"मुझे ही ड्राइवर रख लो "
"मुझे ही ड्राइवर रख लो "
आदरणीय “StoryMirror ” मंच को प्रणाम के साथ स्वरचित मौलिक कविता सादर समर्पित !
विश्लेषण:
पहले खंड में 'नवीन' को परिवार का आत्मीय सदस्य मानकर संस्कार, सत्कार और अपनापन दिया गया, जहाँ रिश्तों की गर्माहट और मान-सम्मान सर्वोपरि था।
दूसरे खंड में औपचारिकता, उदासीनता और दिखावटीपन हावी रहा, जिससे आहत नवीन ने व्यंग्य में 'ड्राइवर' बनने की बात कहकर रिश्तों के बाज़ारीकरण पर चोट की।
दिनाँक:15 जून 2026
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"मुझे ही ड्राइवर रख लो"
डॉ॰ लक्ष्मण झा ‘परिमल’
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पहला खंड - सत्कार वाला घर:"आइए..आइए..हमारा धन्य भाग्य..
आज कैसे रास्ता भूल गए?..
चलिए - चलिए आँगन में चलिए...
आँगन भी धन्य हो जाएगा...!
अरे....गोलू बेटा..
प्रियंका बेटी..कहाँ हो...?
आओ देखो काका आए हैं...!
पैर छुओ.....!
माँ...नवीन आया है!."....
नवीन झुका और प्रणाम किया...आशीर्वाद मिला
..."आनंद से रहो...मस्त रहो..और..खूब तरक्की करते रहो....!
भाभी भी सामने आईं...उनको भी प्रणाम किया...!
काका मधुबनी गए थे....भाभी ने तुरंत चूड़ा, दही, चीनी और अचार का नाश्ता लगा दिया..पानी रखकर आग्रह करने लगीं....
"बेटा...खाना बन रहा है...
पता होता तो काका से कहती "मछली लेते आते...."!!
दूसरा खंड - उदासीन व्यवहार:"घंटी बजी..ट्रिंग..ट्रिंग..."
बहुत देर बाद दरवाजा खुला...!
"ओह नवीन?.. रुको, कुर्सी बाहर निकाल लेती हूँ!... यहीं बैठकर बातें करेंगे...!"
इधर-उधर की बातें हुईं...
चाय भीतर से मँगवाई गई!..
मैंने पूछा - "घर में कौन-कौन हैं...?"....
"घर में सब हैं लेकिन काम में व्यस्त हैं!
किसी के पास समय नहीं है..
और न ही जरूरत...कि थोड़ा परिचय कर लें,
अपने से श्रेष्ठ का आशीष पा लें!"
नवीन जी भी नहीं रुके.....
परन्तु जाते-जाते पुराने मित्र ने उन्हें एक काम सौंप दिया!
उनको शेवरलेट कार के लिए एक ड्राइवर चाहिए।
नवीन जी हल्का सा मुस्कुराए और कह दिया.......
"ड्राइवर चाहिए तो मुझे ही रख ले!"
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डॉ॰ लक्ष्मण झा 'परिमल’दुमका झारखंड
