फ़िज़ा ने रंगत बदल दी…
फ़िज़ा ने रंगत बदल दी…
खिड़की का पर्दा बंद करने के लिए उसने यूहीं बाहर देख लिया… एकदम से हाथ का पर्दा छोड़ वह पीछे हो गयी। वहाँ नीचे वह खड़ा होकर उसके ही घर की ओर एकटक देख रहा था।
फिर से आज वह आया था…पिछले दिनों उससे तमाम रिश्तें तोड़ने के बाद भी…
अब उन दोनों के रिश्तों में ‘वह’ बात नहीं रही…न जाने क्यों उनके रिश्तों में रहनेवाली गर्मजोशी ठंडी पड़ने लगी…
पिछले दिनों रिश्ते की टूटने की गहमागहमी के बाद भी वह आज वहाँ आ कर खड़ा हुआ था। क्या वह उस दिन की बात भूल गया?
कितनी ही देर खिड़की से झाँकते हुए न जाने किस आवेग से वह नीचे उतरकर उसके क़रीब खड़ी हो गयी…
वह अपनी गहरी आँखों से उसकी तरफ़ अपलक देख रहा था। उसकी उन गहरी निगाहों ने फिर से उसे मोम की तरह पिघला दिया…
उसी पिघलन में उसने सवाल किया, “क्यों आये हो? क्या चाहते हो मुझसे?”“मेरे साथ चलो…” उसने हक़ जताते हुए कहा।“नहीं, यह नहीं हो सकता…मुमकिन नहीं..”उसने चिरौरी करते हुए कहा, “नहीं तो फिर मुझे इस घर के अंदर आने दो…मुझे ‘हमारे घर’ आने दो…”वह सवालिया नज़रों से कहने लगी, “हमारा घर? अब हमारे घर जैसा कुछ नहीं बचा हैं…अभी हम ‘हम’ नहीं हैं… सब कुछ ख़त्म हो गया।”“क्यों क्या हुआ? कहते हुए उसने अपना ओवर कोट उस को ओढ़ाया और जरा नज़दीक होते हुए उसके माथे को चूमा… हमेशा की तरह केयरिंग… “क्या हुआ? जैसे की तुम जानते नहीं?”
उसकी ओर कुछ दिन पहले तक उन दोनों के बीच सब कुछ अच्छा था… उसके लिए उसका साथ एक सुकून देता साथ था…
मुझे तुम अच्छी लगती हो… तुम्हारे पास मुझे सुकून मिलता हैं। जल्दी ही मेरा तलाक़ होने वाला हैं कहते हुए यह आदमी उसके साथ सालों से रहता आ रहा था… झूठ बोलता आ रहा था… और जब मैंने इस रिश्तें को कोई नाम देने की बात की तो यह पलट गया। इस रिश्ते को टूटने के बाद कितनी बेशर्मी से कह रहा हैं, “कोई और हैं? क्या तुम किसी और से मोहब्बत करने लगी हो?” हद हैं खुदगर्ज़ी की… उसके लिए यह बहुत बड़ा शॉक था… क्या वह उसे इतना ही जानता था? ये उसे क्या समझ रहा था? खामोशी से आँखों में खालीपन लिए लड़की वापस हो ली…शॉक की स्टेट में ही उसने उस ओढ़ाये हुए ओवरकोट को गिरा दिया…
टीवी के इस ड्रामें में वह खो सी गयी थी। एडवर्टाइजमेंट आने से वह हक़ीक़त में लौट आयी…
यह क्या? ड्रामे की हीरोइन तो डिट्टो उसके जैसे ही लग रही थी…वही थी…जैसे ड्रामे में उसकी ही कहानी चल रही थी…इतने सालों के बाद ज़ख्म पर जमी पपड़ी से जैसे ख़ून रिसने लगा था…
जैसे यह कल की बात हो…उसको याद आया उनकी पहले दिन की वह मुलाक़ात…
दिनभर ऑफिस करने वाली वह…ऑफिस में किसी मीटिंग में सब को अपने व्यू रखने को कहा गया था तब उसने बड़ी ही बेबाकी और बिना किसी संकोच से अपना पॉइंट ऑफ़ व्यू शेयर किया था।सब ने तालियाँ भी बजायी थी। बॉस उसकी तरफ़ अपलक देख रहे थे। मीटिंग के बाद बॉस ने सब को लंच के बारें में पूछा… कैजुअल बातें की… फ़ैमिली में कौन कौन हैं वग़ैरा… वह इम्प्रेस हो गयी… इतनी अच्छी पोजीशन का व्यक्ति इतना डाउन टू अर्थ?
इस पहली मुलाक़ात के बाद बॉस उसको बुलाने लगे…कभी प्रेजेंटेशन के लिए तो कभी किसी इनपुट के लिए…धीरे धीरे उनके बुलाने की फ्रीक्वेंसी बढ़ने लगी…बॉस अपने फील्ड में एक माने हुए व्यक्ति थे…एक सक्सेसफुल बिज़नेसमैन… एक करिजमैटिक शख़्सियत के मालिक…उनकी एक निगाह के लिए उनके कॉरपोरेट ऑफिस की औरतें लालायित रहती…
ज़िंदगी में कब, कौन, क्यों अच्छा लगेगा इसका कोई तय फार्मूला नहीं हैं… उसके साथ भी यही हुआ…उसको अपने इंटेलिजेंस पर बहुत नाज़ था… लेकिन उनकी कशिश ने जैसे उसके इनोसेंस, इंटेलिजेंस, मॉरेलिटी, लीगेलिटी सभी को धता बताते हुए वह उसका साथ चाहने लगी थी बावजूद ये जानते हुए की वह शख़्स मैरिड हैं। साथ बढ़ता गया…चाहत बढ़ती गयी…अगर ऐसा कोई सक्सेसफुल और इंटेलीजेंट व्यक्ति आपको चाहता हैं तो ज़िंदगी में और क्या चाहिए भला? इसी ख़ुमारी में वह आसमाँ में उड़ने लगी…दिन…महीने…साल…बॉस भी वक्त चुराकर उससे मिलने को बेक़रार रहते थे। दोनो का यह रिश्ता लंबा चला। एक दिन उसने अपने रिश्ते को नाम देना चाहा…शादी? बॉस एक मंजे हुए मैनेजर थे…उनका प्रॉब्लम्स हैंडल करने के तरीकें को वह उसी दिन जान गयी जब उन्होंने कहा की सब कुछ तो सही चल रहा हैं? तुम्हें क्या दिक्कत हैं? मैं आता तो तुम्हारे पास रेग्युलरली रात को… फिर? मुझे तो यह सिस्टम सही लग रहा हैं… इसमें कोई इश्यू भी नहीं हैं…एवरीथिंग इज़ गोइंग वेल…
उसको वह जवाब मिल गया जिसे वह सुनना नहीं चाहती थी। लेकिन अब सब साफ़ हो गया…वह अपना स्टेटस समझ गयी…
क्या कहे इसे?
कीप?
रख़ैल?
और बच्चों का क्या?
क्या कभी वह माँ नहीं बन सकेगीं?
वह इतने लंबे अरसे में भी उसे पहचान क्यों नहीं पायी। रिज़ाइन देकर उसने सब कुछ खत्म किया…दूसरे शहर में अपनी नयी ज़िन्दगी की शुरुआत की। नयी नौकरी…नया ऑफिस.. सुबोध जैसे व्यक्ति से शादी हो गयी…सुबोध के बेइंतहा प्यार ने उसके दिल के तमाम गहरे ज़ख्म भर दिये…. शायद वक़्त सभी घाव भर देता हैं…धीरे धीरे जिंदगी खुशगवार हो गयी…
लेकिन आज?
टीवी के ड्रामे ने सबकुछ उलट पलट कर दिया…वह खामोशी से उठी और स्टडी में अनमने ढंग से किताबों के पन्नें पलटने लगी।ताज़ी हवा के लिए गार्डन में आकर फूलों को देखने लगी… गुलाब के सुंदर फूलों को छूने लगी… अचानक उसने गुलाब से हाथ पीछे खिंच लिये…उसको याद आया की बॉस कभी कभी गुलाब वाले बुके लाते थे…उन सुंदर गुलाबों की कोई ग़लती नहीं थी इसी गिल्ट में वह सोचने लगी की हमारी यादें पता नहीं क्यों डिलीट भी नहीं होती हैं? झट से उन गुलाबों की क्यारियाँ छोड़ वह आगे निकलकर ड्रॉइंग रूम में आ गयी…आज का उसका अनमनापन जा ही नहीं रहा था…
डोर बेल की आवाज़ आयी…उसने दरवाज़ा खोला। सुबोध आ गये थे… अपने किसी दोस्त से मिलने गये थे…“अरे, यह क्या हुआ हैं तुम्हें? एक दिन क्या घर में तुम्हारे साथ नहीं था तो तुम इतनी उदास हो गयी मेरे बिना?”
उनकी हँसी इतनी निश्छल थी की मैं भी उनके साथ मुस्कुरा उठी…इस एक हँसी ने फ़िज़ा की रंगत ही बदल दी… लगा की जैसे मौसम बदल गया हैं…
