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Kunda Shamkuwar

Abstract Romance Others

4.5  

Kunda Shamkuwar

Abstract Romance Others

सेकंड ऑप्शन

सेकंड ऑप्शन

13 mins
28

कई सालों के बाद आज उसका फ़ोन आया। "मिलना चाहता हूँ तुम्हें। चलो पास के रेस्तराँ में मिलते हैं।" वह हँसते हुए बोली, "अरे, कब आये? न कोई हेलो हाय, और डायरेक्ट मिलना चाहता हूँ। क्या बात करनी हैं? घर में क्यों नहीं आते हो? घर में आओ। वैसे ही माँ बाबा तुम्हें याद करते रहते है। बहुत दिनों के बाद तुम्हें माँ के हाथ के बने पकौड़े खाने का मौक़ा मिला हैं तो ये मौक़ा चूकना नहीं तुम…साथ में अदरक वाली चाय भी पियेंगे…"उसने कहा, "नहीं, नहीं, बाहर मिलते हैं… उसी पास वाले रेस्तराँ में… अंकल आंटी से से बाद में फुर्सत में मिलूँगा।""क्या अभी मिले?""नहीं, तुम बताओ, आज संडे हैं। तुम्हारी छुट्टी हैं। जब सूट करें तब मिलते हैं लेकिन आज ही…" "ठीक हैं, फिर शाम को 6 बजे मिलते हैं… घर से निकलते वक़्त मैं कॉल करूँगी।" 

यह राहुल था, जो स्कूल कॉलेज के दिनों में हमारे पड़ोस में रहता था। हम दोनों साथ साथ पले बढ़े थे। उसने इंजीनियरिंग किया था और मुझे क्योंकि पढ़ने पढ़ाने का शौक था तो लेक्चररशिप के लिए मैनें बी एस सी -एम एस सी करने का सोचा और अपने शहर के ही यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया। ऐसे ही बैंक की प्रोबेशनरी ऑफिसर की एग्जाम में मैं पास हो गयी और फिर मुझे इसी शहर के बैंक में नौकरी मिल गयी ।  राहुल इंजीनियरिंग करने के बाद यू के चला गया था। फिर वही शादी कर बस गया था। मुझे उसकी शादी के वक़्त बातों बातों में पता चला था की मेरे माँ बाबा को वह मेरे लिए पसंद था। माँ कहती थी की राहुल के बाहर जाने से उनकी एक्सपेक्टेशंस बढ़ गयी थी। वैसे भी जो हम सोचते हैं वह कहाँ पूरा होता हैं? बाद में हम वह घर बेच कर बैंक के पास ही रहने चले गये थे तो अंकल आंटी और इनके परिवार से रिलेशन कम होते गये। आज इतने सालों बाद उसका फ़ोन आया। ज़ाहिर हैं की पुरानी सारी यादें ताज़ा होगी यह सोचकर मैंने भी हामी भर दी।

तय प्रोग्राम के अनुसार शाम को मैं वहाँ पहुँची। राहुल कोने वाली टेबल पर बैठा था।"हेलो, ज़्यादा इंतज़ार तो नहीं करना पड़ा न तुम्हें?"बेहद नाटकीय लहज़े में उसने कहा, "तुम्हारे लिए हम क़यामत तक इंतज़ार करेंगे…"

कुर्सी खिंचकर उसकी बात को हँसी में उड़ाते हुए मैं कहने लगी, "क़यामत किसने देखी हैं? चलो कुछ ऑर्डर दे दो…एक तो तुम्हारे साथ होती हूँ तो पता नहीं क्यों मुझे कुछ ज़्यादा ही भूख लगती हैं… याद हैं तुम्हें बारहवीं के बाद हमने कॉलेज में एडमिशन के लिए कितने चक्करें काटे थे और कितने ही बार स्ट्रीट फ़ूड एंजॉय किया था।"

उसने वेटर को इशारा कर ऑर्डर दिया। ही नोज़ मी…माय चॉइस… मैं उसको अपलक देखकर मन ही मन सोच रही थी। "तुम्हें याद हैं वह सब कुछ?" मैंने कहाँ, "क्यों नहीं याद होंगे वे पुराने दिन? दे वर गोल्डन डेज ऑफ़ आवर लाइफ़, डोंट यू फ़ील सो?उसने हामी भरी। उसकी आँखे चमकने लगी।हम दोनों के बीच कमाल की अंडरस्टैंडिंग थी।

इतने सालों बाद वह आज भी बेतकल्लुफ़ था। अपनी नौकरी में अलग देश में रहने के बावजूद।वेटर ने डिशेज सर्व कर दी। पीज ऑमलेट की पहली बाईट लेते ही मैंने कहा, "यहाँ का टेस्ट आज भी वैसा ही हैं।" "हाँ, बिल्कुल मेरी तरह। मैं भी कहाँ बदला हूँ? हाँ, तुम थोड़ा स्लिम हो गयी हो।" उसने हँसते हुए कहा। हाँ, उसकी हँसी वैसी ही थी… बिल्कुल दिलकश…उसके बालों में चोरी चोरी चाँदी झाँक रही थी।मैंने जवाब दिया, "तुम क्या अब झूठ भी बोलने लगे हो या तुम्हारे चश्मे का नंबर चेंज हो गया हैं क्योंकि बरखुरदार मुझे लगता हैं की मैं मोटी हो गयी हूँ और मैं  भी तुम्हारे जैसी ही अमीर हो गयी हूँ। देखो थोड़ी थोड़ी चाँदी मेरे भी बालों में आ गयी हैं…""तुम बिल्कुल भी नहीं बदली हो। तुम्हारे यही विटी नेचर का मैं फैन रहा हूँ!""तुम बताओ, तुम ने मुझे क्या बात करने के लिए बुलाया? अरे, हाँ, तुम यहाँ कैसे? और तुम्हारी फ़ैमिली?  फैमिली को लेकर आते न आज। सबसे मुलाक़ात जो जाती।"

"हाँ, तुम्हारी एक और आदत बिल्कुल भी नहीं बदली हैं। दूसरा सवाल पहले करने वाली आदत।"उसकी बातों से मुझे अचरज हो रहा था।मेरी इतनी पुरानी बातें उसको अभी तक याद हैं।"हाँ, तो बताओं, अंकल आँटी कैसे हैं? अरे, हाँ, बच्चों के स्कूल चल रहे हैं। और तुम्हारी वह गोरी मेम, क्या नाम हैं उसका मार्था? वह भी तो वहाँ किसी स्कूल में पढ़ाती सुना हैं।""होल्ड..होल्ड.." मेरे सवालों को मुझे बीच में ही रोकना पड़ा।मेरी सवालियाँ निगाहों को दरकिनार करते हुए उसने कहा, "इन डिशेज को पहले एंजॉय करते हैं। फिर यहाँ की चाय पिएँगे।तुम देख सकती हो, यहाँ का पीज ऑमलेट कितने दिनों के बाद खा रहा हूँ।  अब मैं यहाँ मेहमान हूँ तो मेरी बातें तफ़सील से होगीं। हाँ,  तुम यहाँ की लोकल हो तो अपने बारें में बात कर सकती हो।"फिर से उसने बाज़ी मार ली। हमेशा ही बातों से मुझे हराता रहा हैं। इस बार भी उसने मुझे क़ायल कर दिया।

मैंने कहा, "तुम्हारे यहाँ से जाने के बाद मैं अपनी बैंक की नौकरी में मशगूल हो गयी हूँ। नोट गिनते गिनते दिन का पता ही नहीं चलता।इन दैट वे आय एम वेरी लकी। दिन भर नोट गिनती रहती हूँ वह भी इतने की मशीन से गिनना पड़ता हैं।" "क्यों तुम्हारा ट्रांसफर नहीं होता? बैंक मैनेजर्स को तो हर तीन साल के बाद ट्रांसफर करते हैं। फिर तुम?""मैंने प्रमोशन्स लिए ही नहीं। माँ बाबा की ओनली चाइल्ड का गिफ्ट हैं ये। मैं अगर प्रमोशन लेती तो मुझे बाहर जाना होगा। फिर इनकी देखभाल का क्या?? तुम तो जानते ही हो इन पुरानी जनरेशन के लोगों को। वे अपना घर कहाँ छोड़ते हैं?"

"और शादी, परिवार के बारें में बताओं?"

"हम इतने भी मन से दूर नहीं हुए की तुम्हें शादी का कार्ड भी ना भेजती? तुम वहाँ दूसरे देश में अपनी गोरी मेम और नौकरी के साथ बिजी थे।"

"तो, क्या तुम?" कुछ अटकते हुए उसने पूछा। "हाँ, हाँ… यू आर राइट… आय एम सिंगल। और तुमको मेरी ये हँसी से नज़र नहीं आ रहा की मैं सिंगल हूँ?"

 मेरी हँसी में उसने साथ दिया। "वाक़ई तुम बेहद विटी हो।"हमारी पीज ऑमलेट वाली डिश ख़त्म होने के आयी तो वेटर चाय सर्व करने के लिए पूछने आया। उसने अदरक वाली दो चाय लाने के लिए ऑर्डर दिया। फिर से मुझे आश्चर्य हुआ, की इसे याद हैं की मुझे अदरक वाली चाय पसंद हैं।

"बच्चें क्या कर रहें हैं और फ़ैमिली नहीं आयी क्या?"

"बच्चें नहीं हैं और मार्था के साथ मेरा कुछ जमा नहीं बाद में। कितने दिन ऐसे ही साथ रहते?  कुछ सालों बाद हम दोनों ने म्यूच्यूअली डिवोर्स ले लिया। इसलिए सोच रहा हूँ की अब यहीं रहूँ… अपने देश में अपने लोगों के बीच…" गहरी निगाहों से मुझे देखते हुए कहा।

"हाँ, हाँ… सही सोचा हैं तुमने। अंकल आंटी के लिए और सभी के लिए तुम्हारा ये डिसिशन अच्छा होगा।"

"तुम भी एग्री करती हों न?" मैंने कहा, "हाँ क्यों नहीं? हम तुम्हारे साथ इतने साल पड़ोस में रहे हैं। तुम्हारा और मेरा घर चाहे अलग अलग क्यों ना हो लेकिन हम बिल्कुल एक परिवार जैसे ही तो रहें, नहीं? क्या तुम्हें मैं जानती नहीं?"

हाथ पोंछ कर टिश्यू पेपर ख़ाली प्लेट में रखते हुए गहरी निगाहों से सवाल किया "सच में क्या तुम मुझे जानती हो?" मेरे कुछ कहने के पहले वेटर चाय ले आया। हम दोनों चाय पीने लगे। चाय वाक़ई अच्छी बनी थी।

हम दोनों ही ख़ामोशी से चाय पीने लगे। उसकी उन गहरी निगाहों ने मुझे असहज कर दिया। अब न तो मेरा वह वीटी नेचर और ना ही उसकी ठहाके वाली हँसी थी। मैं इधर उधर देख रही थी

"चाय ख़त्म हो गयी… चलें अब?"

"क्या तुम मुझे मेरी बात का जवाब नहीं दोगी? तुम मुझे और जानना पसंद नहीं करोगी? मैं तुम्हें प्रपोज़ कर रहा हूँ!!!"

मैंने कहा, "नहीं अब मुझे निकलना चाहिए। बहुत देर हो गयी हैं। बातों में पता ही नहीं चला। मम्मी पापा इंतज़ार कर रहे होंगें।" उसने फिर से ज़ोर देकर कहा, "मुझे भी तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा। कल शाम को तुम्हारे घर आता हूँ। अंकल आंटी से भी मुलाक़ात होगी…ढेर सारी बातें होगी।"

"ठीक हैं…" कहकर मैं उठी। वेटर को बिल पेमेंट कर  वह उठ खड़ा हुआ। चलो, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ। अंकल आँटी को मिलकर कल आने की बात कह दूँगा।"

"नहीं, नहीं… मैं अकेले चली जाऊँगी। पता नहीं क्यों मुझे उससे बस भागने का ही मन हो रहा था।"  राहुल ने झट कहा, "अब तक तुम अकेली सफ़र करती रही अब मैं तुम्हारा साथ दूँगा।" वह मानने वाला नहीं था। "चलो, गाड़ी पार्किंग में हैं।"

बिना कुछ कहे मैं उसके साथ चल दी।गाड़ी स्टार्ट होते ही गाना  बजने लगा… फूलों के  रंग से दिल की कलम से मैंने लिखी रोज़ पाती…राहुल ने वॉल्यूम बढ़ाया। मैंने झट से उसकी ओर देखा। मुझे अचरज हुआ, इसे मेरी चॉइस अभी तक याद हैं।

घर पहुँचकर बड़ी ही गर्मजोशी से वह मम्मी पापा से मिला और कल शाम को आने का वादा कर चला गया।मैं अपने कमरे में आयी। राहुल की बातों से मैं सोच में पड़ गयी। ये क्या कर दिया राहुल ने?  आज उसने प्रपोज कर दिया।क्या करूँ मैं? कल वह फिर आने वाला हैं।माँ ने रात को खाना खाते हुए पूछा भी की क्या हुआ हैं आज तुम्हें? ढंग से खाना क्यों नहीं खा रही हो?

मैंने राहुल के साथ हॉटेल में कुछ खाकर आने की बात बता दिया। उम्र के इस पड़ाव पर क्या यह सही होगा से लेकर राहुल अब क्यों प्रोपोज कर रहा हैं? तब क्यों नहीं में मेरा मन बार बार उलझ रहा था। वाक़ई में तब उसको गोरी मेम पसंद थी। मैं कोई भी ऑप्शन नहीं थी। तब क्यों नहीं और अब क्यों? यह सवाल मुझे परेशान करने लगा।  इसी सोच में बहुत देर बाद नींद आयी। नेक्स्ट डे फिर बैंक का हेक्टिक डे। शाम को बैंक बंद होने के टाइम राहुल का फ़ोन आया। "मैं इधर से जा रहा हूँ  तो साथ घर चलते हैं।  जस्ट वेट, गेट पर आकर फ़ोन करता हूँ। आ जाओ तुम।" उसने पूछा नहीं बस ऑर्डर दिया। एक बार तो यूँ उसका हक़ ज़माना मुझे अच्छा लगा लेकिन दूसरे ही पल मेरे मन में मैं क्यों जाऊँ उसके साथ वाला ट्रैक शुरू हो गया।

लेकीन थोड़ी ही देर में उसका फ़ोन आ गया की गेट में आ गया हूँ, जल्दी आ जाओ।

गेट पर ज़्यादा देर गाड़ी नहीं रोक सकते हैं तो मैं झट झट आकर गाड़ी में बैठ गयी।

गाड़ी अपनी रफ़्तार से चलने लगी। गोल चक्कर के एक टर्न में वह कहने लगा, "तुम्हें क्या मेरी बात अच्छी नहीं लगी जो तुम एकदम सीरियस हो गयी हो? कल तुम कितना हँस रही थी। मैंने नोटिस किया हैं कि मेरे प्रपोजल के बाद तुम एकदम सीरियस हो गयी… तुम्हारी हँसी जैसे ग़ायब ही हो गयी। क्या अच्छा नहीं लगा तुम्हें?" जिस बात का अंदेशा था वही हुआ। उसने पूछा, "फिर क्या सोचा हैं मेरे प्रपोजल के बारें में? उम्मीद हैं की निराश नहीं करोगी मुझे।" "पता नहीं… मैंने कुछ सोचा नहीं इस बारें में…" कहकर मैं खिड़की से बाहर देखने लगी। मुझे खिड़की से बाहर झाँकते हुए देखकर वह कहने लगा, "देख रही हो, अब यह शहर कितना बदल गया हैं अब, नहीं?" मैंने भी झट से जवाब दे दिया, "जब इस शहर के बाशिंदे ही बदल गये तो ये क्यों नही बदलेगा भला?" थोड़ी ही देर में मेरा घर आ गया। "अंकल आँटी, हम गार्डन में ही बैठ जाते हैं। यहाँ पर अच्छा लगेगा। आपका गार्डन वेल मेंटेंड हैं? कौन लुक आफ़्टर करता हैं गार्डन को?" माँ ने कहा, "अरे, स्मिता ही तो करती हैं यह सब।" राहुल मेरी तरफ़ देखकर अप्रीशीएट करते हुए कहने लगा, "वैरी गुड, स्मिता का काम अच्छा है और नेचर भी। शी इज वैरी केयरिंग…आँटी, आप के हाथ के पकौड़े कब से नहीं खाये हैं… " माँ ने कहा, "अरे, यह भी क्या कहने की बात हैं? अभी बना देती हूँ। तब तक तुम अंकल के साथ बातें करों। चलो, स्मिता तुम जरा मुझे हेल्प कर दो।" थोड़ी ही देर चाय पकौड़ों के साथ हमारी बातें शुरू हो गयी। राहुल के डिवोर्स के बारें में जानकर मेरे माँ बाबा परेशान हो गये। लेकिन वहाँ की लाइफ स्टाइल की बातें सुनकर वह ख़ुश हो रहे थे। राहुल का किस्से सुनाने का अंदाज़ था ही कुछ ऐसा की लोग हँस हँस कर लोटपोट हो जाये। चाय पीने के बाद राहुल कहा, "अंकल, जैसे की आप सब कुछ मेरे बारें में जानते ही हैं। मैं अब ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहता हूँ… मूव ऑन करना चाहता हूँ…यहाँ अपने ही देश में…अपने ही शहर में… यहीं पर शादी करना चाहता हूँ… अपनी फ़ैमिली बनाना चाहता हूँ…" उनकी बातें शुरू हो गयी। मैं घूमते घूमते गार्डन में फूलों को देखने लगी। कुछ प्लांट्स को कटिंग की ज़रूरत थी। गुलाब मुरझाने लगे थे। 

माँ ने ख़ुश होते हुए कहा, "हाँ,हाँ क्यों नहीं? लड़की देखी हैं या फिर कल से देखना शुरू करूँ? मेरे कुछ जान पहचान के लोग हैं। मैं बात कर सकती हूँ अगर तुम राज़ी हो तो।"

"नहीं, आँटी, लड़की तो बचपन से देखी हैं। आप भी जानते हैं उसको।" 

"कौन?"
"स्मिता…"

"क्या?" अंकल आँटी दोनों ने एक सुर में कहा।

"बस आप लोग मान जाइये और स्मिता को भी इस शादी के लिए कन्विंस कीजिए।"

"बेटा, तुम ने तो हम पर एकदम बॉम्ब गिरा दिया हैं… पहली शादी के वक़्त भी तुमने ऐसा ही किया था। उस वक़्त भी हम पर बॉम्ब गिरा दिया था। उस वक़्त हमारा कितना मन था की स्मिता और तुम्हारी शादी हो जाये। लेकिन तुम ने सब कुछ उलट पलट कर दिया था तब। तुम मानो या न मानो स्मिता ने भी फिर शादी नहीं की। कुछ सोचने का वक़्त दो। पता नहीं स्मिता मानेगी या नहीं?" आँटी, शायद मेरी उस ग़लती को ठीक करने के लिए ही यह सब डिवोर्स वगैरा हुआ हैं। अब सिवाय पछतावे से जिंदगी तो नहीं चलती। गलती ठीक भी तो की जा सकती हैं ना? आप लोग मुझे और मेरे परिवार को जानते हो। आप लोग सोचिए इस बारें में। और हाँ, आँटी पॉज़िटिव ही सोचिएगा मेरे इस प्रपोजल के बारें में।  अब मैं निकलूँगा। मेरे मम्मी पापा को भी बताना हैं इस बारें में। हाँ, लेकिन वह मेरी ख़ुशी ही चाहते हैं तो वहाँ से मुझे लगता हैं कोई प्रॉब्लम नहीं होगा।" जाते जाते वह हँस पड़ा। माँ ने आवाज़ देकर बुला कर कहा, "बेटा,स्मिता, देखो राहुल जा रहा हैं।"

"ओके बाय।"बाय, स्मिता…टेक केयर…" वह चला गया। लेकिन क्या वह सचमुच चला गया? नहीं…बल्कि अब हमारे तीनो के बीच डिस्कशन में मौजूद था। माँ ने कहा, "अब अक्ल आ गयी हैं उसे। तब तो हवा में उड़ रहा था।" बाबा ने कहा,

"छोड़ो वो सब पुरानी बातें। अब स्मिता के बारें में सोचो। वैसे राहुल देखा भाला लड़का हैं। घर परिवार अच्छा हैं। इन दोनों की अंडरस्टैंडिंग भी अच्छी हैं। मुझे तो लगता हैं की राहुल के इस प्रपोजल पर सोचा जा सकता हैं।" 

"बेटा, स्मिता तुम बताओ, तुम्हारी क्या राय हैं ? आख़िर तुम्हारी जिंदगी हैं। राहुल को तो तुम जानती ही हो और उसके परिवार को भी।"

माँ ने कहा, "हाँ, आप सही कह रहे हैं। उसकी बातों से पछतावा झलक रहा था। स्मिता के लिए राहुल मुझे शुरू से ही पसंद था। अब हम भी कितने दिन और रहेंगे? देखाभाला परिवार हैं। अब वो यही इंडिया में रहेगा। स्मिता, तुम सोच सकती हो। अपना टाइम लो और बताओ। उसके लिए रिश्तों की कोई कमी नहीं हैं।"

"ठीक हैं माँ, बताऊँगी… मुझे सोचने का वक़्त चाहिए…"

बोलकर मैं अपने कमरे में आ गयी।राहुल के इर्द गिर्द की सारी पुरानी यादें जैसे मेरे आस पास घूमने लगी। हम दोनों का यूँ बैठना, घूमना, बातें करना, हँसना,घूमना साथ में पढ़ाई करना वगैरह सब कुछ याद आया। मैं थोड़ा कन्विंस होने लगी। लेकिन फिर से मुझे उसके फर्स्ट ऑप्शन को ना चुनने की बात से गुस्सा भी आया। वह मुझे क्या समझता हैं? अवेलेबल? जो उसके लिए बैठी हैं? उसके लिए जैसे की मैं कोई सेकंड ऑप्शन हूँ? नहीं, नहीं… उसका यूँ हक़ से बातें करना… उसका वह केयरिंग नेचर और उसकी बॉडी लैंग्वेज से झलकता उसका पछतावा…ज़िंदगी हमे कभी कभी ही सेकंड ऑप्शन देती हैं। हर बार नहीं…मेरे माँ बाबा, मेरी नौकरी, और मेरी उम्र, राहुल के माँ बाबा, हम दोनों परिवारों के बीच की सहजता… सब कुछ मुझे कन्विंसिंग लगा। मैं माँ के पास गयी। "माँ, राहुल ठीक कह रहा हैं। हम सभी के लिए ठीक हैं उसका यह प्रपोजल। पापा से कहो की स्मिता राज़ी हैं। वह उससे बात करें।"

"ठीक हैं बेटा, तुमने सही डिसिजन लिया हैं।" माँ शांत चेहरे से मुस्कुरा उठी।

शाम को फिर से बैंक के छुट्टी के वक़्त राहुल का फ़ोन आया। फिर से वही बात। "तुम्हारे बैंक के गेट पर हूँ, मिलकर थोड़ी देर बात करते हैं। जल्दी से आ जाओं।" उसके स्वर में अपनापन भी था और हक भी। पापा ने शायद बात कर ली थी। मुझे उसका यूँ हक जताना अच्छा लगा। मैं गेट की तरफ़ रफ़्तार से चल दी।  मैं अब समझ गयी हूँ की गेट पर किसी को इंतज़ार कराना अच्छा नहीं होता। गाड़ी में बैठते ही गाना बजने लगा, चलते चलते यूहीं कोई मिल गया था…उसने फिर से वॉल्यूम बढ़ा दिया। बिना कुछ कहे उसका केयरिंग नेचर फिर से दिखा। धीरे से उसने कहा, "वही पुराने वाले रेस्तराँ में चलते हैं… दोबारा ग्रीन पीज ऑमलेट के साथ अदरक वाली चाय पियेंगे। क्या कहती हो तुम?"

मैंने भी हामी भरी। उम्र की हक़ीक़त या फिर ग्राउंड रियलिटी कहें या फिर उसका वह हक़ जतानेवाला अंदाज़ मुझे भा गया… कोई कुछ भी कहे, ग्रीन पीज ऑमलेट खाते खाते मुझे अचरज हुआ की मेरी सोच वाला वह सेकंड ऑप्शन कब मेरा फर्स्ट ऑप्शन हुआ इसका मुझे पता ही नहीं चला…


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