अलविदा स्वीट होम…
अलविदा स्वीट होम…
आज घर का सामान शिफ्ट हो रहा था। पैकर्स अँन्ड मूवर्स के लिए तो झट झट करने वाला काम था। यही दुनिया की रीत है ! कैसी विडंबना ! जिस घर को शिद्दत से सजाने में, अपना नीड़ बनाने में बेशकीमती वर्षों लग गए, उसे अब प्रोफेशनली फटाफट निपटाया जा रहा है !
उनकी टीम एक एक रूम लेकर पैकिंग का काम करने लगी। सामान लोड करने के बाद घर ख़ाली ख़ाली लग रहा था। हर दीवार ख़ाली…हर कोना ख़ाली…हर कमरा ख़ाली….
कमरे भी सोच रहे होंगे ? अचानक ये क्या हुआ ? उन्हें क्या पता कि ये दौर उन्हें आगे भी न जाने कितनी बार देखना होगा !
अचानक घर बदल गया हैं… जो दीवारें कभी खूबसूरत पेंटिंग्स और फोटो फ्रेम्स से सजी धजी थी… हँसती मुस्कुराती थी…आज बिल्कुल ख़ाली थी…बेजान लग रही थी…
आख़िरी बार घर को देखते हुए बाल्कनी में जाकर देखा तो पूरी बाल्कनी भी ख़ाली ख़ाली बदरंग नजर आयी…अरे, यह क्या? अभी कल ही तो सारी बाल्कनी रंगबिरंगी फ्लावर्स और हरे भरे पौधों से भरी थी…
आज अभी तक का ‘अपना’ यह घर ख़ाली होने के फ़ौरन बाद इतना अनजाना और पराया क्यों लगने लगा हैं…कैसे होता हैं यह सब? क्यों होता हैं यह? क्या कोई बतायेगा?
आज इस ख़ाली घर को देख मुझे सालों पहले इस घर में शिफ्ट होने की बात याद आयी की कैसे हम इस घर में शिफ्ट हुए थे? कैसे हमने मार्केट से तरह तरह की चीज़ों को लाकर बड़ी हसरत से सजाया था… सँवारा था…
मुझे यह घर कई मायनों में ख़ास लगता था…यहाँ न जाने कितने मेहमान आये और कितने गये… लेकिन हाँ, सभी तृप्त होकर ही गये…और कई कई तो दोबारा भी आये…इस घर की पॉजिटिविटी और सुकून का असर कह लीजिए या फिर घर के लोगों की ख़ुलूस और मोहब्बत जिससे लोग खिंचे चले आते थे।
कॉर्पोरेट ऑफ़िस में ट्रांसफर होना लाज़मी हैं। ऑफिस के साथ अब इस घर को छोड़कर मूव ऑन करना होगा…ऑफिस का क्या? काम में तो ज़्यादा बदलाव नहीं हैं… नये कलीग्स के साथ दोस्ती और एडजस्टमेंट्स की प्रॉब्लम्स होगी…हाँ, घर के लिए फिर से नयी दुनिया बसानी होगी…इस घर की कुछ यादों के साथ फिर से नये घर को सजाना होगा…
मूवर्स अँन्ड पैकर्स वाले की आवाज आयी, “मैडम, आप अपनी कार से आ रहे हैं ना? आप लोग जल्दी आगे चलिए…हमारी टीम सामान के साथ पहुँच रही हैं… नये घर में सामान लगाने के लिए आप लोगों को गाइड करना होगा…”
“हाँ, हाँ… हम निकल रहे हैं…” कहते हुए ढेर सारी यादों के साथ मैं उस ख़ाली घर से बाहर आ गयी…
एक बार फिर से हसरतों से आख़री बार उस घर पर नज़र डाली…कभी सुना था की दीवारों के कान होते हैं…मैंने इसे महसूस भी किया…घर को छोड़ते हुए ख़ाली दीवारों ने जैसे मेरे मन की हर कैफ़ियत को सुनकर सुनी निगाहों से मुझे अलविदा किया…
