आज़ादी
आज़ादी
उसके बार बार छोड़ने की धमकी के बाद हिम्मत करके आख़िर मैंने उसे छोड़ दिया अपना पता दिए बग़ैर…
अब वह चाह कर भी मुझे ढूँढ नहीं सकता…उसे ना मैं देखना चाहती और ना ही मिलना भी..
मेरा यूँ उसे छोड़ना क्या ख़ुद से ही इंतक़ाम हैं? क्योंकि सुना हैं की औरतें बस प्रेम करती हैं…प्रेम में सम्पूर्ण समर्पण करती हैं…
तन का…
मन का …
धन का…
क्या कहा, धन का समर्पण?
हाँ, उसका कोई बिज़नेस था जो साल के बारह महीने घाटे में ही चलता था और मेरी नौकरी थी…
हाँ, लेकिन एक सवाल हैं…प्रेम में समर्पित पत्नी ने बग़ैर पता दिये क्यों छोड़ दिया पति को?
कई बार क्यों में कोई एक जवाब होता हैं लेकिन यहाँ इस क्यों में मल्टीपल चॉइस के ज़वाब थे..
दर्द…
अपमान…
रिजेक्शन…
उसका मुझे यूँ यूज़ अँन्ड थ्रो करना …
घुन की तरह मुझे खोखला करना…
मुझपर अपना एटीट्यूड दिखाना…
ऐसे में प्रेम में समर्पित पत्नी क्या इंतक़ाम लेगी?
नहीं…नहीं…बिल्कुल नहीं…
फिर क्या?
वह सबसे आसान और सबसे कठिन रास्ता ढूँढ लेती हैं…
आज़ादी का…
पति को अपना पता ठिकाना बताए बग़ैर छोड़ देती हैं…उसके हाल पर…उसके फ़ाल्स ईगो के साथ…
ये ख़्याल बहुत हसीन लगता हैं कि मैं खो गयी हूँ कुछ लोगों के लिए…उनसे कभी न मिलने के लिए…
