाद —
एक सच्ची साध्वी-सी, मौन साधना में लीन।
मैं जिधर इसे ले चलूँ, यह मुस्कुराकर साथ हो लेती है,
न थकती है, न रुकती है, न कभी सवाल करती है।
ऐसी निष्काम, निश्छल साथी जब जीवन-पथ पर मिल जाए,
तो फिर क्यों न हम इसे दिल से प्यार करें?
क्यों न इसकी घंटी की मधुर खनक को अपना गीत बना लें?
इस साइकिल दिवस, चलो वादा करें —
पैडल मारेंगे, प्रदूषण हरेंगे,
सेहत सँवारेंगे और इस बेवफ़ा दुनिया में
एक वफ़ादार संगिनी का मान बढ़ाएँगे।
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डॉ लक्ष्मण झा "परिमल"
