Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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मेरे पापा (3) ..

मेरे पापा (3) ..

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माँ ने, हामी में सिर हिला कर उत्तर दिया था। 

तुरंत ही मैंने जिज्ञासु स्वर में पूछा - "क्या बताया, उन्होंने?" 

माँ ने कहा - "जो उन्होंने बताया उसका सार यह है कि सारिका जी एवं सुधीर जी की शादी 28 वर्ष पूर्व हुई थी। विवाह रस्मों में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए, सारिका जी की बड़ी बहन, बहनोई अपने माता, पिता एवं अबोध शिशु के साथ, जब अपने शहर जा रहे थे तब, राजमार्ग पर देर रात्रि में, उनकी कार, 10-12 नक्सलाईट्स ने अवरोध डालकर जबरन रोकी थी।

उस समय, सारिका जी के बहनोई का आईपीएस अधिकारी होना, नक्सलाईट्स को पता चला था। उन लोगों ने, पुलिस के प्रति अपनी नफरत में, कार में मौजूद सभी लोगों की निर्ममता से हत्या कर दी थी। अगली सुबह, हादसे की सूचना, सुधीर जी को मिली थी। वे शवों के लेने तथा उनके दाह संस्कार करने के विचार से, थाने पहुँचे थे। वहाँ उन्हें शवों के साथ ही, 5 माह का बहनोता, सुशांत जीवित सौंपा गया था। 

सुधीर जी, इस हृदय विदारक हत्याओं से अत्यंत दुःखी हुए थे। उन्होंने, इन मौतों का जिम्मेदार स्वयं को ही माना था। वे सोचते थे कि वे सभी, उनके विवाह में ना आये होते तो, इस तरह मारे नहीं जाते। 

इसके प्रायश्चित में सुधीर जी ने सुशांत का लालन पालन, अपने (हुए होते) बेटे की तरह करने का निर्णय किया। सारिका जी ने, सुधीर जी की भावनाओं का आदर किया था। 

उन दोनों ने मिलकर, अपने विवाह के पहले सप्ताह में ही, यह तय कर लिया कि वे अपनी संतान नहीं करेंगे। उन्हें संदेह था कि स्वयं की संतान होने पर, कहीं दोनों ही, सुशांत एवं अपनी संतान में भेद ना करने लगें। 

सारिका जी ने यह सब ऐसा कहते हुए, बताया कि - सुशांत तक को, यह वास्तविकता नहीं मालूम कि वह मेरा जन्म दिया बेटा नहीं है। सुशांत के विवाह होने के बाद, इस सच्चाई का पता होने से आप लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि हमने, आप से इसे छिपाया था। इस विचार से सुधीर जी ने, मेरे द्वारा अभी ही यह, आपको बताया जाना उचित माना है। 

यह सब सुनकर मेरा नारी हृदय द्रवित हो गया था। वह कोई तर्क मुझे, समझ नहीं आ रहा था जिसमें, कोई इस क्रूरता से अंजान लोगों की हत्या कर देता है। किसी वर्ग विशेष की, अन्य वर्ग विशेष के प्रति ऐसी नफरत, मेरे नारी मन की समझ से परे थी।

नक्सलाइट्स की पुलिस के प्रति नफरत तो समझी जा सकती थी लेकिन, किन्हीं अंजान व्यक्तियों को, पुलिस परिवार के होने मात्र से, ऐसे मार देना मेरी समझ में, हैवानियत पूर्ण एवं सर्वथा अनुचित कृत्य था। ऐसा जघन्य कृत्य, किसी भी मानव को, यदि वह इस पर ध्यान पूर्वक, गंभीरता से विचार करे तो भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से उद्वेलित करने वाला हो सकता है। मगर मेरी माँ ने इसे, अपनी अपेक्षाओं से बिना विचारे एक घटना की जानकारी होने जैसा ही लिया था। 

जब ऐसी हृदय विदारक घटना से इस परिवार एवं सुशांत के प्रति उनका हृदय संवेदना से भर जाना चाहिए तब मेरी माँ अपनी बेटी के (मेरे) भविष्य को लेकर ही अपनी मोहपाश में बँधी प्रतिक्रिया दे रहीं थीं। साफ़ था एक ही घटना के प्रति इस समय, मेरे और उनके दृष्टिकोण, एकदम विपरीत थे। अपने मनोभाव छुपाते हुए मैंने माँ से कहा - माँ, बताये गए इस विवरण से, सुशांत उनका बेटा नहीं, यह स्वमेव ही महत्वहीन हो जाता है। 

मेरी कही को अनसुनी करते हुए, माँ ने नापसंदगी से कहा - "सारिका जी ने यह भी बताया है कि सुशांत, जब हमें सुविधा हो हमारे घर आना चाहता है। मैंने, उन्हें अभी टाल दिया है. मैंने कहा है, रमणीक के ऑफिस के कार्यों में सुविधा अनुसार, हम सुशांत को घर मिलने आने के लिए, दिन एवं समय बता देंगे। निकी तुम, मेरी मानो तो मुझे तो यह प्रस्ताव, इन मालूमातों के बाद स्वीकार करने योग्य नहीं लग रहा है। "

मैं समझ पा रही थी कि उनकी, मेरे से ममता ने, उनकी आँखों पर वह चश्मा डाल दिया था जिसमें, उस परिवार के उत्कृष्ट सिध्दांत एवं विचार भी उन्हें सुहा और प्रभावित नहीं कर पा रहे थे। सुशांत के आर्मी ऑफिसर होने का पता चलने के बाद से उनमें यह परिवर्तन आया था। 

मैं अभी सोच ही रही थी कि माँ ने पूछा - "निकी, क्या मुझे, उनसे अभी ही यह नहीं बता देना चाहिए कि हम सुशांत से रिश्ता नहीं जोड़ पाएंगे?"

इस समय मैं, माँ से बिलकुल ही विपरीत तरह से विचार कर रही थी। मैं भीतर ही भीतर प्रसन्न थी कि मेरी आशंकाओं के उलट, मेरे साधारण रूप को देखने के बाद भी सुशांत की मुझ में रूचि बनी हुई थी। तब भी मुझे माँ के मनोविज्ञान को समझते हुए ही उनके समक्ष, अपने तर्क रखते हुए, उन्हें रिश्ते के लिए चलते सिलसिले को बढ़ने देने के लिए सहमत करना था। 

मैंने कहा -" अभी आप सुशांत से नहीं मिलीं हैं, उसे देख लीजिये, उससे मिल लीजिये। उसके बाद तय कर लेंगे क्या करना उचित होगा। अभी जल्दबाजी में ना करना, मुझे ठीक प्रतीत नहीं हो रहा है।" 

जैसे माँ का आदर रखते हुए मैं, बात कह रही थी। वैसे ही अपनी नापसंदगी के बावजूद माँ भी, मेरी भावनाओं को आहत नहीं करते हुए, मुझे समझाने की नीयत से बोली थीं - 

"निकी, सुशांत लाख हीरा सही मगर, तुम समझो तो कि वह एयरफोर्स में है और सीमा पर इसी समय युध्द के बादल छाये हुए हैं। मुझे तो उसके साथ, तुम्हारे जीवन की कल्पना से ही भय लगने लगा है। "

मैंने प्यार से उनसे कहा - 

"माँ, आपका ऐसे भयाक्रांत होना मुझे समझ आता है। हमारे परिवार में किसी के फौजी होने का इतिहास नहीं है इसलिए हम डरते हैं। जबकि हर सैन्य कर्मी का, देश के रक्षा दायित्वों के साथ अपनी आजीविका चलाना, महान गौरवशाली उपलब्धि एवं कार्य होता है। रात ज्यादा हो रही है, अभी आप सो जाइये । कल सुबह, इस रिश्ते के सभी पहलू पर हम फिर विचार कर लेंगे।" 

माँ ने अमनस्कता एवं दुविधा के होते हुए भी मेरी बात का प्रतिरोध नहीं किया बोलीं - 

"ठीक है निकी अभी तुम भी निश्चिंत हो सो जाओ। हम कल फिर बात करेंगे। हो सके तो, तुम्हारे जीजू से भी बात कर लेंगे। 

यह कहकर वे अपने कक्ष में चली गईं थी। "

जीजू के नाम के उल्लेख से मेरे मन में वितृष्णा भर गई। सब के सामने अत्यंत सलीके से पेश आने वाले जीजू, उतने अच्छे व्यक्ति नहीं हैं, जितना माँ और दीदी उन्हें समझती हैं। मैंने जीजू की एक बात, उनसे छुपाई हुई है ताकि दोनों के मन में उनके प्रति चिढ ना आ जावे। 

हमारे छोटे से परिवार में, मैं, अपने कारण परस्पर कोई खटास उत्पन्न नहीं करना चाहती थी। मैं, जीजू को इस तय होते दिख रहे रिश्ते में अभी कोई भूमिका देना पसंद नहीं कर रही थी। मैं, माँ को इसके लिए समझा सकूँगी इस विश्वास से मैंने, जीजू को अपने विचारों से बाहर निकाल दिया था।  

अब मुझे अपने पापा की (जब जीवित थे) कही बात याद आ गई थी कि - 

दुश्मन से अगर ज्यादा समस्या हो जाए तो उसी से समाधान पूछना चाहिए। अगर वह भला व्यक्ति होगा तो निःस्वार्थ एवं निष्पक्ष समाधान स्वयं बताएगा। यह जरूरी नहीं कि हमारा दुश्मन ही खराब व्यक्ति होता है। कभी कभी खराबी हम में ही होती है, जिसे हम अनुभव नहीं कर पाते हैं। 

यह सोचते हुए कि यद्यपि सर और उनका परिवार, हमारा दुश्मन तो नहीं था तथापि उनके ओर के प्रस्ताव एवं मेरे भविष्य को लेकर माँ की चिंता से, हम दोनों परिवारों के बीच एक समस्या अवश्य निर्मित हो गई थी। उसके हल के लिए मैंने, सर से ही बात करना उचित समझा।   

मैंने घड़ी पर दृष्टि डाली, देखा 10.20 का समय हो रहा था। मैंने विचार किया कि सर से बात करने का यह समय उचित होगा या नहीं। फिर मैंने उन्हें एक मिस कॉल करने का निर्णय किया। उनका नं मिलाया, एक घंटी बस की, और बंद कर दिया था। यह सर पर छोड़ दिया कि वे अभी बात करें या नहीं। 

दो मिनट में ही उनका कॉल आ गया, उन्होंने पूछा - निकी, कोई विशेष बात है?

मैंने उल्टा प्रश्न किया - क्षमा कीजियेगा सर, क्या आप, अभी थोड़ी बात कर सकेंगे। 

उन्होंने कहा -' हाँ, निःसंकोच कहो?"

मैंने कहा - "सर, आपसे मुझे, पापा वाला मार्गदर्शन चाहिए। क्या दे सकेंगे, आप?"

उन्होंने कहा - "रमणीक, यह विशेषाधिकार तुम्हें है। मैं तुम्हारी दुविधाओं में, तुम्हारे ही पापा जैसा, मार्गदर्शन करने का प्रयास करूँगा। 

मैंने बिना अन्य भूमिका के उनसे पूछ लिया - सर, कृपया यह बात अपने तक ही रखना, मैं यह जानना चाहती हूँ कि सुशांत जो एक फौजी हैं, मेरा, उनकी जीवन संगिनी होना मेरे हित में होगा?"

दूसरी तरफ कुछ क्षणों की चुप्पी रही। साफ था कि सर के लिए मेरा, यह प्रश्न अप्रत्याशित था। उन्होंने उत्तर देने के पहले विचार करने को कुछ पल लिए थे। फिर उत्तर दिया था - 

रमणीक, तुम्हारे प्रश्न में दो मुद्दे हैं। 

पहला - "तुम्हारे से, हमारे परिवार की अपेक्षा। इस पर मैं यही कहूँगा कि हमारे बेटे सुशांत की खूबियों एवं कमियों को तुम एवं तुम्हारे परिवार को खुद समझना चाहिए। सुशांत के बारे में मेरे कहने में, उसके पिता होने के पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जिनसे मैं, तुम्हें प्रभावित नहीं करना चाहता। 

दूसरा मुद्दा एक फौजी से तुम्हारा, जीवन भर के साथ के, निर्णय लेने का है। इस बारे में मेरा मानना है कि फौजी अकाल शहीद होते हैं, यह भ्राँत धारणा, उन परिवारों में होती है जिनका कोई सदस्य फौजी नहीं होता है। 

फौजी वास्तव में कोई आतंकवादी नहीं होते जो, आतंकवाद का हिस्सा हो जाने के 5 वर्ष के भीतर ही, 80% से अधिक मार गिराए जाते हैं। आँकड़ों को यदि तुम देखोगी तो तुम्हें दिखाई देगा कि 1 प्रतिशत से भी कम ही फौजी अकाल शहीद होते हैं। शेष फौजी, अपना पूरा जीवन, सगर्व जीते हैं। 

अतः आर्मी ऑफिसर की जीवनसंगिनी होने से या उनके परिवार में सदस्य होने से, यह शहादत वाला भय व्यर्थ होता है। अकाल मौत का होना इतने ही प्रतिशत लोगों में तो, सेना में नहीं होते हुए भी रहता है।

आर्मी फैमिली में बहुधा एक अन्य कठिनाई या वेदनादायी स्थिति निर्मित होती रहती है। वह यह कि जब जब सीमा पर या देश के भीतर कोई डिस्टर्बेंस होता है और घर का सेना में शामिल सदस्य, वहाँ तैनात होता है, तब तब उसके जीवन को लेकर, परिवार में गहन चिंता रहा करती है। 

ऐसे में सामान्य बने रहने के लिए मानसिक रूप से दृढ होने की जरूरत होती है। तुम्हें सुशांत से विवाह का फैसला लेने के पूर्व, अपनी मानसिक क्षमताओं का परीक्षण अवश्य करना चाहिए। तुम्हारे प्रश्न पर यही मेरा परामर्श है। 

यह कह कर सर, चुप हुए थे। मैं उन्हें अब तक मंत्र मुग्ध हो सुन रही थी। उनके चुप होने पर मैंने, कहने के लिए शब्द खोजे थे फिर कहा था - 

सर, मुझे लगता है मेरे पापा होते तो शायद वे ही इस तरह से, मेरा मार्गदर्शन कर पाते। मैं, कैसे आपसे अपनी कृतज्ञता व्यक्त करूं, मुझे उचित शब्द ही नहीं सूझ रहे हैं। 

सर की हल्की हँसी सुनाई पड़ी थी। फिर उन्होंने कहा था - 

मुझ में,तुम, अपने पापा की छवि देखती हो फिर क्यूँ इस औपचारिकता में पड़ती हो। रात ज्यादा हो रही है। अब तुम्हें निश्चिंतता से, सो जाना चाहिए। 

मैंने हँसकर, सर से शुभ रात्रि कहा था उन्होंने भी यही कह कर, कॉल काट दिया था"। 

अब मैं, सुशांत से मिलकर लौटने से लेकर, अब तक रहे तनाव से, स्वयं को मुक्त अनुभव करते हुए सो गई थी। अगली सुबह मैंने सबसे पहला काम अपने ऑफिस से अवकाश के लिए मेल लिखने का किया था। माँ के साथ चाय लेते हुए उन्हें, सर से रात में की गई, सभी बात बताईं थीं। फिर मैंने उनसे कहा था, माँ ये इतने भले लोग हैं इनकी भलमनसाहत हर अगले दिन और अधिक बढ़कर अनुभव में आती है। आप एक बार सुशांत को घर आने दीजिये, उससे मिलकर देख लीजिये। 

माँ ने मेरी भावना को समझा था, वे क्यूँ न समझतीं! पापा के बाद, वे मुझसे ही तो सबसे ज्यादा करीब थीं। उन्होंने कहा - "फिर बताओ, सुशांत को कब आने कहूँ?"

मैंने कहा -"आज ही लंच पर आमंत्रित कर लीजिये। मैंने ऑफिस से आज का अवकाश ले लिया है। "

मेरी चिंता में आधी हो रही मेरी माँ ने मेरी अधीरता को पहचाना था। अपनी चिंताओं को, इस क्षण में अपने से परे धकेल, वे मुस्कुराईं थीं। फिर उन्होंने कॉल पर, सारिका आंटी से, सुशांत को 12.30 पर आने का निमंत्रण दे दिया था। 

सुशांत आर्मी ऑफिसर थे ही, समय की पाबंदी से ठीक 12.30 पर घर के दरवाजे पर आये थे। दरवाजे पर स्वागत माँ ने ही किया था। उन्हें बैठक कक्ष में बिठाया था। 

फिर माँ अंदर मेरे पास आईं थीं। उन्होंने धीमे स्वर में बताया - "सुशांत, आ गया है। दरवाजे पर ही उसने, मेरे चरण छुए हैं। क्या पर्सनैल्टी है, वाह! लड़का हीरा ही नहीं, कोहिनूर भी है।"

मैं, माँ का मुख निहारने लगी थी। मैं जानना चाहती थी कि माँ के श्री मुख से यह बात उनके पैर छुए जाने की ख़ुशी मात्र से निकल रही है या वे युवा आर्मी ऑफिसर के, प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुई हैं?                    



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