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Kunda Shamkuwar

Abstract Others

4.3  

Kunda Shamkuwar

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लेकिन

लेकिन

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मेरे पास बहुत सारे 'लेकिन' हैं… क्या करूँ मैं इनका?

लेकिन आप शायद जानते नहीं की ये सारे 'लेकिन' अलग अलग हैं…

घर वाले 'लेकिन'…

परिवार वाले 'लेकिन'…

ऑफिस के ढेर सारे 'लेकिन'…

सोशल सर्कल के 'लेकिन'…

हर 'लेकिन' की अलग कहानी हैं…

हर 'लेकिन' की अलग कैफ़ियत…

लेकिन ये लेकिन' कभी कभी रूप भी बदल लेते हैं… 

कुछ 'लेकिन' बड़े ही स्मार्टली काश के मुखौटे धर कश्मकश के साथ आगे आकर खड़े होते हैं…

आजकल मैं जहाँ रहती हूँ वहाँ मुझे अज़ान सुनाई देती हैं। अभी तक मंदिरों की घंटियाँ सुनने की आदि रही हूँ…ब्रेन कंडीशनिंग के कारण फिर से अजान और मंदिर की घंटियों के साथ साथ मंदिर मस्जिद की बातें मेरे मन में गड्डम गड्डम होने लगती हैं… मेरे मन में ढेर सारे लेकिन और काश फिर से खड़े हो जाते हैं।

मेरे लिए मंदिर की घंटी भी ठीक वैसे हैं जैसे अज़ान की आवाज…अब पूजा और इबादत में कैसा फ़र्क़ ?

हाँ, तो बात शुरू हो गयी थी 'लेकिन' पर और पता नहीं क्यों मंदिर मस्जिद, अजान और मंदिर की घंटियों पर भटक गयी हैं…

आज हालात ही ऐसे हैं… मन कुछ कहता हैं लेकिन…क्या करे इनका? 

घर के 'लेकिन' को सॉल्व करते ही परिवार और उसके बाद सोशल फिर ऑफिस वाले 'लेकिन' साथ आते हैं….हर तरफ़ 'लेकिन' ही 'लेकिन'!!!

लेकिन आज मैंने ठान लिया हैं की सारे लेकिन की नेगेटिविटी को पॉजिटिविटी में बदल दूँगी। हाँ, बिल्कुल…सभी मसलें जो लेकिन पर रुक जाते हैं वहाँ हालाँकि, फिर भी, दूसरी ओर तथा इसके विपरीत से मैं रिप्लेस कर दूँगी। वाक़ई देख लीजिए सभी लेकिन की टोन ही बदल गयी…

अचानक अज़ान की आवाज सुनाई दी। झट से मैंने घर के मंदिर की घंटी बजायी…कही इबादत होने लगी तो कहीं पूजा..


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