Sarita Maurya

Abstract

3.8  

Sarita Maurya

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सखी मेरी कविता

सखी मेरी कविता

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मेरे लिए किसी कहानी की व्याख्या जैसा था नमिता का परिचय। मेरी प्रिय सखी स्वाती के माध्यम से मैं उनसे व्हाट्सऐप ग्रुप में चर्चा के दौरान रूबरू हुई थी। सपाट स्वाती ने जिस दिल छू लेने वाले अंदाज़ में उनका परिचय दिया तो मानो उसने मेरे अंदर कहीं गहरे ह्रदय से ह्रदय के संगम का बीजारोपण कर दिया। जिसके नाम के साथ ही सुंदर लगा हुआ था तो फिर मेरे जैसे मन में मिलन की तरंग उठना स्वाभाविक था। तत्काल मिलना शायद मिलन की अनूठी उमंग और प्रतीक्षा के पश्चात बहने वाले स्नेहिल झरने को कम कर देता, तभी तो बस फोन ही माध्यम हो गया। वे अपने बंबई से वापस नहीं आ पाईं सामुदायिक काव्यमंच प्रारंभ नहीं हो पाया तो साथ ही मेरा भी वनवास समय मानों प्रारंभ हो गया और मुझे उनसे लगभग 1200 किलोमीटर की दूरी रखनी पड़ी। तत्पश्चात प्रारंभ हुआ वर्चुअल मंच पर लेखनी का आदान-प्रदान। यह मंच वास्तव में नवीन सृजन और पुराने अनुभवों को सजाने का प्रयास था। हरएक में कुछ नया रचने की ललक दिखती थी जिसमें रचना की रचनायें जागृत करती थीं तो स्वाती दिल को झकझोर देती थी, अनुजा की मीठी अनुभूति और सौंदर्य के प्रति ललक दिखती थी।

नमिता की रचनाओं के दरिया में जब गोता लगाया तो पता चला कि पाठक रस लेगा, तरंग में रहेगा और फिर मानो एक यादों की लहर अपने संग ऐसे भंवर में ले जायेगी जहां की वास्तविकता वापस आने नहीं देगी, कुलमिलाकर लेखनरस जीवनरस में ढल जायेगा और पाठक बस गोते लगाता रहेगा। शब्द विन्यास ऐसा कि मेरे जैसे छिछले और लेखन का अ ब स नहीं जानने वाले का मन भी लिखने के लिए प्रेरित हो जाये। प्रेरणा देने में मानों जादुई शब्दों का प्रयोग नहीं वरन् वीणा के मधुर स्वर कहीं दूर से आकर कानों से टकरायें और मीठी स्वर लहरी घोल दें कि आप अपनी ही कमी को दरकिनार कर पुनश्च नवसृजन में लग जायें। 

धीरे-धीरे पता चला कि सृजन यूं कल्पनाओं का नहीं वरन् धरातल पर उकेरे जा रहे शिक्षा पटल से आ रहा था जिसके तहत नमिता ने अपने काम से स्वतः समयपूर्व रिटायरमेंट लिया था और अब ऐसी बच्चियों की शिक्षा और सृजन को निखार रही थीं जिनके हुनर को कोई नया आयाम देने वाले की आवश्यकता धरातल पर थी। इस अनूठे सृजन में नमिता की भागीदारी किसी कुशल चितेरे सी या कि एक ऐसे गुरू की जो सबकुछ सिखा दे अपने शिष्यों को और फिर कहे ‘‘ये सृजन मेरा नहीं शिष्यों के हाथ से किया गया है’’! किंचित यही गुरू का प्रथम गुण होता है कि वह अपने शिष्यों के लिए ऐसे सहज, सरल वातावरण का निर्माण करदे कि शिष्य को शिष्य होने का डर होने की बजाय गुरू के स्नेह का ऐसा रंग चढे़ कि वह गुरूमय हो जाये। 

नमिता को पढ़ते हुए उनकी मुस्कुराहटों को सचित्र देखते हुए ह्रदय ने कहा कि जिससे चर्चा करना, जिसके शब्दों का संसार इतना आभापूर्ण और प्रभावशाली है तो उससे प्रत्यक्ष मिलना कितना सुखदायी होगा और मेरे रचना संसार में अवश्य कुछ नया जुडे़गा क्योंकि साक्षात कुछ सीखने को मिलेगा। 

एक दिन अचानक मेरे फोन पर अंजान नंबर से घंटी बजी तो आदतन हौले से फोन रिसीव किया, फोन पर खनखनाती, चहकती आवाज सुनकर सफेद बादलों के बीच रूई के गोलों जैसे नरम बादलों पर बैठी ‘‘मैं‘‘ बह चली उस आवाज की दिशा में मानों मेरे बादलों के झूले के साथ-साथ कोई जलपरी अपने हाथों में इंद्रधनुषी जलतरंग मेरे कानों के पास मधुर ध्वनि में बजाती चली जा रही हो। लग रहा था कि बस इस आवाज को दूर नहीं होने देना। आवाज में कोई बनावटीपन नहीं बल्कि वर्षों के अपनेपन की खुश्बू घुली हुई थी, मानों दो परदेसी बहनें लंबे अंतराल के बाद एकदूसरे को पुनश्च मिलने की कल्पना में दिलासे दे रही हों।

लखनऊ पहुंचते ही पहली फुर्सत में नमिता सुंदर से मिलने की आकांक्षा मुझे मेरी बेटी के साथ आधे रास्ते खींच ले गई। किंचित अभी मिलन का समय नहीं आया था तभी तो चारबाग पहुंच कर परिस्थितिवश वापस मुड़ना पड़ा। किंचित हमदोनों के लिए सहज नहीं था इसे स्वीकार करना, क्योंकि मेरे लिए मेरी माझी की झलक मिलते-मिलते रह गई थी तो ममत्वरस में डूबे नमिता के ह्रदय को भी मेरी उतने ही उत्साह से प्रतीक्षा थी। आवाज की खनक से लग रहा था कि नमिता को भी मुझसे कम प्रतीक्षा नहीं थी। ये मिलन अधूरा रहा़.....।

आज सुबह से लोग मुझे मेरे जन्मदिन की बधाई दे रहे थे, मेरी भी कोशिश यही थी कि मैं हर मित्र को सहृदय धन्यवाद ज्ञापित करूं, लेकिन मन में कहीं मेरी जन्मदाता की याद बार-बार मेरे ऑंसुओं को आंखों के से बाहर ढुलका ही देती थी, मन का पांखी उड़ा जाता था कि काश मैं भी अम्मा के साथ ही दुनिया से कूच कर जाती तो जन्मदात्री के बिना ये जन्मदिन की शुभकामनायें नहीं लेनी पड़तीं। चाहकर भी अम्मा के साथ मनाये गये जन्मदिन की याद मुझे भिगोये जा रही थी, मेरे माथे पर अंकित उनका चुंबन और चेहरे पर असीम शांति से उभरती चमक के बीच होठों से तिरती मुस्कुराहट के साथ उरद की कचौरियों का स्वाद दुनिया के हर केक, हर मिठाई, पकवान की तुलना में इतना गहरे पैठा था कि अनुभूति मात्र से ह्रदय में स्नेह, होठों पर मुस्कुराहट लेकिन आंखों में समंदर लहराने लगे। उस जन्मदिन की खुशी आत्मिक आनंद की खुशी थी, वैसे ही जैसे ईश्वरीय आनंद की अनुभूति देती हो। भावनाओं के भंवरजाल में उलझी अन्यमनस्क सी मैं अपना काम किसी यंत्र की तरह निपटाती जा रही थी, कि फोन पर निगाह पड़ी तो साइलेंट मोड पर होने के कारण उसकी रोशनी में एक अंजान नंबर चमकता दिखाई दिया। मेरी हैलो के जवाब में वही खनखनाती सी दिव्य आवाज कानों में घंटियां बजा गई, समझ ही नहीं आया कि क्या बात करूं कैसे धन्यवाद कहूं, ह्रदय वैसे ही आहलाद और संकोच से भर गया मानो अचानक प्रियतमा के समक्ष वर्षों बाद परदेसी अचानक आकर खड़ा हो जाये और वो बारिश की फुहारों के चलते कहीं छिप भी न सके।

कौन कहता है कि प्रेम के लिए, दोस्ती के लिए मिलना, साथ बैठना, खाना पीना जरूरी होता है? मुझे नमिता यादों के उस गहरे समंदर के अवशेष से निकाल कर बाहर ले आई थीं जहां मैं स्वयं के वजूद को मां के बिना अधूरा महसूस कर रही थी। क्या ये दोस्ती नहीं?

ओ आली मेरे शब्द नहीं तुझसे सुंदर,

तू सुंदरता से भी सुंदर, 

शब्दों में बांध नहीं सकती तुमको सरिता,

शब्दों से परे है स्नेह तुम्हारा, 

शब्द रहित ये प्रथम सृजन

सुनो सखी मेरी कविता।। 



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