Viral Rawat

Abstract


4.5  

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समय की गति

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छब्बीस साल का था जब गंगाराम जौनपुर स्थित अपना छोटा सा गाँव छोड़कर लखनऊ आया था। घुंघराले बाल, गेंहुआ रंग,लम्बी-चौड़ी कद-काठी, अपनी जवानी के दिनों में किसी सुन्दर पहलवान को भी पटकनी दे सकता था। गंगाराम ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। वह लखनऊ मजदूरी करने आया था जिससे वह गाँव में अपनी जोरू और तीन बच्चों का भरण-पोषण कर सके। शहर आकर वह किराये के मकान में रहने लगा।

जिस मकान में वह रहता था उसी के पीछे एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था। बिल्कुल हरा-भरा। उस इलाके में कोई भी पेड़ उतना बड़ा और ऊँचा नही था। जब भी हवा चलती तो वो पूरे जोर से अपने पत्ते हिलाता था। मानो जंगल में किसी शेर की भांति गरज रहा हो। उसे पता था इस जगह पर कोई भी उसकी टक्कर का नही था।

शहर आते ही गंगाराम को एक फैक्ट्री में मजदूरी का काम मिल गया। वह मन लगाकर काम करता गया। खूब पैसे कमाए। गाँव का घर बनवाया। तीनों बेटे ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाए फिर भी तीनों को बाबू लोगों से सिफारिश करके सरकारी नौकरी पर लगवा दिया। उसने सभी की शादी की। नाती-पोतों से घर भर गया। सभी बेटे उसका कहना मानते थे। सारी तनख्वाह गंगाराम के हाथ पर ही रखते थे। पूरे घर में गंगाराम की ही चलती थी।

उधर वह पीपल भी मजे का जीवन व्यतीत कर रहा था। उसकी छाँव में एक मंदिर बना दिया गया। लोग उसी मंदिर के चबूतरे पर बैठकर गर्मियों में छाँव का तो सर्दियों में अलाव का आनंद लेते थे। वह सबको अपने पास बैठा देखकर बहोत प्रसन्न होता था और जोर-जोर से अपने पत्ते हिलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करता था।

परन्तु भाग्य में सबदिन एक समान नही लिखे होते।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, गंगाराम को बीमारियों ने घेर लिया। उसके एक पैर में लकवा हो गया। नौकरी छूट गयी। पर वो निश्चिन्त था। हो भी क्यूँ न, भाई जिनके तीन जवान बेटे सरकारी नौकरी में हों उसे किस बात की चिंता। पहले कुछ महीने अच्छे बीते लेकिन जैसे-जैसे इलाज का खर्चा बढ़ता गया लड़कों ने मुँह फेरना शुरू कर दिया। सब अपने बीवी-बच्चों को लेकर अलग रहने लगे। बड़े बेटे ने दरियादिली दिखाई और गंगाराम को अपने पास रख लिया और उसका होम्योपैथी इलाज कराने लगा।

उधर पीपल के नीचे बेलें पनपने लगीं। देखते ही देखते उन्होंने सारे पेड़ को घेर लिया। उसकी शाखाओं को लपेट लिया जिससे उसका विकास रुक गया। उन बेलों के कारन अब पीपल धीरे-धीरे सूखने लगा।

इधर गंगाराम की भी हालत गंभीर होती गयी। बेटे-बहू के तानों ने जीवन और दूभर कर दिया। तन को कितना भी खिला लो यदि मन प्रसन्न नही है तो शरीर धीरे-धीरे अपनी गति को प्राप्त होता जाता है।एक दिन ऐसे ही तानों से परेशान होकर वो खाट से गिरा और एक पैर के सहारे घिसलता हुआ पीपल के नीचे मंदिर के चबूतरे पर बैठ गया। बैठा हुआ वह पीपल को देखने लगा। उसे उन दोनों की कहानी एक जैसी लगी। जवानी में तो कोई उन्हें आंख भी दिखा दे तो वे उसे वहीं धराशाई कर देते थे परन्तु अब जब वो बूढ़े, अपंग हो गये हैं तो सभी उन पर अपना प्रभुत्व जमाते हैं। इसी विचार ने उसके मन को इतना दुखी किया की उसने वहीँ रोते-रोते प्राण त्याग दिए। उसी दिन पीपल के भी सारे पत्ते गिर गये। वह केवल एक ठूँठ रह गया।

आज जब उन दोनों को याद करता हूँ तो समय की गति का अनुभव होता है। समय कभी एक सा नहीं रहता।कभी हम सांसारिक भोग-विलास, ऐश्वर्य का सुख भोगते हैं तो कभी हमें पीड़ा, संताप और वियोग भी सहना पड़ता है।

आज गंगाराम का पोता छब्बीस वर्ष का हो गया है वैसा ही हष्ट-पुष्ट, सुडौल और उस ठूँठ के नीचे एक मोटा सा सुन्दर पीपल का पेड़ उग गया है, जो उसी प्रकार जोर-जोर से अपने पत्ते हिलाकर प्रसन्न हो रहा है।


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