Sarita Maurya

Abstract Fantasy Thriller


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Sarita Maurya

Abstract Fantasy Thriller


सपनों की हकीकतें

सपनों की हकीकतें

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परधानिनः- उनके पति पंचायत के प्रधान थे, इस नाते उन्हें सभी लोग परधानिन के नाम से संबोधित करते थे, कोई परधानिन भाभी कहता तो कोई चाची! वे भी यथायोग्य रिश्तों की मर्यादानुसार उसका निबाह करती थीं। गेहुंआ सा चेहरा, माथे तक घूंघट और घूंघट से झांकती लाल रंग की गोल बिंदी उन्हें ऐसी सुंदरता प्रदान करती थी कि बरबस ही सादगी सौम्यता और नम्रता ने मानो सशरीर आकार ले लिया हो। श्रेष्ठा होने का गुमान उन्हें छू तक नहीं गया था। उस समय की प्रथा के अनुसार घर की चौखट से बाहर कदम रखने से पूर्व मलमल की चादर अपनी साड़ी पर डालना कभी नहीं भूलती थीं ताकि गांव की प्रथानुसार स्त्रीसुलभ मर्यादा बनी रहे। उनकी स्वयं की दो पुत्रियां एवं दो पुत्र थे जो उम्र में प्रिया से काफी बड़े थे, इतने कि वह सबसे छोटी साधना दीदी के साथ भी खेल नहीं सकती थी। एक ही गांव लेकिन जिज्जी का ससुराल पक्षीय क्षेत्र होने के कारण प्रिया से उनके दो रिश्ते थे एक तरफ वह प्रिया की भाभी लगती थीं तो दूसरी तरफ बड़ी जिज्जी। वह जब भी उधर जाती तो जिज्जी हिदायत देतीं- या तो उसे उनके यहां दही देने जाना होता था या फिर लेने। वो जब भी वहां पहुँचती तो मानो उन्हें खुश्बू आ जाती और उसकी पसंद का दही, लड्डू या ऐसे ही अन्य खाने-पीने के पदार्थ उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते। वो नन्हीं प्रिया से इसरार करतीं कि वह उनके साथ बातें करे, आंगन में खेले और फिर उसकी हर बात पर हँसतीं, जब वह जाने को उद्दत होती तो फिर उसके लिए कुछ नई खाने की सामग्री अपनी बेटी से मंगवाकर रोकने के प्रयास करतीं। बालसुलभ प्रिया को अपनी जिज्जी के घर की बजाय बड़ी जिज्जी यानी परधानिन भाभी का घर अधिक अच्छा लगता था। एक दिन उसने अपने बड़ों से सुना कि काफी दिनों से वो बीमार रहने लगी थीं, पता चला उन्हें कोई बीमारी हो गई थी, ऐसी बीमारी कि प्रिया का उनके घर जाना लगभग छूट गया।

आज मेघों ने मानो एक अलग ही रूप ले लिया था और न थमने की कसम के साथ बरसे चले जा रहे थे मानो धरा को जलमग्न करके ही मानेंगे। चादर के अंदर भी ठंड से सिकुड़ती नन्हीं प्रिया को ठीक से नींद नहीं आ रही थी और जागने का मन भी नहीं कर रहा था, तभी उसे लगा कि उसकी चारपाई के पास स्टूल पर कोई बैठा हुआ था। वह कुछ बोल पाती इससे पहले ही परधानिन भाभी की आवाज़ उसके कानों में टकराई, वो उसके सर पर स्नेहसिक्त हाथ रखे पूछ रही थीं कि वह उनसे मिलने क्यों नहीं गई, वो तो कब से उसकी राह देख रही थीं। फिर खुद ही बोलीं कोई बात नहीं लो मैं ही आ गई, और हां जब भी तुम्हें मेरी जरूरत हो बुला लेना मैं आ जाया करूंगी बेटा, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं। प्रिया उनकी लाल गोल बिंदी के बारे में पूछना चाहती थी और जानना चाहती थी कि वह उसे इतना प्यार क्यों करती थीं? अचानक उसे अपने कान में घरवालों की आवाजें सुनाई देने लगीं, इससे पहले कि वह परधानिन भाभी से कुछ पूछ पाती उन्होंने उसके सिर पर आशीर्वाद और स्नेहसिक्त हाथ फेरा, बांहें फैलाईं और ग़ायब हो गईं। प्रिया की नींद टूटी तो वो पसीने-पसीने हो रही थी। पता चला कि उस रात सबकी लाडली परधानिन हमेशा के लिए सो चुकी थीं, शायद एक नवजीवन की शुरूआत के लिए। परधानिन भाभी की समाधि उसी रास्ते में पड़ती थी जिस रास्ते से उसे विद्यालय जाना होता था। जाने क्यों कई बार उसे ऐसा लगता कि जैसे वह दो घड़ी रूक कर उन्हें पुकारेगी तो वो पक्का उसकी आवाज़ सुनकर मुस्कुराती हुई समाधि से बाहर आ जायेंगी और कहेंगी ‘‘हां बेटा, कैसी हो’’? लेकिन बाकी बच्चे वहां से गुजरते समय अपनी चाल तेज कर लेते कि कहीं परधानिन भूत बनकर उन्हें पकड़ न लें। धीरे-धीरे पूरे गांव में प्रसिद्ध हो गया कि परधानिन फुलवारी में भूत बनकर घूमती थीं। परधानिन भाभी ने दुनिया से जाने के बाद भी जैसे उसका मोह नहीं छोड़ा था तभी तो जब कभी वह उदास होती वो उसके सपने में आकर उसे ढाढस बंधाया करतीं और कहतीं कि वे कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ेंगी। वो समझ नहीं पाती थी कि उसके साथ ऐसा क्यों होता था? और जो उसके साथ घटित होता था क्या वह औरों के साथ भी होता था? 

मुन्नी से मीरा तकः

याद नहीं कि परधानिन ने कब उसके सपनों में आना छोड़ा लेकिन अगली कड़ी में मुन्नी भाभी के दुनिया से जाते ही उसके सपनों में इज़ाफा जरूर हो गया था। वह जब भी रोती, जब भी उसके साथ कोई दुखद घटना होती तो वे झट से मानो आ जातीं उसे अपनी गोदी में दुबकाने के लिए। माथे पर छोटी सी गुलाबी आभा लिये बिंदी, नाक में गोल सादी सी नथ और हाथ में दोहरे दाँतों की डिजाइन वाला कंघा। बस उसके लंबे बाल खोलकर बैठ जातीं, उन्हें सहलातीं, कंघी करतीं और बोलती जातीं ‘मेरी बिटिया तुम परेशान नहीं होना, तुम्हारी सारी मुसीबत मैं अपने सिर ले लूंगी बस तुम किसी से ये नहीं कहना कि मैं तुमसे मिलने आती हूं, मैं करूंगी दुनिया से तुम्हारी रक्षा। जैसे ही वह उनकी तरफ कदम बढ़ाती वे मुसकुराती हुई कहतीं कि उनके जाने का समय हो गया, और गायब हो जातीं। 

अब वह जीवन के झंझावात झेलते-झेलते छब्बीस बरस की हो चुकी थी। वह जानती थी कि कोई उसकी इस बात से न तो सहमत होता था न ही इत्तेफाक रखता था कि चाहे उसे सपना, कल्पना, आत्मा या कुछ भी मान लिया जाये लेकिन सतत एक ही तरीका एक ही सूरत उसे इतने वर्षों से ढाढस बंधाती चली आ रही थी। अम्मा के अनुभव भी उससे कुछ अलग थे लेकिन थे। आज कई दिनों से वह मानसिक रूप से हद से ज्यादा परेशान थी और रोज सपनों में मुन्नी भाभी आकर उसके बाल संवार-संवार कर उसे ढाढस बंधा रही थीं। उन्होंने उसे आगाह किया कि वह आगे से किसी को उनके आने की सूचना न दे क्योंकि दुनियावाले पारलौकिक दुनिया के सत्य पर यकीन नहीं करते। मानवीय स्वभाववश वह स्वयं को रोक नहीं पाई। आज उसने जो महसूस किया वह सच में ह्रदयविदारक था, मुन्नी भाभी आई तो थीं लेकिन उनकी आंखों में आँसू थे और मानो खुली हुई बांहों से कुछ फिसल रहा था। वे इतना ही बोल पाईं मैंने मना किया था न बेटा-‘‘अब जीवन के रास्ते तुम्हें स्वयं तय करने पड़ेंगे, मैं फिर कभी नहीं आ सकूंगी, तुम्हारी भूल या यूं कह दो कि इस दुनिया पर विश्वास करने की सजा मुझे मिलने जा रही है।" उसे लग रहा था मानो कोई डोर पीछे से उन्हें खींच रही थी, धुंध के पार अपनी आंखों में छलछलाते आँसू लिये वे खोई जा रही थीं, हां आज उनकी साड़ी का रंग लाल नहीं सफेद और सुनहरा था। 

मीरा भाभी से उसका मात्र स्नेह का रिश्ता था, और ये रिश्ता भी अट्ठारह बरस के लंबे अंतराल में टूटा तो नहीं था लेकिन दूरियाँ इतनी अधिक हो गई थीं कि एक दूसरे की खबर नहीं थी। फिर भी जब कभी बचपन और किशोरावस्था के साथ गुजारे दिन याद आते तो मन में हूक सी उठ जाया करती थी। पिछले एक सप्ताह से न जाने क्यों उनसे मिलने के लिए दिल कुछ ज्यादा ही बेचैन हो रहा था और वो इसी कशमकश में थी कि एकबार जाकर तो उनसे मिल ही लेना चाहिये। उस रात तो बेचैनी की इंतेहा हो गई जब उसने सपने में देखा कि वे बड़ी मासूमियत से उसके पास बैठकर मुस्कुरा रही हैं और उसे नहीं मिलने आने का उलाहना भी दे रही थीं कि उसका कभी मिलने का मन क्यों नहीं करता जबकि वह उनसे मिलना चाहती थीं। अंततः उससे अगले दिन घर आने और मिलने का वादा लेकर वे मुस्कुराती हुई ओझल हो गईं।

भोर में उसका मन अनमना सा हो रहा था और मानो मीरा भाभी से मिलने की बेचैनी उसे चैन से कोई भी काम करने नहीं दे रही थी। शाम होते न होते उसकी बेचैनी इतनी बढ़ गई कि वह निकल पड़ी अट्ठारह साल पुराने रास्तों पर, अपनी किशोरावस्था की सखी को मिलने के लिए। धड़कते दिल से गली में प्रवेश किया और सोचते हुए कुंडी खटका दी कि जाने इतने अंतराल के बाद उसे भाभी या उनका बेटा पहचानेंगे भी या नहीं? अमित ने दरवाजा खोला तो उसका कलेजा मानों मुंह को आ गया और उसे लगा कि किंचित माताजी यानी मीरा भाभी की सासूमां का या ससुर जी का दुखद समाचार उसे सुनने को मिलेगा। समाचार की शक्ल इतनी भयावह होगी वह सोच नहीं सकी थी! घर के पुरूष थोड़ी देर पूर्व ही मीरा भाभी की अंतिम क्रिया करके लौटे थे, और वह उनकी अंतिम रात्रि थी जब वे अपनी पूरी ताकत के साथ उसके पास मिलन की आशा लिये पहुंची थीं, किंचित मन की शक्ति के साथ। उसका परिचय सुनते ही हर प्राणी मानो बिलख-बिलख कर उसके देर से पहुंचने पर उससे नाराज होकर कोस रहा था क्योंकि मरने से पूर्व मीरा भाभी के होठों पर अपने घरवालों में से किसी का नाम होने की बजाय उसका नाम था, और अट्ठारह वर्ष की प्यास मन में लिए वे इस दुनिया से विदा हो गई थीं बिना अंतिम इच्छा पूरी किये।

वह कभी समझ नहीं पाई कि दुनिया के इतने प्राणी क्या उससे इतना अधिक लगाव रख सकते थे कि जाने से पहले मिलन की जिजीविषा उन्हें उस तक खींच लाई थी? या ये सारे सपने मात्र उसकी अपनी अधूरी इच्छाओं, मान्यताओं के कल्पना चित्र थे। तय करना मुश्किल था लेकिन पराविज्ञान, आलौकिक शक्तियों और एक अलग प्रकार की ऊर्जा से इनकार किया जा सकता है क्या?



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