Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract Romance


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract Romance


वैतरणी पार

वैतरणी पार

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टॉपर्स इन्कम्प्लीट थ्योरी रिया के पैर का ऑपरेशन के बाद करीब एक महीने बाद रिया, शहर वापिस आई थी। सुजाता और मैं, उससे संवेदना प्रकट करने उसके घर पहुँचे थे। ऑन्टी (रिया की मम्मी) हमें, उसके शयनकक्ष में ले गईं थी। रिया, उदास बेड पर लेटी हुई थी। 

हमें देख कर उसने ओंठों पर, फीकी सी मुस्कान लाई थी। 

कैसे हुआ ये सब? - मेरे पूछने पर वह रो पड़ी थी। 

सिसकते हुए उसने मेरे पर अँगुली उठाई और कहा था - टॉपर, यह सब तुम्हारे कारण से हुआ। तुमने, हमें वह मुफ्त की पिकनिक-डिनर, शायद अच्छी भावना से नहीं कराई थी। 

अपना ज्ञान बघारते हुए तुम नहीं जानते थे कि जिन बातों का जानना तुम, बुराई से बचने के लिए जरूरी बता रहे थे। उन्हीं बातों की जानकारी ने पहले, मुझे फिर मेरे कारण अभिनव को तुम्हारी बताई गई बुराइयों में लिप्त कर दिया। 

आज, हम दोनों बहुत कुछ खो देने के बाद तुम्हारी, उस पिकनिक को कोसते हैं। फिर भी हमें खो दिया वह सब हमें वापिस मिलना नहीं है। तुम ही मेरी इस हालत के जिम्मेदार हो। 

यह कहते हुए उसकी सुबकियाँ तो खत्म हो गईं थी मगर उसके आँखों से आँसू झर झर बह रहे थे। 

दुःखद उसकी हालत देख एवं उसके भाव-विचार सुनकर मैं अंदर से हिल गया था। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। सुजाता भी अब मुझे, जिस नज़र से देख रही थी वह मुझे गड़ रही थी। 

मेरे मन में यही प्रश्न उठ रहा था - क्या, अभिनव एवं रिया ने हमारी पिकनिक की चर्चा अपने पेरेंट्स को बताई होगी? 

अगर ऐसा हुआ था तो मैं उनका सामना करने में, स्वयं को योग्य नहीं मान रहा था। 

सुजाता ने, रिया के सिरहाने पर बैठ, स्नेह से उसके आँसू पोंछे थे। रिया कुछ संभली थी। तब, रिया की सेविका ट्रे में बिस्किट-चाय लेकर आई थी। यह देख मेरी कठिनाई बड़ी थी। 

मैं, वहाँ स्वयं को फँसा अनुभव कर रहा था और जल्दी निकल कर, चैन की श्वाँस लेना चाहता था। जबकि चाय आ जाने के कारण कम से कम 15 मिनट, हमें वहाँ और रुकना था। 

मेरी मुसीबत और बढ़ गई, जब पीछे आंटी भी कमरे में दाखिल हुईं। मैं उनसे नज़रें चुरा रहा था। उनके कहने पर मैंने यंत्रवत चाय-बिस्किट ली थी। 

मेरे हावभाव देख सुजाता और रिया भी, निश्चित ही मेरे मन की समझ रहीं थीं। 

तब, मुझे इस विषम स्थिति से बचाने में, सुजाता ने एक अच्छे मित्र की भाँति सहयोग किया था। उसने ऑन्टी की बातों का छोटा-संक्षिप्त जबाब देते हुए, चाय जल्दी खत्म की थी और रिया से फिर किसी दिन आने की बात कहते हुए विदा ली थी। 

इसके कुछ दिन बाद, मेरे साथ टेनिस खेलते हुए वैतरणी ने मुझसे पूछा था - टॉपर, क्या तुम्हें मालूम है अभिनव को ड्रग एडिक्शन हो गया है एवं उसके पेरेंट्स, उसे हॉस्टल से घर वापिस लाकर उसका उपचार करा रहे हैं? 

अपने भाव छिपाते हुए मैंने उससे झूठ कहा कि - ऐसा कुछ सुना तो है, मगर ज्यादा डिटेल नहीं मालूम हैं, मुझे। 

वैतरणी - सुजाता एवं मैं आज शाम, अभिनव से मिलने उसके घर जा रहे हैं, क्या तुम साथ चल सकोगे?

मैंने फिर झूठ कहा - आज शाम मुझे पापा से कुछ आवश्यक बात करनी है। मैं किसी और दिन जाकर अभिनव से मिल लूँगा।

वैतरणी ने कहा - कोई बात नहीं। 

फिर उसने, अपना ध्यान खेल पर केंद्रित कर लिया था।   

उस शाम वैतरणी एवं सुजाता, अभिनव से संवेदना-सौहार्द्र के प्रयोजन से भेंट करने गईं। 

अभिनव ड्रग्स से छुटकारे के लिए दवायें लेते हुए, तुलनात्मक रूप से बेहतर मानसिक दशा में था। मगर पश्चाताप से भरा होने से उदास था। उसने अपने किये का दोष मुझ पर नहीं लगाया था और वह, महिला की मौत के लिए एवं रिया में आये अंग दोष के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए अत्यंत व्यथित था। 

अभिनव ने यद्यपि मेरा नाम भी नहीं लिया था। 

लेकिन सुजाता ने वहाँ बेबाकी से कहा था - अभिनव, धीरज रखो इंसान में शक्ति होती है। वह हर परिस्थिति में बेहतर करके दिखा सकता है। तुम भी इस सब के बाद शीघ्र सम्हल जाओगे। लेकिन अब से तुम्हें, कसम खाना होगा कि आधे अधूरे तरह के, टॉपर के बच्चों वाले ज्ञान से तुम बच के रहोगे। अभिनव इस बात से अपनी व्यथाओं में भी मुस्कुरा दिया था। 

इसे देख वैतरणी को बोलने का हौंसला मिला, उसने कहा था - सुजाता, मैं उसे "टॉपर्स इन्कम्प्लीट थ्योरी" कहूँगी। टॉपर की कही बातें यूँ तो गलत नहीं थी। गलत सिर्फ उसकी और हमारी अनुभवहीनता थी। 

यही जानकारी यदि हमारे पेरेंट्स से, उनके अनुभव एवं मार्गदर्शन के माध्यम से प्राप्त होती तो बुराई का ऐसा ज्ञान, हमारे भविष्य निर्माण की दृष्टि से निश्चित ही उपयोगी होता।

अभिनव ने वैतरणी से सहमति जताते हुए कहा था - सही कह रही हो तुम वैतरणी, मगर मैं सोचता हूँ अब ठोकर खा गिर जाने के बाद, मुझे सही सबक सीखना है। 

मेरा तो कम बुरा हुआ है लेकिन मेरे कारण ज्यादा बुरा रिया का हुआ है। इसकी जिम्मेदारी मानते हुए, उसके जीवन के लिए हर जरूरी सहारा मुझे बनना है। 

सुजाता इस बात से खुश होती है, कहती है - बिलकुल अभिनव, मुझे आशा है शीघ्र ही तुम और रिया स्वस्थ होकर अपनी स्टडीज फिर शुरू कर सकोगे। 

फिर नाश्ता-चाय के उपरांत सुजाता और वैतरणी जब जाने लगीं तब अभिनव, मानसिक रूप से ज्यादा अच्छी दशा में था। उसने बँगले के बाहर गेट तक आकर, मुस्कुराते हुए उन दोनों को विदा किया था। 

रिया ने जिस तरह सारा दोषारोपण मुझ पर किया था, उस कारण से अभिनव से की, मुलाकात का ना तो मैंने, वैतरणी से कुछ पूछा ना ही उसने मुझे कुछ बताया। 

वास्तव में मुझमें साहस नहीं था कि यदि अभिनव ने भी रिया की तरह ही आरोप मुझ पर डाले हों तो मैं, वैतरणी के मुख से यह सब सुन सकूँ। 

यद्यपि कुछ दिन बाद सुजाता ने जरूर मोबाइल पर आधी अधूरी से बात यह कही थी कि - गलत नहीं मगर वह "टॉपर्स इन्कम्प्लीट थ्योरी" थी जो अपने अधूरे स्वरूप में किसी का कोई भला नहीं कर सकती है। 

सुजाता ने सप्रयास अपनी बात अधूरी ही कही थी। मैंने भी उसे अधिक कुरेद कर ज्यादा जानना नहीं चाहा था। अपितु मैं, स्वयं अपने आप में अभिनव के मनः स्थिति का अनुमान करने लगा। 

मुझे लगा कि यदि अभिनव भी रिया की तरह उनके साथ, जो हादसा हुआ है उसका दोष मुझ पर डालता है तो यह मेरे साथ अन्याय है। 

मैं, वैतरणी का तो दोषी हूँ जिसको, अध्ययन में पीछे छोड़ने के लिए गलत उद्देश्य से, उसके पीछे पड़ा रहा था। मैं अपने को अन्य के प्रति निर्दोष होने का प्रमाण पत्र यह सोच कर देना चाहता था कि मेरी उस दिन दीं गईं जानकारी तो नेट पर किसी को भी सरलता से पता चल सकती हैं। और उसके होने पर कोई स्वयं क्या करता है उसका दोष किसी और का कैसे हो सकता है ?

इस प्रश्न का जबाब पाने के लिए मैं, पिछले कुछ वर्षों के घटना क्रम पर जिनमें स्वयं मैं एक प्रत्यक्ष पात्र रहा और जिनमें अप्रत्यक्ष रूप से मैं चर्चा में रहा उनमें (अनुमान लगाता हुआ) स्वयं खो जाता हूँ। तब पूर्व की बातें मेरे जेहन में पृष्ठ दर पृष्ठ उभरती जाती है।

महत्वाकाँक्षा हमारे स्कूल की शुल्क इतनी अधिक होती है कि जिसे, मुझ जैसे अति धनिक परिवार ही, अपने बच्चों के लिए सरलता से अदा कर सकते हैं। 

मेरे पापा जैसे धनी व्यक्ति यहाँ, इस स्कूल में मुझे एवं मेरे भाई को पढ़ाते हुए यह सोचते हैं कि इसमें बच्चों को, धनी पृष्ठभूमि के परिवारों के बच्चों की ही संगत सुनिश्चित हो सकेगी। जिससे स्कूल की शिक्षा एवं सुसंगत से, उनके बच्चों का आधुनिक तरह के शिष्टाचार के साथ ही सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होगा।

यह स्कूल मगर धन के लोभ में, मध्यमवर्गीय परिवार के उन बच्चों को भी प्रवेश दे देता है, जिनके पालक अपने बच्चों के लिए, संभ्रांत परिवार के, हम जैसे बच्चों की संगति चाहते हैं। 

यूँ तो उनके लिए हमारे स्कूल के महँगे शुल्क भरना कठिन होता है फिर भी अपनी जीतोड़ कोशिशों से वे, इसे अदा करते हैं। 

मैं, आज समझ पा रहा हूँ कि उस दिन, मेरे मन में ये सब विचार वास्तव में मेरी कुंठा एवं ईर्ष्या प्रेरित होकर आ रहे थे। वास्तव में मेरी इस कुंठा का कारण, मेरी सहपाठी लड़की वैतरणी थी। 

मेरे बालमन से ही मेरी अभिलाषा अधूरी रहती आई थी कि मैं स्कूल टॉपर के रूप में जाना जाऊँ। मेरी इस महत्वाकाँक्षा के मार्ग में, वैतरणी अपने नाम अनुरूप बड़ी बाधा थी। अर्थात मेरी महत्वाकांक्षाओं एवं सपने का स्वर्ग स्कूल में 'सर्वोच्च स्थान' वैतरणी पार करके ही प्राप्त किया जा सकता था। वैतरणी पार ना कर सकने से मैं, पहली से ग्यारह कक्षा तक, अपने ग्यारह प्रयासों में व्दितीय ही आता रहा था। 

उस समय हम कक्षा बारह के छात्र थे। बारहवीं की वार्षिक परीक्षा, छह मास बाद होनी थी। जैसा चल रहा था वैसा ही चलते रहना, फिर वैतरणी को पार करने में मेरी असफलता ही तय करने वाला था। 

मैं अपनी इस कल्पित असफलता से व्याकुल था। मेरी अठारह वर्ष तक की आयु में जितनी शातिराई मुझे आई थी उससे मै, आखिरी रहने वाले प्रयास में अपनी सफलता सुनिश्चित करने की युक्तियाँ सोच रहा था। 

मुझे मालूम था कि वैतरणी से अपनी लकीर बड़ी करना, लगभग असंभव था। उसकी लकीर मिटा कर उसे छोटी करके ही मैं, वैतरणी के पार जा सकता था। 

यह ख्याल आने के बाद, मैंने एक योजना तय कर ली, जिसके सफल क्रियान्वयन कर सकने से, वैतरणी का मन पढाई से हटाया जा सकता था। 

जो मुझे तब ज्ञात नहीं था अपने बैंक में चपरासी, पिता एवं माँ की इकलौती संतान वैतरणी, माँ की लाड़ली एवं पापा की उसको लेकर, उनकी अति महत्वकांक्षाओं की सिध्दी का माध्यम थी। 

वैतरणी की माँ पूर्व पीढ़ी की, ग्रामीण परिवेश से आई साधारण पढ़ी लिखी गृहणी थी। वैतरणी के 3 सदस्यीय इस परिवार में सभी महत्वपूर्ण बातें परंपरागत रूप से (परिवार के मुखिया) उसके पापा तय किया करते थे। 

उसके पापा स्वयं अति बुध्दिमान थे। मगर अपने पिता की कम उम्र में ही मृत्यु हो जाने से, उनके परिवार अर्थात माँ, एक भाई एवं एक बहन की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ जाने से, उन्हें कम वय में ही कमाने वाले की भूमिका ग्रहण करने के लिए, पढाई बीच में छोड़ने पड़ी थी। ऐसे वे, अपनी उन्नीस की उम्र से ही बैंक में चपरासी की नौकरी करने लगे थे। 

वैतरणी छोटी ही थी तबसे उसने, पापा को अथक परिश्रम करते हुए देखा था। उसने पापा को, चाचा एवं बुआ की पढ़ाई, फिर उनकी नौकरी और बाद में उनके विवाह की जिम्मेदारियाँ निभाते देखा था। 

अपने माँ एवं पापा के परिवार के लिए इस तरह समर्पण को देखते हुए, बचपन से अनायास ही वैतरणी ने, जिम्मेदारी के संस्कार स्वयं ग्रहण किये थे। 

12-13 वर्ष की अपनी वय तक पापा का ज्यादा दुलार एवं समय, वैतरणी को नहीं मिल सका था। 

जब उसके पापा, चाचा एवं बुआ के विवाह तक की जिम्मेदारी निभा चुके एवं चाचा, पापा से अच्छी नौकरी में एवं बुआ, विवाह होने के बाद अन्य शहरों में जा चुके, तब से ही वैतरणी के लिए पापा समय देने लगे थे। 

तब से वैतरणी ने अपने पापा को, पापा रूप में अनुभव किया था। 

वैतरणी के पापा, पेशे से चपरासी होने से, दुनिया के सामने अत्यंत साधारण व्यक्ति समझे जाते थे। मगर उनमें एक अति बुध्दिमान व्यक्तित्व निहित था। 

उन्होंने देश एवं स्वयं के परिवार की आवश्यकता को समझते हुए, अपने परिवार को सीमित किया था। इस तरह वैतरणी उनकी अकेली संतान थी। अन्य जिम्मेदारियों को निभा चुकने के बाद अब, पापा के समस्त सपनों की पूर्ति की माध्यम, उनकी लाड़ली वैतरणी ही थी। 

इकलौती बेटी वैतरणी को, पापा ने अपनी हैसियत से बढ़कर महँगे स्कूल में प्रवेश दिलाया था। 

और जब से वे अपनी अन्य जिम्मेदारियों से मुक्त हुए तब से अपने नौकरी के बाद का ज्यादा समय वे, वैतरणी के लिए ही देते थे। वैतरणी के बिना कहे, उसकी आवश्यकताओं को समझते हुए उसकी व्यवस्था करना, अपनी किशोरवया बेटी के मनोविज्ञान को समझते हुए उसका मार्गदर्शन करना उनका नित दिन का कार्य था। 

पापा ने वैतरणी के लालन पालन में, इस बात को प्रमुखता दी थी कि वैतरणी अपने मन में उठने वाले, सभी संशय एवं प्रश्न उनसे निःसंकोच कह सके। ऐसे ही पापा समाज में चलती बुराइयों का एवं उससे कैसे बचा जाता है, का ज्ञान भी वैतरणी को स्वयं कराते थे। 

जब पापा ऐसा करते तो वैतरणी को पापा, पापा नहीं एक करीबी मित्र होने का एहसास कराते थे। 

जब मेरे दिमाग में, वैतरणी की लकीर छोटी करने का उपाय चल रहा था। उस समय वैतरणी के छोटे से घर में, मेरे मंसूबों पर पानी फेरने वाली चर्चा चल रही थी। 

पापा - बेटी, तुमने अब तक हर कक्षा में, स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। इससे अब, आगे के आठ माह तुम्हारे लिए अति महत्वपूर्ण हो गए हैं। जिसमें तुम्हें आईसीएसई की बोर्ड एवं बाद में आईआईटी जेईई की परीक्षाओं में हिस्सा लेना है। 

वैतरणी - हाँ, पापा!

पापा - यहाँ ज़रूरी अब यह है कि पढ़ाई से विमुख करने वाली बातों से, जैसे तुम दूर रहती आई हो वह जारी रखो। साथ ही पूर्णतः स्वस्थ रहने के प्रति तुम जागरूक रहो। 

वैतरणी - हाँ, पापा! जैसा आप कहते हैं वैसे ही मैं, पढ़ने के समय के अतिरिक्त पूर्ण निद्रा/आराम के साथ साथ, चुप रहते हुए, कुछ समय मम्मी की रसोई में, हाथ बँटाया करती हूँ। 

पापा (दुलार से वैतरणी के सिर पर हाथ रखते हुए) - बेटी, जानती हो अगर मेरी कल्पना साकार हो सकीं तो कुछ माह के बाद यह समाचार वायरल होगा कि "एक चपरासी की बेटी ने, बारहँवी एवं आईआईटी जेईई में देश में गौरवशाली स्थान हासिल किया"। 

वैतरणी - जी पापा, जिससे आप एवं माँ को गौरव अनुभव होता है मैं, ऐसा हर कार्य करना चाहूँगी। 

माँ (पहली बार बोलीं) - हाँ वैतरणी, मैं जानती हूँ, तुम कभी कोई कार्य ऐसा नहीं करोगी, जिससे हमारा सिर लज्जा से झुकता हो। 

तीनों हँसे थे, फिर अपने अपने कार्य में लग गए थे। 

योजना क्रियांवयन अगले दिन केंटीन में मैंने, अपने मित्र सुजीत, अभिनव, रिया एवं सुजाता से कॉफी की चुस्कियों के बीच कहा

मैं - माना की बारहँवी है, मगर क्या सिर्फ पढ़ना हमें, उबाता नहीं है?

सुजाता - (झूठे ही दयनीय भाव चेहरे पर लाते हुए) बिलकुल उबाता है मगर अभी हम रोमांस करने लगें तो फिसड्डी रह जाएंगे, ना !

रिया (मजाक करते हुए) - सुजाता मैं तो फिसड्डी भी रहना पसंद कर लूँ, अगर (मेरे तरफ देखते हुए) ये मुझसे प्यार करने लगे (फिर मुझे आँख मार कर, हँसते हुए) क्या तुम करोगे मुझसे प्यार?

मैं - तुम लड़कियों को प्यार के अलावा कुछ सूझता नहीं मगर देखो, तुम्हीं में से एक लड़की, वैतरणी है जिसे पढ़ने के अलावा कुछ नहीं सूझता है। 

अभिनव - (विचारपूर्वक मुस्कुराते हुए) तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे कि अगर, वैतरणी मान जाये तो तुम उससे प्यार करना चाहते हो?

मैं - वैतरणी के सुंदर डिंपल देख उसे प्यार करने का, भला किसका दिल नहीं चाहेगा किंतु वैतरणी से प्यार की बात तो बहुत दूर है। अभी मैं बोलूँ कि इस रविवार, वॉटर फॉल में पिकनिक के लिए उसे, मनाओ तो कोई ऐसा तक करके तो दिखा न सकेगा। 

सुजीत - तुम शर्त लगाओ तो सुजाता यह काम कर सकती है। वैतरणी, कक्षा में जिसे मुहँ लगाती है, वह सिर्फ एक सुजाता ही तो है। 

सुजाता - बोलो टॉपर (स्टूडेंट्स में रियल टॉपर वैतरणी और ख्याली टॉपर के रूप में मुझे जाना जाता था) तुम, शर्त लगाते हो तो यह कठिन चुनौती मैं लेती हूँ। 

मैं - चलो, अगर यह किया तो रविवार को वॉटर फॉल पर पिकनिक एवं उस रात्रि का फाइव स्टार डिनर मेरी तरफ से। 

रिया - चल, सुजाता करके दिखा नहीं तो डिनर तुझे कराना होगा, है मंजूर ?

सुजाता - मालूम नहीं था कि यह कंजूस, मुझे फँसा देगा। अब फँस ही गई हूँ (उदास दिखने का अभिनय करते हुए) तो प्रयास करना ही पड़ेगा। 

अभिनव - (ख़ुशी प्रकट करते हुए) रिया, सुजीत और मैं तो अब मजा लेंगे। वैतरणी आये या न आये सिरदर्द एवं पिकनिक/डिनर का ठेका, तुम दोनों का ही है। 

बाद में, उस दिन छुट्टी के बाद कॉलेज बस से घर लौटते हुए सुजाता, सप्रयास वैतरणी के बाजू की सीट पर जा बैठती है। वैतरणी के चेहरे के भाव से यूँ लगता है, जैसे वह किसी लेक्चर पर मनन कर रही हो। 

सुजाता उससे पूछती है - वैतरणी, कुछ सोच रही हो या अभी भी पढ़ाई ही चल रही है ?

वैतरणी - (झेंपते हुए, झूठ कहती है) नहीं, थक सी गईं हूँ इसलिए चुप हूँ। 

सुजाता - मैं एक ऐसा आइडिया बताती हूँ जिससे तुम्हारी, सारी थकान भाग जायेगी और आँखों में सुंदर सपने तैरने लगेगें। 

वैतरणी - (उत्सुकता से) ऐसा क्या आइडिया है?

सुजाता - रविवार वॉटर फॉल पर मुफ्त पिकनिक एवं उस रात्रि फाइव स्टार में मुफ्त डिनर है, अगर तू हमारे साथ आना चाहे तो!

वैतरणी - पापा से मैं, इसकी अनुमति ना ले सकूँगी, सॉरी सुजाता। 

सुजाता - देखो वैतरणी, तुम इतने सालों से, हमारे साथ पढ़ रही हो कभी कोई यादगार हमें लेकर रह जाए, तुमने ऐसा कोई कार्य किया नहीं है। अब, कुछ महीने ही बचे हैं फिर स्कूल छूट जाएगा। आगे हममें से कौन कहाँ पढ़ने जाएगा पता नहीं। यही मौका है, फिर तो एग्जाम करीब होते जाना है। आज, ना कहा तो फिर कोई और ऐसा अवसर तुम्हें कभी ना मिलेगा।

वैतरणी - (मुझे सांत्वना सी देते हुए) सुजाता, बुरा न मान। मैं आज पापा से पूछूँगी। यह तो मगर बता कि पिकनिक में, कौन कौन साथ होंगे?

सुजाता - तुम, रिया, अभिनव, सुजीत, टॉपर और मैं !

वैतरणी - कंपनी तो अच्छी है, सुजाता मैं कोशिश करती हूँ, मगर चलने का पक्का घर में पूछने के बाद, कल ही बता सकूँगी। 

सुजाता - ठीक है। 

(कहकर हँसती है और स्टॉपेज आ जाने से, सुजाता उठकर बाय कहते हुए चली जाती है।) 

कठिन बाधा उस शाम वैतरणी पापा से पूछती है - पापा, इस रविवार को, साथ के कुछ अच्छे स्टूडेंट्स वॉटरफॉल पिकनिक एवं फाइव स्टार डिनर पर जा रहे हैं। मुझे भी साथ चलने को पूछा है। आप बताओ, मुझे जाना चाहिए या नहीं। 

पापा - बेटी, उससे तुम्हारे पढ़ने पर कोई बुरा असर न पड़े तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। 

वैतरणी - पापा, एक दिन न पढ़ने से कोई असर नहीं पड़ेगा। वास्तव में, मैं उत्सुक इसलिए हूँ कि कुछ महीने बाद स्कूल एवं ये संगी-साथी छूट जायेंगे। इतने वर्षों में हर ऐसे अवसर को, मै नकारते आईं हूँ। मुझे लगता है, इसके बाद ऐसा मौका फिर ना आएगा। 

पापा - वैतरणी, एक दिन न पढ़ने से तुम जैसी कुशाग्र छात्रा का कुछ नहीं बिगड़ता है। मैं इस तरह से फिक्रमंद हूँ कि उस एक दिन में ऐसा कुछ न हो, जिससे आगे के दिनों पर उसका बुरा प्रभाव जाये। 

वैतरणी - पापा, मैं समझ रही हूँ कि आप क्या कह रहे हैं। पापा, ये फ्रेंड्स स्वयं ही मेरे जैसे पढ़ने वाले हैं अतः उनकी ओर से मुझे कोई खतरा नहीं दिखता है। 

पापा - बेटी, फिर ठीक है। कितना खर्च होगा, बताओ मैं तुम्हें कल दे दूँगा। 

वैतरणी - पापा, शायद मुझे कुछ नहीं देना होगा। ये सब अति धनवान घरों के लड़के-लड़कियाँ हैं। ये जानते हैं, ज्यादा खर्चे की बात पर मैं, ना कर देती हूँ। लगता है उनमें कोई शर्त हारा है, इससे सारे खर्चे का जिम्मा उस पर है।पापा - ठीक है बेटी, पर मुझे शंका ऐसी ही बात पर होती है कि कोई तुम पर, बिना प्रयोजन क्यों हजारों रूपये खर्च करेगा?

वैतरणी - (जैसे जाने को मर रही हो) पापा, मैं हर साल की टॉपर हूँ ना, अतः मेरे साथ दिखना हमारे साथ के स्टूडेंट्स में दीवानगी की तरह चलती है, इसलिए बस पापा। 

पापा - (हल्के से हँसकर, अपनी अन्यमनस्कता छुपाते हुए) हाँ, वैतरणी यह बात तो है। 

वैतरणी - पापा, आप तनिक भी चिंता ना कीजिये, रविवार को होने वाली एक एक बात मैं, आपको बताऊँगी। 

अगले दिन वैतरणी, सुजाता से पिकनिक के लिए अपनी सहमति कहती है तब सुजाता हर्षातिरेक में क्लास में ही वैतरणी को साथ लेकर थिरकने लगती है। वैतरणी को नृत्य नहीं आता है अतः उसके पग अजीब तरह से पड़ते हैं। अन्य सारे स्टूडेंट्स, इसे देख कई तरह के कयास लगाते हैं। जबकि सुजीत, रिया, अभिनव एवं मुझे सब समझ आ जाता है। मैं, अपनी योजना को सफल होते देखता हूँ। तब मेरे मन में, एक विजेता के से भाव आते हैं। 

 पिकनिक, मंतव्य सिद्धि रविवार को रानी झाँसी चौक पर निर्धारित समय पर, हम छहों एकत्रित होते हैं। फिर शहर से तीस किमी दूर वॉटरफॉल पर जाने के लिए, मेरी एवं रिया की कारों में हम रवाना होते हैं। रिया की कार में लड़कियाँ एवं मेरी कार में सुजीत और अभिनव होते हैं। 

हम वॉटरफॉल पहुँच कर, घंटों मस्ती करते हुए वहाँ की खूबसूरती का आनंद उठाते हैं। वैतरणी के उल्लासित मुख-मुद्रा एवं भाव-भंगिमा साफ़ गवाही देती है कि ऐसी मजा-मस्ती का, उसके जीवन में यह पहला पहला मौका है।

अति उत्साहित वह ऐसी खतरनाक जगह जाने को होती है जहाँ, थोड़ी सी असावधानी किसी को भी चालीस फिट नीचे की धारा में गिरा सकती है। 

मेरे आगाह करने पर कि वैतरणी, तुम्हें इस वर्ष भी टॉप करने के लिए जीवित रहना है, वह अपने कदम रोक लेती है। बाकि सभी इस बात पर अट्टाहास लगाते हैं। 

हम सब डीवीडी प्लेयर पर बज रहे इंग्लिश सांग्स पर थिरकते हुए, अपने साथ लाये भोज्य एवं पेय का आनंद लेते हैं। वैतरणी डांस में साथ नहीं दे पाती है। उसने यह सब कभी किया ही नहीं है। उसने सिर्फ पढ़ना और सादगी से रहना ही, जीवन का होना, जाना हुआ है। 

लड़कियाँ मस्ती करने के लिए उसे साथ खींचती हैं मगर नृत्य नहीं कर पाने से वैतरणी संकोचवश, उनसे बचते हुए एक तरफ हो जाती है। 

जब मौज मस्ती हो चुकती है तब मैं, अपने प्रयोजन पर पर आते हुए सभी को शाँत रहने का इशारा करते हुए कहता हूँ - 

मैं - आज के दिन को याद रखने के लिए आओ अब, हम एक सार्थक चर्चा करते हैं। 

सब मुझे देखने लगते हैं तब मैं कहता हूँ - अभी तक हम अपने पेरेंट्स के साथ घरों में रहते हैं। जहाँ हमें मार्गदर्शन एवं सुरक्षा उनसे मिलती है। कुछ महीनों में, हमारी स्कूली शिक्षा पूर्ण होगी और हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल रहे तो इसके बाद की हमारी शिक्षा, राष्ट्र स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों में देश के विभिन्न महानगरों में होगी। 

सुजाता - सो तो है, लेकिन हम समझ नहीं पा रहे हैं कि यहाँ के नयनाभिराम प्राकृतिक परिदृश्य का आनंद लेने के स्थान पर, तुम किस तरह की चर्चा करना चाहते हो?

मैं - मैं, यह कहना चाहता हूँ कि उन संस्थानों में हमें, छात्रावास में रहना होगा। जहाँ हमारे पेरेंट्स साथ नहीं होंगे। जहाँ हमारे आसपास अनेकों बुराइयाँ होंगी, जिनसे हमें बचना होगा एवं अपनी शिक्षा पूर्ण करनी होगी। 

सुजीत - मगर वहाँ पढ़ने जाने वाले हम पहले स्टूडेंट तो होंगे नहीं ? सब जाते हैं एवं शिक्षा पूर्ण करते हैं, वैसे हम भी कर लेंगे। 

मैं - मैं, यह कहना चाहता हूँ कि सब शिक्षा तो पूरी करते हैं मगर साथ साथ अनेक बुराइयों में भी लिप्त हो जाते हैं। अगर आज हम गंभीरता से उन पर विचार कर सकें एवं साथ में ऐसे संकल्प लें कि बुराइयों से खुद को बचायेंगे तो यह आज के दिन की हमारी उपलब्धि होगी। जो हमें अपने जीवन में विशिष्ट स्थान दिलाएगी। 

वैतरणी - उन बुराइयों से बचना तो, जैसी परिस्थिति बनेगी उस अनुसार हमारे बचाव के उपाय करने से संभव हो जाएगा। 

मैं - वैतरणी, तुम्हें तो बाहरी दुनिया का सबसे कम ज्ञान है। मेरी सबसे बड़ी चिंता तो आज तुम्हें लेकर ही है। 

रिया - टॉपर, तुम कहना जो चाहते हो, वह स्पष्ट कहो। 

मैं - वास्तव में हम उस बुराई से बचने में असमर्थ होते हैं जिनके स्वरूप या होने का पूर्व ज्ञान, हमें नहीं होता है। 

सुजाता - अर्थात तुम यह कहना चाहते हो कि जिन बुराई का स्वरूप हमारे ज्ञान में होता है, उससे हमारा बचना, हमारे लिए सहज-सुलभ होता है? 

मैं - हाँ, सुजाता ठीक यही मै, कहना चाहता हूँ। 

अभिनव - टॉपर, तुम्हें क्या मालूम है कि वहाँ क्या बुराइयाँ होंगी ?

मैं - हॉस्टल में स्मोकिंग, ड्रिंक्स जिसमें लड़कियाँ भी सम्मिलित होती हैं, जुआँ, चोरी, तस्करी, ड्रग्स की लत ऐसी तमाम तरह की बुराई होती हैं। इनके साथ ही ओपन रिलेशनशिप में पड़ना, वहाँ हमारे स्टडीज की दृष्टि से बड़ा डिस्ट्रैक्शन होता हैं। 

रिया - हम इसमें खुद से नहीं जाना चाहें तो कोई हमसे, जबरदस्ती थोड़ी कर सकेगा। 

मैं - नहीं रिया, यहाँ समझने वाली बात यह है कि जो, जिस बुराई में स्वयं लिप्त हो जाता है। वह यह चाहता है कि अन्य भी उस बुराई में पड़ जायें। उन बिगड़े लोगों में, ठीक वह मनोविज्ञान काम करता है कि "जिसकी एक आँख फूटी होती है वह सभी की एक आँख फूटी देखना चाहता है"। 

वैतरणी - मगर कोई एक, सबकी आँख तो नहीं फोड़ सकता है, ना! उसके चाहने से क्या होगा ?

मैं - सबकी आँख फोड़ना जरूर असंभव होगा लेकिन मैं, विशेष रूप से जिन ज्यादा बड़ी बुराई पर चर्चा करना चाहता हूँ वे दो हैं - एक ओपन रिलेशनशिप, दूसरा नशे के ड्रग्स लेना। यह दोनों ही बुराई किसी शैतान के चाहने से आसानी से फैलती हैं। जैसे किसी को कोकीन, हेरोइन नशा एक बार करा दिया जाए तो अगली बार वह खुद से इसे ढूँढने लगता है। 

जबकि किसी को शारीरिक संबंध को उत्सुक करना तो और भी सरल होता है। यह काम कोई भी, अपने संपर्क के टीन एजर्स को वल्गेर वीडियो (या लिंक) उनके मोबाइल पर भेजकर कर सकता है। जिन्हें देख देख युवाओं में काम आवेश पैदा होता है फिर उन्हें, अवैध संबंधों में लिप्त करना आसान हो जाता है।

अभिनव - (प्रतिरोध के स्वर में) तुम्हें, इन लड़कियों के सामने ऐसी बात नहीं करना चाहिए, टॉपर। 

मैं - बिलकुल अभिनव, सही कह रहे हो तुम। मगर ये लड़कियाँ कल हॉस्टलर होंगी। तब इनमें लड़की-लड़का भेद खत्म हो जाएगा। अतः मेरा उद्देश्य उसके पहले ही इन्हें, बुराई देख-समझने के समर्थ बनाना है ताकि ये उनसे बचाव कर सकें एवं अपने पेरेंट्स के, उन्हें लेकर देखे सपने साकार कर सकें। 

वैतरणी - (अप्रत्याशित रूप से) टॉपर, ऐसा कोई वीडियो दिखा सकते हो तो मैं देखना चाहती हूँ। 

मैं (मन ही मन खुश होते हुए) - मेरे मोबाइल पर सिर्फ एक है, वह बी ग्रेड फिल्म का है। यदि अन्य लड़कियों को आपत्ति न हो तो मैं दिखा सकता हूँ। 

रिया एवं सुजाता ने एक साथ ही कहती हैं - जानकारी की दृष्टि से हम देखना चाहेंगी। 

तब मैंने अपने मोबाइल पर तीन मिनट का वीडियो क्लिप, खोला एवं लड़कियों को देकर, हम लड़के अलग चले गए। लड़कियों ने उसे देखा। जिसमें एक लड़का एवं एक लड़की तीव्र काम आवेग से लिपटते चिपकते दिखते हैं। 

कुछ समय बाद तीनों लड़कियां हमारे पास आईं। सुजाता ने मेरा मोबाइल वापिस करते हुए कहा - सच है, टॉपर इस तरह के वीडियो से किसी भी युवा का नियंत्रण अपने पर से खत्म हो सकता है। ऐसा होने पर उसका, किसी के द्वारा यौन शोषण कर लिए जाने के प्रयोजन को, सरलता से सिध्द कर सकता है। धन्यवाद, हमें बुराई की बानगी दिखाने के लिए, टॉपर। शायद इसकी जानकारी हमें किसी के ख़राब प्रयोजन से बचाने में सहायक होगी। 

मैंने ( उत्साहित होकर) - सुजाता, वास्तव में इस वीडियो क्लिप से अत्यंत अधिक खतरनाक वीडियोस आज सुगम हुए हैं। आप तीनों समझ सकती हैं कि जिन लड़कियों को, ऐसे वीडियो देखने की लत हो जाए वे अपने सँस्कार भूल कर शोषण को उपलब्ध हो सकती हैं। 

फिर हम लोगों ने पिकनिक से वापसी की। उस रात हम डिनर पर फिर इकट्ठे हुए। वास्तव में, मेरी अन्य फ्रेंड्स में तब कोई रूचि नहीं रह गई थी। आगे के दिनों में वैतरणी पर, पिकनिक का असर देखना मेरी जिज्ञासा थी। जिस पर ही यह निर्भर करता था कि मैं स्कूल टॉपर हो सकने में सफल हो सकूँगा या नहीं ?

मंसूबों पर पानी फिरना, मगर अनभिज्ञ मुझे जानकारी नहीं थी कि अप्रत्याशित रूप से अगली शाम वैतरणी ने, अपने पापा एवं मम्मी के समक्ष पिकनिक में हुई सभी बातों को अक्षरशः कह सुनाया था। उसके पापा यद्यपि चपरासी मगर अनुभवी एवं बुध्दिमान व्यक्ति थे। उन्होंने मेरे मंतव्य को भाँप लिया था। वैतरणी पर इसे निष्प्रभावी करने के लिए उन्होंने अपनी बेटी को समुचित मार्गदर्शन भी कर दिया था।खुशफहमियाँ अगले कुछ महीनों में, दूसरों से छुपाते हुए वैतरणी ने, मुझसे ज्यादा अश्लील वीडियोस को देखने की इक्छा बताई थी। 

मन ही मन खुश होता हुआ मैं, प्रकट में उसे ऐसे वीडिओज़ देखने को मना करता। 

जब तर्क करते हुए वैतरणी कहती कि - टॉपर, बुराई की गहराई का माप हम नहीं कर सकेंगे तो उसमें डूबने से स्वयं को कैसे बचा सकेंगे ?

(भीतर ही भीतर खुश होता हुआ) मैं, उसकी इस बात पर अपनी हार मानता सा जताता था। फिर चूँकि वैतरणी के पास मोबाइल नहीं था अतः अपने मोबाइल पर शातिराई से गंदे वीडियोस की लिंक, सर्च कर उसे दे दिया करता था। 

एकांत में जाकर वैतरणी इन्हें देखा करती थी एवं बाद में, अपनी पलकें नीचे रख लजाते स्वर में, धन्यवाद के साथ मेरा मोबाइल मुझे लौटा दिया करती थी। 

कुछ कुछ दिनों के अंतराल में जब जब वैतरणी ऐसा करती मैं, अत्यंत खुश होता कि वैतरणी अश्लील वीडियो देखने की लत की शिकार हो गई है। तब मुझे लगा करता कि मैं, वैतरणी की लकीर मिटाने में सफल हो रहा हूँ। मुझे विश्वास होने लगा कि वैतरणी का ध्यान पढ़ाई पर उतना नहीं रह गया कि उसके प्राप्तांक से, मैं ज्यादा हासिल न कर सकूँ।

ऐसे समय बीता और बारहवीं की परीक्षा हुई। फिर आईआईटी जेईई की एग्जाम भी हुई। 

अब प्रतीक्षा थी परिणामों की, वह घड़ी भी आई जब बारहवीं के परिणाम आये। मेरा सपना साकार हो गया, मुझे स्कूल में सर्वोच्च स्थान मिल गया। मैं बहुत खुश हुआ लेकिन जब यशस्वी का परिणाम ज्ञात हुआ मेरी ख़ुशी, काफूर हो गई। 

मैं, उसे अपनी जगह व्दितीय स्थान पर देखना चाहता था मगर वह, सातवें स्थान पर आ सकी थी। 

अब मैं चाह कर भी खुश नहीं हो पा रहा था। जो लड़की 11 कक्षाओं तक निरंतर सर्वप्रथम बनी हुई थी। सबसे महत्वपूर्ण कक्षा में बुरी तरह पिछड़ गई थी। उसके आगे वह वह लड़के-लड़कियाँ आ गईं थीं। जिनके, उससे आगे निकलने की किसी को कल्पना भी नहीं थी। 

लज्जित अब मैं, अपनी स्वार्थपरता पर स्वयं को लज्जित अनुभव कर रहा था। मैंने अपनी लकीर बड़ी करने के लिए, उस लड़की की लकीर मिटा कर अनेकों से छोटी कर दी थी। 

वैतरणी मार्कशीट लेने स्कूल आई थी। उस समय स्कूल में होते हुए भी मैं, उसके सामने जाने का साहस नहीं जुटा सका था। 

रही कसर आईआईटी जेईई के परिणाम वाले दिन निकल गई। मुझे देश में 775 स्थान मिला, उससे बहुत नीचे वैतरणी 3132 पर आ पाई थी। 

वैतरणी पढ़ने के प्रति समर्पित, अत्यंत प्रतिभावान लड़की थी। 

दोनों परीक्षाओं के परिणामों ने अन्य विद्यार्थी में उसके बारे में घटिया घटिया कमेंट सुनने मिल रहे थे। वह मुझे सहन नहीं हो रहा था। 

मैं अपने ग्लानि बोध में, जमीन में गड़ा जा रहा था। वैतरणी अपना मोबाइल भी नहीं रखती थी कि उससे बात कर सकूं। तब झूठे बहाने से, मैंने अपने दोस्तों से उसके घर का पता लगवाया और उसके घर पहुँच गया। 

हमारे आलीशान घर की तुलना में उनका घर बहुत छोटा था। उसके माँ-पापा छोटे से बैठक कक्ष में बैठे हुए थे। 

उन्हें, मैंने अपना परिचय दिया था। उन्होंने तब वैतरणी को बुलाया था। मुझे अपने घर आया देख कर वह चकित थी। 

औपचरिकता में उसने मुझे कहा - बारहँवी एवं आईआईटी जेईई के अत्यंत अच्छे परिणामों के लिए बधाई। 

इस पर अपनी रुआँसी सी होती आवाज को मैं, कठिनाई से किसी तरह नियंत्रित कर सका था। मैंने पूछा था - वैतरणी, तुम्हारे ऐसे कमजोर परीक्षा परिणाम का क्या कारण है?

वैतरणी ने कहा - दुःखद रूप से मैं पढ़ाई में वह एकाग्रता बनाये नहीं रख सकी, जो इन प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवश्यक होती है। इस कारण पिछड़ गई हूँ। 

मैंने पूछा - इससे, तुम बहुत ही दुःखी होगी?

उसने सपाट स्वर में उत्तर दिया - दुःख करने से अब क्या लाभ। 

मैंने पूछा - आगे क्या करोगी ?

इस बार उत्तर, उसके पापा ने दिया - हमारे ही शहर में आरंभ हुए नए आईआईटी महाविद्यालय में यदि सीएस में प्रवेश मिल सका तो वैतरणी यहाँ पढ़ लेगी। 

मैंने कहा - मगर अंकल, इस कॉलेज की डिग्री से, बहुत अच्छे जॉब की संभावना नहीं रहेगी। 

अंकल - बेटा, मैं चपरासी बन सका हूँ। मेरी बेटी आईआईटी में पढ़कर जो भी बन सकेगी, मेरे तुलना में वह बहुत बड़ी ही बात होगी। 

तब तक, वैतरणी की माँ प्लेट में मिठाई ले आई थी। मुझसे उन्होंने कहा - लो बेटा, हमारी बेटी की उपलब्धि पर मुहँ मीठा करो। 

वैतरणी, उसके पापा एवं माँ की बातों से मैं भीतर तक हिला हुआ था। मैंने किसी तरह मिठाई के ग्रास गले से नीचे उतारे थे फिर हाथ जोड़ सबसे विदा ली थी।

पश्चाताप वापिस लौटते हुए अपने किये नीच कर्म का पश्चाताप हो रहा था मेरा अंर्तमन मुझे धिक्कार रहा था। वैतरणी की प्रतिभा अनुरूप, वैतरणी एवं उसके परिवार को जो प्रतिष्ठा एवं चर्चा आज, मिलनी चाहिए थी उससे ये लोग, मेरे कारण वंचित हुए थे। 

फिर कुछ दिनों बाद हमारी मुलाकात शहर के आईआईटी में कॉउंसलिंग के समय हो सकी थी। जब उसे ज्ञात हुआ कि मैं भी इसी कॉलेज में सीएस में प्रवेश ले रहा हूँ तो उसे अत्यंत अचरज हुआ। 

उसने पूछा - टॉपर, तुम्हें तो मुंबई आईआईटी में प्रवेश मिल सकता था। तुम, इस नये कॉलेज में पढ़ कर अपने भविष्य की संभावनाओं पर क्यों खतरा ले रहे हो ?

मैंने उत्तर दिया - हममें निहित टैलेंट, हम कहीं भी रहें बना रहता है। मुझसे ज्यादा टैलेंटेड तुम, यदि इस कॉलेज में पढ़ सकती हो तो मैं क्यूँ नहीं!

मेरे उत्तर की प्रतिक्रिया में, उसके मुखड़े पर विचित्र भाव परिलक्षित हुए एवं उसने, मुझे, दयनीय दृष्टि से निहारा था। 

फिर हमने विदा ली थी। 

इस बीच परिणामों के अनुसार सुजीत ने गौहाटी तथा सुजाता ने शहर के ही स्टेट इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन ले लिया था। जबकि रिया एवं अभिनव एक साथ दक्षिण के महँगे कॉलेज में पढ़ने चले गए। गौहाटी जाने के बाद आगे विदेश में बसने के लिए महत्वाकांक्षी सुजीत फिर हमारे संपर्क में नहीं रह गया। 

प्रायश्चित - Iइस तरह इस कॉलेज में मेरा प्रवेश लेना, मेरे शर्मनाक अपराध के प्रायश्चित रूप में पहला काम था। 

फिर कॉलेज आरंभ हुए थे सब चीजें एवं साथी यहाँ नये थे। मगर बाल्यकाल से सहपाठी रही वैतरणी, यहाँ भी मेरे साथ थी। ऐसा होते हुए भी और सहपाठियों के सामने ना तो वैतरणी और ना ही मैं, अपने इस दीर्घकालीन परिचय का प्रदर्शन नहीं करते थे। 

हम दोनों के अपने अलग फ्रेंड्स थे। क्लासेज शुरू हुए दो तीन दिन हुए थे। एक दिन, वह लाइब्रेरी में अकेली थी, तब मैंने उसके पास जाकर फुसफुसाते हुए उसे ग्राउंड में आने को कहा। वह जिज्ञासा साथ लिए कुछ मिनट बाद आ गई। 

मैंने कहा - वैतरणी, तुम्हारा मोबाइल नंबर दो। 

मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उसने बताया कि - मैं अभी मोबाइल नहीं रखती हूँ। 

मैंने पूछा - फिर तुम्हें कोई मेसेज करना हो तो जरिया क्या हो ?

उसने कहा - मैं, तुम्हें फेसबुक पर ऐड कर सकती हूँ। मैसेंजर पर यह किया जा सकेगा। 

उसने लैपटॉप खोलते हुए फेसबुक से मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट सेंड किया। यहाँ भी यह देख मुझे अचरज हुआ कि उसकी आईडी वैतरणी के नाम ना होकर, तरुणी नाम से बनाई गई थी। 

मैंने पूछा - तरुणी, कौन है। 

वैतरणी ने उत्तर दिया - मुझे घर में, इसी नाम से बुलाया जाता है। मुझे सरलता से कोई खोज न सके अतः वैतरणी नाम से आईडी नहीं बनाई है क्यूँकि निराला सा यह, सिर्फ मेरा नाम है। 

उसकी हर बात में ऐसी सावधानी, अनुकरणीय थी। मुझे फिर अपराध बोध हुआ कि मैंने अपने पर, उसके विश्वास का गलत प्रयोग किया था। मैं, अपना वह निकृष्ट काम हमेशा के लिए भूल जाना चाहता था मगर वह मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। 

अपने दिमाग को सप्रयास नियंत्रित कर, वैतरणी को ग्राउंड में बुलाने के अपने अभिप्राय पर आते हुए मैंने कहा - वैतरणी, मुझे लगता है कि जीवन भर कोई तुम्हारी तरह पढ़ने बस से, खुश नहीं रह सकता। अगर मेरी मानो तो मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।

मेरी इस बात पर वैतरणी की आँखों में जो भाव दिखे वह साफतौर पर संदेह के भाव थे जैसे कि वह सोच रही हो कि मैं अब उसके जीवन में, कौनसी नई मुसीबत खड़ी करने वाला हूँ। 

मैंने उसे दिलासा देने के लिए कहा - वैतरणी, मैं तुम्हारे हित की सोच रहा हूँ। वैतरणी ने तब कहा - कहो, क्या कहना चाहते हो ?

मैं - वैतरणी, मैं चाहता हूँ तुम स्पोर्ट्स में आओ, तुम्हारी आगे के जीवन में उससे फिटनेस सुनिश्चित हो सकेगी। मैं चाहता हूँ तुम टेनिस खेलो।

वैतरणी - मुझे रैकेट पकड़ना तक नहीं आता, मुझे सिखाएगा कौन और इतना धैर्य किसके पास होगा जो मुझ जैसी, नौसिखिया के साथ समय ख़राब करे। 

मैं - यह तुम मुझ पर छोड़ो, मैं टेनिस का बहुत अच्छा प्लेयर हूँ, शायद मेरा स्कूल चैंपियन होना तुम जानती होगी। आरंभिक दिनों में, मैं तुम्हें ऑवरली बेसिस पर कोर्ट बुक करते हुए, इतना प्रशिक्षित करूँगा कि कुछ दिनों बाद, कॉलेज में तुम्हें साथ खेलने वाले मिल सकें और तुम्हारा खेल निखर सके।

बुराई की जानकारी से बुराई में लिप्तता हमारे दो मित्र के बीच हमसे, समानांतर कुछ और चल रहा था। 

वॉटरफॉल की पिकनिक पर मेरी छेड़ी गई चर्चा के, मेरे अभिप्राय में पवित्रता नहीं थी। कुप्रभाव की जद में उस समय मैं वैतरणी को लेना चाहता था मगर उस चर्चा का बुरा असर अभिनव और रिया पर अधिक पड़ा था। 

रिया ने मुझसे कोई बात नहीं की लेकिन उस पर, मेरे मोबाइल पर देखी वीडियो क्लिप का ख़राब असर ऐसा हुआ था। वह अपने नेट सर्फिंग में सर्च कर-कर के अश्लील साहित्य एवं वीडियो, सबसे छुपा कर पढ़ने-देखने लगी थी। इनके दुष्प्रभाव से उसमें जो अनुभूतियों जागृत होतीं वह उन्हें अभिनव से शेयर करती। 

ऐसे में स्कूल में ही एकांत ढूँढ अभिनव एवं रिया, एक दूसरे के तन-बदन से चिपटा-चिपटी करते। नतीजा यह हुआ कि पढ़ने से उनका ध्यान उचट गया। और जब बाकि के स्टूडेंट्स परीक्षा में अधिकतम अंक प्राप्ति की कोशिशों में जुटे थे, तब अभिनव एवं रिया एक दूसरे को अंक में समाने के उपाय ढूँढा करते। 

ऐसे में बारहवीं के साथ ही आईआईटी जेईई, दोनों में अभिनव एवं रिया नतीजे, परिवार की आशा एवं अपेक्षा से अत्यंत निराशाजनक आये। 

दोनों ही अति धनवान परिवार के थे। अतः दोनों के चाहे जाने पर उनके पेरेंट्स ने सुदूर दक्षिण के एक महँगे कॉलेज में दोनों को प्रवेश दिला दिया। यह उम्र का खतरनाक पड़ाव होता है। उस कॉलेज के खुले वातावरण में दोनों ही सारे किस्म के ऐब में पड़ गए। 

स्मोक-ड्रिंक्स और पब में धींगा मस्ती, दोनों के दैनिक दिनचर्या के अंग हो गए। उन्हें वहाँ के ड्रग माफिया ने अपने गिरफ्त में ले लिया। दोनों ही विभिन्न तरह के ड्रग्स के प्रभाव में रहने लगे। ऐसे ड्रग्स के कुप्रभाव में ही उनकी कच्ची उम्र में, उनमें जो नहीं होना चाहिए था वह भी हो गया। दोनों के बीच अक्सर शारीरिक संबंध भी होने लगे। 

एक छुट्टी के दिन अभिनव, रिया को साथ लेकर अपनी कार में, लॉन्ग ड्राइव पर निकला। दोनों स्मोकिंग के जरिये ड्रग्स के नशे में, आगे की सीट पर ही एक दूसरे के शरीर से छेड़छाड़ करते हुए शहर से बाहर के मार्ग पर बढ़ रहे थे। 

तब अभिनव का कार पर से नियंत्रण नहीं रह गया। तेज गति में चलती उनकी कार, साइड में चल रही, एक बूढी महिला के ऊपर चढ़ गई। महिला ने स्पॉट पर ही दम तोड़ दिया। कार आगे जाकर पलट गई, उसी समय कार का गेट खुल जाने से रिया कार से बाहर जा गिरी। 

अभिनव के एयर बेग खुल जाने से उसे ज्यादा चोट नहीं आई, जबकि रिया के बायें पाँव में, कंपाउंड फ्रैक्चर होने से उसे, ऑपरेट करते हुए रॉड डलवानी पड़ी। इस दुर्घटना से रिया को जीवन भर के लिए, उसकी चाल में लंगड़ाहट का अंदेशा हो गया। 

रफा-दफा अभिनव के पापा ने, मृतक बूढी महिला के घरवालों को बड़ा कंपनसेशन देते हुए, केस रफादफा तो करवा लिया, लेकिन साफ़ दिखाई पड़ता था कि इस हादसे के अवसाद से, उबरने में अभिनव एवं रिया के जीवन का स्वर्णिम काल व्यर्थ बीत जाने वाला था। 

ज़ाहिर था कि बुराई के जिस पूर्व ज्ञान के होने को मैंने, बुराई से बच सकने का उपाय प्रतिपादित किया था। वैसा कम स कम अभिनव एवं रिया की दृष्टि से सही सिध्द ना हो सका था। 

बुराई के ज्ञान ने, अभिनव एवं रिया को उससे बचने में मदद नहीं की थी अपितु वे बुराई में ही लिप्त हुए थे। वह भी इस बुरी तरह कि अपना यौवनकाल ही व्यर्थ कर बैठे थे। 

प्रायश्चित -IIइधर वैतरणी और मेरा कॉलेज एवं घर एक ही शहर में होते हुए भी, हमें हॉस्टल में ही रहना होता था। 

हममें तय हुए अनुसार, मै स्पोर्ट अकैडमी में प्रतिदिन सूर्योदय के समय पर ही, एक घंटे के लिए टेनिस कोर्ट बुक करवाने लगा। मैं, वैतरणी को अपनी बाइक पर बैठा ले जाता एवं पूर्ण मनोयोग से उसे टेनिस सिखाने लगा। 

रैकेट पकड़ने से सिखाने की शुरुआत करके उसे वॉली खिलाता, वॉली खेलने की कोशिश में वैतरणी कुछ मौकों पर अजीबोगरीब तरह से कोर्ट में गिर जाया करती। 

इस पर मुझे हँसी आ जाती तो वह रोने लगती। तब उसे चुप कराकर पुनः खेलने के लिए मनाना अति दुष्कर हो जाता। 

मेरे स्तर के प्लेयर का, प्रतिदिन घंटा भर वैतरणी की तरह नौसखिया के साथ खेलते देखना, देखने वालों के लिए अचंभे की बात होती। मगर मैं, धैर्य पूर्वक उसे सिखाता रहा।

सर्विस, ग्राउंड स्ट्रोक, फोरहैंड/बैकहैंड, क्रॉस कोर्ट प्लेसिंग, नेट पर, डीप एवं डाउन द लाइन सभी तरह से खेलने की, उसे प्रैक्टिस कराते हुए उसे पॉइंट एवं स्कोरिंग के नियम भी मैंने बताये थे। 

इसे अपनी तारीफ कहुँ या वैतरणी का खेल के लिए लगन एवं समर्पण कि, वैतरणी का खेल लगभग एक माह के समय में ही, इस स्तर का हो गया कि उसे कॉलेज के टेनिस कोर्ट में किसी भी प्लेयर से खेलने में कोई संकोच नहीं रह गया। 

मैं वैतरणी में निहित, पढ़ने के अतिरिक्त अन्य प्रतिभा को तराश रहा था। तब यहाँ से बहुत दूर, अभिनव एवं रिया के साथ हादसा हुआ। 

पीड़ित मित्र से मिली प्रेरणा रिया के मुझ पर दोषारोपण से मैं, विचलित हुआ। जिससे, वैतरणी एवं सुजाता के साथ अभिनव से मिलने जाने का साहस नहीं कर सका। अभिनव के घर में उपचार के दौरान, वैतरणी एवं सुजाता उससे मिल आये थे।

फिर इन वर्षों के पूरे घटनाक्रम पर सोचने के उपरांत अभिनव से मित्रवत रहा मेरा स्नेह मुझे, उससे मिलने खींच रहा था। 

अभिनव के पापा ने, ड्रग एडिक्शन से मुक्त कराने तथा साथ ही हादसे के सदमे से, मुक्त कराके अभिनव में आत्मविश्वास पुनः स्थापित करने के विचार से, अभिनव को सेमेस्टर में ड्राप दिलवा दिया था। 

मैं अभिनव का सामना करने का साहस बटोर कर बाद में मिलने गया था। 

अभिनव तब तक काफी सामान्य हो चुका था। 

मुझे सामने देख भाव-विह्वल होकर वह मुझसे मुझसे गले मिला था। 

चेहरे पर पछतावे के भाव सहित बोला - मुझसे बड़ी भूल हुई है। किसी के जीवन का भरोसा नहीं कि कितना है। ऐसे में जितना भी समय मिलता है अपने पूरे होशो-हवास में इसकी समस्त विलक्षणता को अनुभूत करते जीना चाहिए। मगर इसे समझे बिना, मैंने कई महीने ड्रग्स के नशे में बेखुदी में गँवा दिए। इसकी चपेट में एक महिला की जान ले ली एवं रिया के अंग-भंग की विवशता में जीने को बाध्य कर दिया। 

मैंने ढाँढस बंधाते हुए कहा - हम मनुष्य हैं कुछ भूलें हम सभी से हो जाती हैं। उसका पश्चाताप करते हुए आगे, हुई क्षति की जितनी संभव हो उतनी भरपाई हमें करनी चाहिए। 

इस बात से अभिनव की आँखों में मुझे संकल्प दिखाई दिया उसने कहा - हाँ, टॉपर बिलकुल, पहले में रिया से फ़्लर्ट कर रहा था। अब उसे मैं प्यार करना चाहता हूँ एवं मेरे कारण उसके पैरों में आये दोष के होते हुए भी, समय आने पर मैं उससे विवाह कर उसे अधिकतम सुख सुनिश्चित करने का संकल्प रखता हूँ।   

अभिनव ने यह बात सहज रूप से कही थी लेकिन इसने मुझ पर अत्यंत भला प्रभाव किया। मेरे वैतरणी को लेकर किये जा रहे प्रायश्चित एवं उसके लिए अधिकतम संभव किये जाने के मेरे संकल्प को और दृढ़ता प्रदान कर दी। 

मुझे सोच में डूबा देख अभिनव ने पूछा - क्या हुआ, टॉपर कहाँ खो गये, तुम?

मैंने भाव छिपाते हुए कहा - सच कह रहे हो तुम, अभिनव। तुम्हारे इन विचारों पर मेरे हृदय में आदर उमड़ रहा है। जिन्हें सुनकर मैं सोचने लगा था कि ये लड़कियाँ, जो हमारी पूरक होती हैं, उन पर लोग छल- अत्याचार, कैसे कर पाते हैं? तुम्हारी भावना को जानकर मुझे रिया के लिए बहुत ख़ुशी हो रही है। 

अभिनव को अपने विचारों पर, मेरे समर्थन ने खुश किया। फिर मैंने उससे विदा ली।   

अगले दिन से मैं वैतरणी को लेकर अपने एजेंडे पर पूर्ण मनोयोग से लग गया। 

परिणाम स्वरूप अगले दो वर्ष में तो वह, ऐसी प्लेयर हो गई कि उसने मिक्स्ड डबल्स में मेरे साथ जोड़ी में रहते हुए आईआईटीज के बीच खेले जाने वाले टूर्नामेंट में चैंपियनशिप जीत ली। वीमेन डबल्स में भी उसने फाइनल खेला एवं सिंगल्स में भी उसका प्रदर्शन प्रशंसनीय रहा। 

यही नहीं इतना सब करते हुए वैतरणी ने, पहले पाँच सेमेस्टर में टॉप के पॉइंटर्स हासिल किये। यहाँ फिर मैं उससे पीछे, व्दितीय स्थान पर आने लगा। 

ना जाने मगर अब क्यों मुझे, उससे कोई ईर्ष्या नहीं होती थी। अब मैं, उसे पूर्व के भाँति सर्वोच्च स्थान पर देख प्रसन्न होता था। उसने अपने पढ़ाई की रिदम पुनः प्राप्त कर ली थी। 

यह सब होते देख कभी कभी मुझमें वैतरणी से यह जानने की इक्छा बलवती होती कि स्कूल में वह जिन वीडियोस को देखने में मुझसे, अपनी रूचि प्रदर्शित करती थी। उसकी, उस लत को अब क्या हुआ?

मैं अपनी इक्छा दबा लेता, अब मैं वैतरणी से अपने घनिष्ठ होते संबंध पर कोई खतरा नहीं देखना चाहता था। 

उसे ऐसा सब हासिल करने में मददगार हो सकना, मेरे प्रायश्चित की दूसरा सफल चरण था। 

हम दोनों के छटवे सेमेस्टर में आ जाने पर अब बारी थी कि मै उसे कैंपस चयन के लिए तैयार करूं। 

हमारा आईआईटी नया होने से, यहाँ ज्यादा कंपनीज कैंपस प्लेसमेंट देने को लेकर आकृष्ट नहीं होतीं थीं। तब यदा कदा ही आती कोई अच्छी कंपनी में वैतरणी कोई अवसर न गंवाये, ऐसा मैं चाहता था। 

इस बात को लेकर मेरी चिंता यह थी कि कोर्स के बेजोड़ ज्ञान होने के अतिरिक्त, अन्य फ़ील्ड्स/विषयों में वैतरणी लगभग कोरी थी। जबकि बहु-चरणीय चयन प्रक्रिया में, अच्छी कंपनीज यह भी सुनिश्चित करती थीं कि सब्जेक्ट के इतर भी, कैंडिडेट अच्छा जानकार हो। अर्थात उनके चयनित स्टूडेंट में बहुमुखी प्रतिभा हो। 

इस दृष्टि से अच्छे पॉइंटर्स के साथ ही टेनिस की उत्कृष्ट प्लेयर होना, वैतरणी की उपलब्धि थी। मगर अन्य तरह की रूचि न होने से, वैतरणी के सामान्य ज्ञान के साथ ही अन्य विषयों का थोड़ा भी ज्ञान न होना, अब भी उसकी बड़ी कमी थी। 

वैतरणी का ज्ञान अन्य क्षेत्र में भी बढ़ सके, इस हेतु मैंने यह उचित समझा कि मैं उसे एक स्मार्ट फोन गिफ्ट करूँ। इस हेतु मुझे उसका समीप आ रहा जन्मदिन सही अवसर लगा। 

जब मैंने इस उपहार के देने की मंशा वैतरणी को बताई तो उसने, इसे स्वीकार करने के पहले, अपने पापा से अनुमति लेने की बात कही। 

इस दौर की 21 वर्षीया इस लड़की का ऐसा अनूठा गुण ही मुझे, उसका मुरीद बनाता था। यद्यपि वैतरणी की यह सरलता मुझे विश्व के आठवें अचरज से कम नहीं लगती थी। 

संतोष की बात यह रही कि उसके पापा ने स्मार्ट फोन के प्रयोग में, वैतरणी को निर्देश देते हुए उपहार ले लेने की अनुमति दे दी। और तब उसके जन्मदिन पर मैने वैतरणी को ज्यादा कीमती तो नहीं मगर एक स्मार्ट फोन गिफ्ट किया। 

वैतरणी में, यूँ तो मैं वैसी कोई बात नहीं देख रहा था तब भी मैंने उसे सलाह दी कि बारहवीं क्लॉस की तरह बुराई देखने में, वह मोबाइल का दुरुप्रयोग ना करे।

इस बात पर वह खिलखिलाकर हँसी थी। उसकी भावभंगिमा बयान कर रही थी कि तब उसने, मुझे बुध्दू बनाया था। फिर बात आई-गई हो गई।

अब वैतरणी के हाथ में हर समय, मोबाइल होने से उसका नेट सर्फिंग करना आसान हुआ था। वह मेरे सजेस्ट की गईं वेव साइट्स पर जाकर, अपनी जानकारी बढ़ाने लगी थी। 

भाग्य की बात थी कि उस वर्ष, हमारे यहाँ माइक्रोसॉफ्ट जैसी ड्रीम कंपनी आई। हमारे कॉलेज से माइक्रोसॉफ्ट ने सिर्फ वैतरणी का चयन किया, वह भी तीस लाख के पैकेज पर। मेरा खुद का, जबकि चयन नहीं हुआ था तब भी मैं असीम रूप से प्रसन्न था। 

प्रसन्नता का ठिकाना उसके चपरासी पिता एवं माँ का भी नहीं था मगर अचरज था कि वैतरणी इतनी बड़ी सफलता को सहज पचा गई थी। 

उसने मेरा प्लेसमेंट ना होने पर रोते हुए दुःख प्रकट किया था। उसकी बड़ी कटीली सी आँखों में तब अश्रु, मोती से लग रहे थे। वह बहुत ही प्यारी लग रही थी इसलिए और भी ज्यादा कि उसका हृदय मेरी असफलता को लेकर द्रवित हुआ था। 

यद्यपि उपलब्धियाँ स्वयं वैतरणी एवं उसके पापा के सँस्कार एवं मार्गदर्शन से मिल सकीं थीं। फिर भी उसमें मैं, अपनी भी अल्प भूमिका देख रहा था। यह देख पाना मुझे, मेरे प्रायश्चित की तीसरी सफलता प्रतीत हुई थी। सुखद आश्चर्य समय फिर पँख लगा उड़ा था। हमारी डिग्री पूर्ण हुई थी। 

वैतरणी माइक्रोसॉफ्ट में करियर निर्माण को चली गई थी। मैं अपने पापा की इंडस्ट्री में, काम देखने लगा था। वैतरणी और मेरी व्यस्तताओं में, मोबाइल पर आपस में बात कभी कभी ही हो पाती और ऐसे पाँच वर्ष बीत गए थे। 

तब एक शाम वैतरणी के माँ-पापा मेरे सुखद आश्चर्य रूप में अचानक हमारे घर आये। उन्होंने मेरे मम्मी-पापा, मेरे भाई एवं मेरे बीच यह बात कही कि - माइक्रोसॉफ्ट में वैतरणी के बॉस ने उससे विवाह का प्रस्ताव किया है। आगे उन्होंने यह भी बताया कि - वैतरणी ने यह जानकारी देते हुए उनसे कहा है कि एक बार वे मेरे मम्मी-पापा एवं मुझसे जाकर पूँछे कि क्या मैं, वैतरणी से विवाह करना चाहूँगा? 

यह बताते हुए वैतरणी के पापा ने हाथ जोड़ मेरे पापा से कहा - सर, यूँ तो आपसे, हमारी कोई तुलना नहीं है मगर अपने बेटी से प्रेम के वशीभूत, उसकी ख़ुशी के लिए, आप से पूछने का साहस जुटा कर आया हूँ। अगर आपको यह अपनी शान में गुस्ताखी लगे तो कृपया क्षमा कीजिये। 

मेरे पापा ने प्रश्नात्मक निगाहों से मेरी ओर देखा और जब मेरी आँखों में वैतरणी से विवाह की सहमति पढ़ ली तो उन्होंने, वैतरणी के पापा एवं मम्मी से हाथ जोड़कर कहा - अरे भाईसाहब, क्यूँ शर्मिंदा करते हो। वैतरणी जैसी सुशील एवं प्रतिभाशाली बेटी का हमारे घर आना, हमारे सौभाग्य की बात होगी। मेरी कोई बेटी नहीं, वैतरणी के आने से हमारे जीवन की यह कमी दूर हो जायेगी। 

सुखद संयोग यह रहा कि अभिनव ने रिया के पैरों में आये दोष, जिससे वह लंगड़ा कर चलती थी के बावजूद उसका साथ नहीं छोड़ा। जबकि कम ही लड़के होते जो रिया के इस दोष के साथ उसका हाथ थामते, ऐसे में अभिनव ने रिया के पेरेंट्स से विवाह करने की इक्छा जताई। 

इस तरह हमारे विवाह के दो दिन पूर्व अभिनव एवं रिया परिणय सूत्र में आबध्द हो गए। 

वैतरणी पारफिर वह शुभ घड़ी भी आई जब वैतरणी एवं मेरा विवाह, कोरोना के इस समय में, अपेक्षित सादगी से संपन्न हुआ। ऐसा होने के साथ मुझे अनुभव हुआ कि मेरे ईश्वर ने मेरी गलती का प्रायश्चित की पूर्णतः, सुनिश्चित करते हुए मेरे पर अपना महान आर्शीवाद बनाये रखा है। 

हमेशा से, अपने हनीमून के लिए, मेरा पसंदीदा स्थान स्विट्जरलैंड था। मगर कोरोना एवं उस पर, वैतरणी की अभिलाषा कि वह देश में ही टूरिज्म को प्रोन्नत करने में सहयोगी हो। हमने देश में ही हनीमून का निर्णय लिया। पिछले वर्ष से निर्मित परिस्थितियों में कश्मीर जाने को लेकर घबराहट से प्रभावित लोग वहाँ पर्यटन को नहीं जा रहे थे। ऐसे हालत में कश्मीर के लोग अपनी आय की कमी से व्यथित थे। इसे दृष्टिगत रखते हुए वैतरणी ने अपनी ओर से उन्हें अवसर प्रदान करने के लिए, कश्मीर जाने की अभिलाषा दर्शाई। मैंने वैतरणी की इक्छा का आदर करते हुए कश्मीर के लिए आवश्यक बुकिंग करवाई। 

यद्यपि हमारे परिजन इस बात से कुछ भयाक्रांत थे मगर उन्होंने हमारी ख़ुशी के लिए हमारी ट्रिप को स्वीकृति दे दी। 

हम आज सुबह ही कश्मीर आए हैं। और अभी हम सुसज्जित शिकारा में डल झील की सैर पर हैं। 

यहाँ मैंने तय अनुसार अपने किये अपराध का वैतरणी के सम्मुख कॉन्फेशन करने के लिए, कहना शुरू किया है - वैतरणी, यह मैं उचित समय मानता हूँ कि मैं तुम्हें यह बताऊँ कि बारहवीं में हमारी वॉटरफॉल पर पिकनिक मेरी सुनियोजित योजना थी। तब मैं स्कूल में सर्वोच्च स्थान पर आने के लिए मर रहा था। 

मेरी यह महत्वाकांक्षा तुम्हारे कारण पूर्ण नहीं हो पाती थी। योजना अंतर्गत मैं तुम्हारा ध्यान पढ़ाई पर से भटकाना चाहता था। अकेले अध्ययन के बलवूते मैं तुम्हें पीछे नहीं कर पा रहा था अतः तुम्हें अश्लील वीडियो देखने की आदत देना, तब का मेरा मंतव्य था। 

जिसमें मैं सफल भी हुआ था। और वैतरणी पार कर तब मैं, प्रथम आ सका था। मगर मेरी महत्वाकांक्षा पूरी होने पर भी मैं, खुश नहीं हो सका था। उसका कारण, तुम्हारा कमजोर स्टूडेंट से भी पिछड़ कर सातवें स्थान पर आना था। 

ऐसा नहीं होता और मैं प्रथम और तुम व्दितीय होतीं तो वैतरणी, मैं अपने बुरे कर्म को, कभी अपना अपराध ना मान पाता। 

तुम्हें सातवें स्थान पर देखने से मुझे अत्यंत ग्लानि बोध हुआ एवं तब मैंने तुमसे किये अपने छल का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। मुंबई आईआईटी में प्रवेश ना लेकर तुम्हें मिलने वाले कॉलेज में प्रवेश लेना मेरे प्रायश्चित का आरंभ था। 

मुझे ख़ुशी है कि मेरे ईश्वर ने इसके बाद मुझे अवसर सुलभ कराये और उसकी परिणिति में आज तुम मेरी परिणीता हुई हो। 

अपने किये छल की मैं आज तुमसे क्षमा माँगता हूँ। मैं ऐसा करना इसलिए उचित मानता हूँ कि अपने दांपत्य की बुनियाद में ही हमारे मध्य पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। 

मैं चाहता हूँ कि अब से आगे के जीवन में हम दोनों के बीच कोई राज, राज ना रहे। 

मेरे मुख से यह सुन कर वैतरणी खिलखिलाकर हँस पड़ी। 

उसके मुखड़े पर इस हँसी से उसके दोनों गालों पर सुंदर डिंपल निर्मित हो रहे थे। वैतरणी के इन डिंपल्स का मैं मन ही मन सदा से मुरीद था। मगर मेरी इस स्पष्टवादिता पर, उसका नाराज होने की जगह हँसना, मुझे असमंजस में डाल रहा था। 

वैतरणी ने मुझे ज्यादा असमंजस में नहीं रहने दिया, कहा - तुमने, चाहे जिस अभिप्राय से मुझे वह वीडियो दिखाया था लेकिन मैंने अभिप्राय सिद्ध नहीं होने दिया था। मैंने पिकनिक की एक एक बात अगली ही सुबह अपने पापा को बता दी थी। फिर पापा ने मेरा आगे का व्यवहार तय किया था। मैं, उसी अनुसार तुमसे व्यवहार किया करती थी। 

यह सुनकर चौंकने की बारी अब मेरी थी। मैंने ऐतराज के स्वर में वैतरणी से कहा - मेरी सब गंदी बातें तुम अपने पापा से कैसे कह सकीं, वैतरणी? तुम बहुत दुष्ट हो, उन पर मेरा इम्प्रैशन ही ख़राब कर दिया तुमने। 

वैतरणी मुस्कुराई संयत स्वर में बोली - बुरे काम का बुरा नतीजा भुगतने से तुम्हारा यूँ घबराना, कैसा?

मैं लज्जित हुआ, मैंने जिज्ञासा में उससे पूछा - फिर तुम्हारा, मुझसे मोबाइल पर वीडियोस की फरमाईश करना क्या होता था ?

वैतरणी - मैं, तुम्हारा मोबाइल लेकर, उस पर सब्जेक्ट की नेट सर्फिंग किया करती थी और तुम्हें देने के पूर्व हिस्ट्री डिलीट कर देती थी। 

मेरी उत्सुकता का अंत नहीं होने पा रहा था। मैंने फिर पूछा - तब बारहवीं एवं आईआईटी में मुझसे तुम्हारा पिछड़ना, कैसे हुआ यह सब?

वैतरणी फिर मुस्कुराई थी उसके डिंपल फिर स्पष्ट थे उसने धीमे स्वर में कहा - मैंने दोनों परीक्षाओं में, जितने प्रश्न हल किये वे सभी सही थे। मगर जानबूझकर मैंने कुछ प्रश्न छोड़ दिए थे। 

मैं तनिक उत्तेजित हुआ, बोला - वैतरणी भला तुम ऐसा कैसे कर सकती थी ?

वैतरणी - मेरे पापा एवं मैं, उस वर्ष तुम्हें मुझसे आगे के स्थान पर देखना चाहते थे। 

मैं - (हतप्रभ था) मगर इससे तुम्हें एवं पापा को क्या मिलना था?

वैतरणी - अति स्वार्थ लिप्सा में इक भटके (तुम)को सही मार्ग पर लाना हमारा लक्ष्य था। 

अब मैं ठंडा पड़ गया था, मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी सारी शक्ति निचोड़ ली हो। समर्पण के भाव में मैंने पूछा - अगर मैं, मार्ग पर नहीं आया होता तो क्या होता? 

वैतरणी - हमें ईश्वर पर एवं मेरी प्रतिभा पर भरोसा था, जिनके होने से मेरा कुछ बिगड़ना नहीं था। 

अब मैं वैतरणी की गोद में सिर रखकर निढाल पढ़ गया था - धीमे स्वर में जैसे अपने आप से कह रहा था - खुद वैतरणी ने ही, मेरी वैतरणी पार लगाकर, मुझे स्वर्ग के द्वार पर पहुँचाया है, धन्य हूँ, मैं। 

वैतरणी अब मेरे सिर एवं सीने पर अत्यंत प्रेम एवं कोमलता से थपकी दे रही है, कश्मीर की सुंदर वादियों से अभी अधिक सुंदर मुझे, मेरी वैतरणी अनुभव हो रही है। 

यह अनुभूति करते हुए मेरी आँखे मुंद जाती हैं एवं मेरे मनो-मष्तिष्क में वैतरणी के साथ आगामी जीवन को लेकर सुखद सपने तैरने लगते हैं। मैं तब उसके साधारण पापा-मम्मी के बारे सोचने लगता हूँ जिन्होंने अपनी बेटी के लालन पालन एवं उसके व्यक्तित्व निर्माण में अपना जीवन लगा दिया है। 

मैं मन ही मन संकल्प लेता हूँ कि हमारी आने वाली वंश बेल का लालन पालन मैं, राष्ट्रनिष्ठ एवं न्यायप्रिय नागरिक बनाने की दृष्टि से करूँगा।


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