माँ की तरह बनना…
माँ की तरह बनना…
मुझे याद हैं स्कूल में एक दिन बातचीत में मैंने कहा था, "मेरी माँ बहुत अच्छी है, मुझे बहुत प्यार करती है…लेकिन आजकल हर वक़्त चिल्लाती रहती है…चलते चलते बुदबुदाती है…किचन में जाते हुए दबी आवाज़ में बुदबुद तो कभी ज़ोर से उफ़ उफ़…रोकटोक तो अब आम हो गयी हैं…ये मत करो…वो मत करो…कभी बेवज़ह बोलेगी कि अपनी अलमारी ठीक कर लो…यूँ ही कभी मेरी कॉपी चेक करने लग जाती है। लगता हैं की वह ऑफिस में किसी से झगड़कर आती होगी, तभी मुझ पर चिल्लाने का बहाना ढूँढती है…" सब ने हामी भरी। शायद सबके घर में ऐसे ही हो रहा था। सभी माएँ शायद ऐसी ही होती होगी…
आज 25 साल के बाद पता नहीं यह सारी बातें क्यों याद आ रही हैं? अब मेरे बच्चें भी मेरे बुदबुदाने को नोटिस करने लगे हैं। कभी अलमारी ठीक करते हुए मेरा बुदबुदाना…कभी चलते चलते उफ़ करना…अब तो बच्चें भी मेरी आवाज़ के कर्कश होने की शिकायत करने लगे हैं। लगता हैं समय के साथ मैं भी बिल्कुल अपनी माँ की तरह ही बन रही हूँ…
लेकिन आज उम्र के चौथें दशक के इस पड़ाव पर अब अगर कोई मुझसे पूछे कि कैसी है तुम्हारी माँ? तो मेरा जवाब होगा, "मेरी माँ बहुत अच्छी है, वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत स्त्री है…मुझे बहुत प्यार करती है। शादी के इतने सालों बाद भी उनका प्यार मेरे लिए कम नहीं हुआ हैं… अब मैं अपनी जॉब और फ़ैमिली के बैलेंस के दौरान आने वाली कठिनाइयों पर जब उनसे बात करती हूँ या अपनी परिस्थिति का रोना रोती हूँ वह ग़ौर से पूरी बात सुनती हैं और धीरे से मुस्कुराती है…फिर आराम से कहती है, "बस इतनी सी बात? मेरी बेटी तो बेहद स्ट्रॉंग हैं…यूँ ही इतने जल्दी हार मानने वाली नहीं हैं। यू सी, एवरी प्रॉब्लम हैज इट्स ओन सलूशन… हम औरतों की ज़िन्दगी शायद ऐसी ही होती हैं। शायद हम कुछ ज़्यादा केयरिंग और कन्सर्न होती हैं। औरतों के ब्रेन की वायरिंग शायद ऐसी ही होती हैं….परिवार के हर मेम्बर के लिए चिंता करना या फिर आगे आनेवाले संकटों की आहट भाँप लेना…मर्दों का मदरबोर्ड शायद डिफरेंट होता हैं…वह यह सब चीज़े समझ नहीं पाता।"
बातचीत के दौरान माँ मेरे बचपन के किस्से सुनाती हैं जब मेरा सॉफ्ट टॉय वाले डॉगी को किसी ने मारा था तब मैंने घंटो रो कर माँ को हलकान किया था। लेकिन आज अगर मेरे बच्चों का कोई खिलौना नहीं मिलता तो मैं बच्चे को कह देती हूँ की शायद वह घूमने चला गया हैं। माँ मेरे इस तरह के स्मार्ट मैनेजमेंट वाली बात पर जोर का ठहाका लगा देती हैं… मैं भी मंद मंद मुस्कुरा देती हूँ। माँ मुझे गर्वित भाव से देखकर कहती हैं, "ये स्मार्ट मैनेजमेंट तुम्हारी जनरेशन को ही आता हैं, इस मामले में हम लोगों का हाथ तंग होता हैं।"
माँ से मिलकर वापस घर आने के बाद मुझे अहसास होने लगता है की मेरा माँ की तरह बनना अभी बाक़ी हैं…माँ की तरह बनने के लिए मैं अभी थोड़ी कच्ची हूँ…
