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Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Others

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Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Others

यादों के आईने में झाँकता बचपन

यादों के आईने में झाँकता बचपन

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आज बहुत दिनों के बाद मेरी एक परिचिता का घर आना हुआ। हमारी बातचीत हो रही थी। मैंने पूछा, “बेटी कैसी है? अपने घर में ख़ुश है ना? सुना हैं उसके ट्विन्स हुये हैं? कैसे कर रही हैं वह नौकरी के साथ दो बच्चों का लालन पालन?” 
“अरे, मुश्किल तो हैं… बट यू नो ये जनरेशन थोड़ी स्मार्ट हैं। दो दो फुल टाइम मेड और स्मार्ट मैनेजमेंट से वह संभाल रही हैं। कभी कभी मैं भी चक्कर लगा आती हूँ… बच्चों के साथ थोड़ा मन लग जाता हैं।
बेटी चाय लेकर आयी…वह मेरी बेटी से बात करने लगी, “पढ़ाई कैसे जा रही हैं? तुम कॉलेज जाना छोड़कर हमारे लिए चाय बनाने लग गयी।”  “आँटी, पढ़ाई ठीक जा रही हैं… और आज मेरा पहला लेक्चर ऑफ़ हैं। आप चाय लीजिए, थोड़ा रुक कर मैं चली जाऊँगी कॉलेज।”“ओके बेटा… “ कहते हुए उसने चाय का सिप लिया। हम दोनों ही चाय पीने लगे। चाय वाक़ई अच्छी बनी थी। मैंने कहा, “तुम्हारी बेटी अंकिता बड़ी हो गयी हैं लेकिन मुझे उसके बचपन में तुम्हारे दुपट्टे की साड़ी पहनकर खेलना याद आता हैं…”उसने हामी भरते हुए कहा, “हाँ… लड़कियाँ बचपन में माँ को कॉपी करती हैं उनके दुपट्टे को साड़ी की तरह पहनकर…देखो, बेटियाँ जल्दी ही बड़ी भी हो जाती हैं और अपने घर की हो जाती हैं…”“हाँ, और एकदम से परायी भी…” मेरे ये कहनेपर उसने आगे कहा, “अरे,  हाँ सही कह रही हो। कल ही मेरी बेटी का मैसेज आया। उस बेहद लंबे मैसेज में वह अपने बचपन की बातों का ज़िक्र कर रही थी। 
मुझे उसका यह मैसेज कुछ समझ नहीं आया की क्यों उसने अपने बचपन की बातें लिखीं थी। मैने भी एक स्माइली से हँसी में उसका साथ दिया। तुम तो जानती हो ना आयुषी को? देखो उसका मैसेज तुम भी पढ़ लो… “ कहते हुए उसने बेटी का मैसेज ओपन कर अपना मोबाइल मेरी तरफ़ कर दिया…
“माँ की साड़ी पहनकर जब मैं ख़ुद को शीशे में निहारती हूँ, तो वही छोटी गुड़िया बन जाती हूँ जो माँ को देखकर सोचती थी, ये दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला है। माँ के ऑफिस जाने के बाद, अपना चश्मा उतार फेंकती और आधे-अधूरे तरीक़े से उनके दुपट्टे की साड़ी बाँधकर महसूस करती कि मैं भी उन्हीं की तरह खूबसूरत हूँ।
अब, मैं जब ऑफिस के लिए तैयार होकर सीढ़ियों से उतरती हूँ, तो मेरा बेटा भी चहक उठता है। ताली बजाकर कूदने लगता है। यूँ तो अपने भाव ठीक से व्यक्त नहीं कर पाता, बस इतना कहता है, “मम्मा, आप साड़ी पहने हो।” उसकी आँखों की चमक बता देती है कि उसके लिए उसकी माँ दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला है। 
साड़ी एक ऐसा वस्त्र है जो सालों साल चुपचाप हमारा जीवन जीती है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि तुम कैसे दिखते हो, मोटे, पतले, लंबे, नाटे, जवान, बूढ़े। उसे शिकायत नहीं है कि तुम उसे ज़मीन पर घिसट रही हो। वो बस यूँ ही तन से लगकर साथ निभाती रहती है, जैसे ढाँढस दिला रही हो कि मत हो तू परेशान, जैसे मैंने तेरी माँ का ख्याल रखा, वैसे तेरा भी रखूँगी। 
सबसे ज़्यादा तकलीफदेह होता है वो समय जब किसी साड़ी को रिटायर करना पड़ता है। मैं आख़िरी वक़्त तक इनको रफू करवाने की अपराधी हूँ। शायद वो भी थककर सोचती होंगी, उफ़्फ़ बस भी कर और कितना चलाएगी मुझे। पर कैसे समझाऊँ उसे, कि उसे छोड़ना ऐसा लगता है जैसे माँ का एक हिस्सा मुझसे अलग हो रहा हो। 
और फिर सोचती हूँ, इन साड़ियों का क्या करूँगी मैं? कुछ लोग सचमुच खुशनसीब होते हैं, जिनके पास बेटियाँ होती है, अपनी सबसे क़ीमती विरासत सौंपने के लिए…”
मैंने एक साँस में ही मैसेज पढ़ लिया।मेरे आँखों के सामने जैसे दुपट्टे की साड़ी पहने छोटी आयुषी के रील की तरह चलने लगा।मैंने फ़ोन उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “मुझे लगता हैं उसको लिखना शुरू कर देना चाहिये… अच्छा लिखती है…”
उसने कहा, “अरे, दो ट्विन्स लड़कों के साथ ऑफिस और गृहस्थी को संभाल ले यही उसके लिए बड़ा काम हैं…”
मैं उसे कैसे कहती की उसकी बेटी बचपन के दिनों को याद करती हैं जब ज़रूरत के वक़्त घर में माँ नहीं होती थी…ऐसे बच्चों के दिल में एक ख़ामोशी चस्पाँ हो जाती है ..बच्चों के कोमल मन में माँ की ग़ैर मौजूदगी एक ऐसी असुरक्षा का भाव दे जाती है जिसे वे जीवन भर ढोते है..ऐसी तन्हाई का दर्द जो वे भुला नहीं पाते हैं... महफ़िलों में वे एक ओढ़ी हुई मुस्कान से मुस्कुराते हैं...वे दुनिया की दौड़ में आगे भी निकल जाते हैं... होंठों पे हँसी होती है पर उनका दिल कहता रहता हैं…काश हम माँ की साड़ी ही होते... उनसे अलग तो न होते !


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