STORYMIRROR

Dipti Agarwal

Abstract

2  

Dipti Agarwal

Abstract

अंधेरे का रोष

अंधेरे का रोष

1 min
235

रौशनी से चमकती जुगनुयी आँखों के

पीछे छुपा बैठा ख़ौफ़ देखा है कभी, 


हर नज़र से बचके एक कोना पकड़े, 

दुबक के पड़ा रहता है, 


ख़ौफ़ है ना आखिर सिर

उठाने का ज़ज़्बा होता तो, 


अस्तित्व ही बदल जाता ना उसका, 

चौकाने की बात यह है की छुपने की जगह, 


उसने भी रौशनी के पीछे ही रखी होती है, 

अंधेरे का रोष डर उसकी भी नसें कचोटता तो है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract