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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract Drama Action


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract Drama Action


मेजर पति की कमी ..

मेजर पति की कमी ..

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यह संयोग मुझे भयभीत कर रहा था कि राष्ट्र सेवा में अपने प्राण बलिदान कर देने वाले, मेजर का विवाह भी 21 दिस. 2019 को हुआ था। हमारे विवाह की तिथि भी यही थे।

मेजर वे, राष्ट्र सुरक्षा के लिए तैनात रहे थे। जबकि शौर्य (मेरे पति) इस समय कोरोना से जंग में, अपने रात दिन लगा रहे थे।

मैं राजस्थान के जैसलमेर में, ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी थी। मैं 21 वर्ष की ही हुई थी कि लगभग पाँच महीने पहले, मेरा विवाह कर दिया गया था। मेरी तरह ही, कम उम्र के मेरे पति भी, एमबीबीएस के पढ़ाई के अंतिम वर्ष में, जयपुर में पढ़ रहे थे।जहाँ, सेना में, जान पर बन आना अनोखी बात नहीं थी। शहीद हुए मेजर, सेना में अपनी सेवा दे रहे थे। 

वहीं शौर्य डॉक्टर होने जा रहे थे। इनके पेशे में जान को खतरा नहीं होता बल्कि इस प्रोफेशन में लोग, औरों जान बचाते हैं। मगर भिन्न तरह की परिस्थिति में, लगभग दो माह से, कोरोना महामारी के प्रकोप देश में, बढ़ गया था। 

ऐसी अभूतपूर्व परिस्थिति निर्मित होने से, शौर्य जो अभी पूरी तरह से डॉक्टर नहीं हुए थे, की ड्यूटी भी कोरोना संक्रमित वार्ड में लगा दी गई थी। 

कोरोना विरुध्द जंग में, अतः मेरे पति की जान पर भी, सैनिकों जैसे ही बन आई थी। 

डॉक्टर और अस्पताल स्टाफ के भी संक्रमित होने की, प्रतिदिन खबरें आ रही थीं। जिनमें से कुछ प्राण भी गँवा रहे थे। कृतज्ञ राष्ट्र, ऐसे डॉक्टर्स को कोरोना वारियर कह रहा था। जीवन से हार गए डॉक्टर्स को, शहीदों सा सम्मान भी दिया जा रहा था। 

तब भी मैं, हर घड़ी व्यथित एवं चिंतित रहती थी। अभी हमारे ब्याह को पाँच महिना ही हुआ था। जिसमें भी, अपनी पढ़ाई के कारण, शौर्य और मैं, थोड़ी थोड़ी अवधि में, बमुश्किल डेढ़ महीने ही, साथ रह सके थे। 

मुझे, शौर्य के हर समय साथ की, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा तो थी। लेकिन पढ़ाई के बीच ही उनकी कोरोना वार्ड में लगा दी गई ड्यूटी से, उनके प्राणों पर मुझे, संकट दिखाई पड़ता था। अपनी ही कल्पना, जिसमें मैं, शौर्य का शहीद हो जाना देखती थी, उससे जब तब, मैं घबरा जाया करती थी।

मैंने शौर्य से, विवाह के दिन से ही, अपने जीवन के, सतरंगी सपने देखे थे। मैं बिना शौर्य के, रंगहीन जीवन की कल्पना से, सिहर उठती थी। 

मोबाइल पर, शौर्य से, जब मैं अपनी घबड़ाहट बताती तो, वे हँसते और मुझे साहस रखने कहते। कभी ही, किसी को, जीवन में ऐसा अवसर मिलता है, जब कोई, अपने प्राणों पर खेलकर, औरों की रक्षा करता है। 

मैं, पूरी सावधानियों से ड्यूटी कर रहा हूँ। तुम निश्चिंत रहो, मैं इस समय को सुरक्षित पार करूँगा। तुम और मैं, साथ साथ ही पूरे जीवन का आनंद लेंगे। जल्द ही मैं वापिस आऊँगा।   

बीत रहे, व्याकुलता के इन दिनों में ही, मुझे, मेजर का शहीद होना मालूम पड़ा था। यह दुःखद समाचार तो मेरी घबड़ाहट बढ़ा ही रहा था, तिस पर उनके और हमारे विवाह की, एक ही तिथि का होना, ऐसा अनूठा संयोग तो मुझे, अधमरा ही कर दे रहा था।

मेरे ऐसे कमजोर पड़ रहे आत्मबल में, जो थोड़ी कसर रह गई थी, वह शौर्य के कल रात के कॉल ने पूरी कर दी थी। 

शौर्य बता रहे थे कि 

शराब की बिक्री, आरंभ होने से जिस अधीरता से, शराब की दुकानों में धक्कामुक्की करते हुए टूट रहे हैं, उससे डिस्टैन्सिंग की सतर्कता नहीं रह रही है। ऐसे में संक्रमित हो, रोगियों के आने की सँख्या, बहुत बढ़ सकती है और हमारे चिकित्सा संसाधन और हम डॉक्टर्स पर अत्याधिक भार आ सकता है 

सुनकर, मै मोबाइल पर ही रोने लगी थी। शौर्य ने यह बताना, लगता था अपनी भूल जैसा अनुभव किया था। बाद मैं, भूल सुधार में अपने को निष्फ़िक्र दिखाते हुए हँस रहे थे। मुझसे कहा था, पगली हो तुम कुछ भी सोचती हो और डर जाती हो। मुझे हँस के बात करने कहते रहे थे। तब मैं, झूठे भी, हँस न सकी थी। उन्होंने हिम्मत रखने कहते हुए, कॉल बंद किया था। 

मेरी मनः स्थिति जैसी हुई थी, वैसा ही दुःस्वप्न, रात के अंतिम पहर, मुझे आया था। 

मैं अपनी चूड़ियाँ तोड़ रही थी और मेरी माँग का सिंदूर कोई पोंछ रहा ।

ऐसे दृश्य से घबरा कर, मेरी नींद टूटी थी। 

मुझे, एकबारगी यह जान, तसल्ली हुई थी कि यह सच्चाई नहीं, दुःस्वप्न है। मगर तभी याद आया था कि लोग कहते हैं, अंतिम पहर का देखा सपना, हकीकत हो जाता है।  

निष्प्राण सी हुई, किसी अपने से भी, मैं अपने भय शेयर नहीं कर रही थी कि वे भी डरेंगे और दुःखी होंगे। 

मैं तब, अपने सारे डर को झुठला कर, आत्मविश्वास बनाये रखने के उपाय रूप, गृह के दैनिक कार्यों में व्यस्त रहने की कोशिशों के अतिरिक्त, समाचार पढ़ने और अपनी डायरी लिखने में लग गई थी। 

मेरी लेखनी, अत्यंत धिक्कार, लिख रही थी, उन मजहबी, अति अंधविश्वासी, गद्दार तरह के मतलबपरस्त लोगों के लिए, जो मेजर तरह के अनेकों फौ जियों को, शहीद हो जाने की कटु परिस्थितियाँ निर्मित कर रहे हैं। और अपनी अति भोगलिप्सा में, मेरे पति शौर्य के जैसे डॉक्टरों के, प्राणों पर संकट उत्पन्न कर रहे हैं। 

फिर, यह लिखते हुए मेरा ध्यान,अपने धार्मिक अंधविश्वासों, अपने स्वार्थ प्रेरित लालसाओं तथा अपनी भोग कामनाओं की ओर चला गया था। 

अब धिक्कार, मुझे स्वयं अपने पर, होने लगा कि, एक संस्कारी बेटी मैं, एक विवेकवान मनुष्य मैं, कैसे औरों के बारे में उदासीन हो सकती हूँ। 

मैं चाहने लगी कि 

एक ऐसा घोड़ा और एक ऐसी तलवार मुझे मिल जाए, जिस पर हवा की गति में सरपट चलते हुए, अपनी तलवार से, समस्त समाज बुराई को काटते छाँटते हुए, अपना समाज परिवेश मैं, निर्मल एवं निश्छल कर दूँ। 

फिर मेरे ध्यान में, शहीद मेजर की, मासूम एवं सुंदर पत्नी की धीर गंभीर छवि आ गई। जो मेजर की राजकीय सम्मान से की गई अंत्येष्टि के समय, यद्यपि रोते तो नहीं दिखाई पड़ रही थी। लेकिन मेरे जितने ही समय से ब्याहता वह, शायद उसे भी मेजर का साथ डेढ़ दो महीने का ही मिला होगा। मैं उसकी मनः स्थिति को, समझ पा रही थी। 

मैं तो शौर्य के शहीद होने की कल्पना में ही, रो रो कर, अपना बुरा हाल कर रही थी। कल्पना ही मुझे अधमरा कर रही थी। 

जबकि उस दुर्भाग्यशाली पत्नी का, पति तो कभी ना वापिस आने के लिए चला जा चुका था।मुझे, किसी शहीद, के फौजी परिवार के इर्द गिर्द, दुनिया द्वारा बुन दिया गया ताना बाना भी सोचा समंझा सा, एक षणयंत्र सा लग रहा था। जिसमें, ऐसे मातम और गहन दुःख के समय में, रोने के स्थान पर, किसी शहीद के, माँ-पिता, पत्नी-बच्चे तथा भाई-बहन आदि, इस अवसर को गौरवशाली बताने को विवश होते हैं। 

फिर मुझे, ऐसे उथले से विचार पर अपने, पुनः धिक्कार हो आया। मुझे प्रतीत हुआ कि नहीं मैं कदाचित उतनी भली नारी नहीं हूँ। मैं, उन्हें भी अपना जैसा ही, हल्का मनुष्य समझ रही हूँ। 

कदाचित एक भव्य परंपरा होती है। कदाचित बहुत ऐसे, वे महान परिवार और वे मनुष्य होते हैं, जिन्हें अपने से ज्यादा अपने राष्ट्र हित और परोपकार प्यारे होते हैं। जो इन लक्ष्यों को सुनिश्चित करने, ख़ुशी से अपने प्राणों के बलिदान को, अपना जीवन सार्थक करना जानते हैं। 

निश्चित ही, ऐसे परिवार और इस माटी के, बहुत ऐसे लाल होते हैं। इन परिवारों की परंपरा आज की नहीं है, आज की बुराइयाँ, इन्हें खत्म नहीं कर सकती। इस राष्ट्र में ये भव्य परिवार और लोग अनंत काल तक अस्तित्व में रहने वाले हैं।   

अब मेरे मन में एक विचित्र से विचार उत्पन्न हो आया कि काश में नारी नहीं, एक युवक होती, जो शहीद हो गए मेजर की, उस मासूम का हाथ माँगने उसके घर जाता। फिर उससे विवाह करके, उसके जीवन से, मेजर पति की कमी, को दूर करने का भरसक प्रयत्न करता। 

इतना सब सोचते-लिखते हुए अब, मेरा दिमाग थक गया था। डायरी बिस्तर पर किनारे छूटी थी और मैं, अर्ध तंद्रा में बेजान सी पड़ी रह गई थी । 

अपनी अर्धनिद्रा के, दिवास्वप्न में भी, मैं, डायरी ही लिखती दिख रही थी। मैंने डायरी के कुछ पृष्ठ छोड़े थे। 

आगे के एक पृष्ठ पर दिनाँक, 18 जून 2020 लिखी थी। और फिर लिखा था कि मेरे सारे डर गलत सिध्द हुए थे। हमारी सरकार ने, ख़राब अनुभव के होने पर, शराब की बिक्री, दुकानों से बंद कर ऑनलाइन बुकिंग के जरिये, घरों तक डिलीवर करवाई थी। व्यवस्थाओं में जहाँ जहाँ, सरकार को कमी नज़र आई थी, उन्हें दूर किया गया था। नई ऐसी व्यवस्थाओं के बीच, हमारे नागरिकों ने, सजगता और राष्ट्र निष्ठा का, परिचय दिया था। 

कोरोना संक्रमण, नियंत्रित करने के मामले में, हमारा भारत, दुनिया में बेहतरीन उपलब्धि हासिल करने, में सफल हुआ। 

शौर्य, अपनी ड्यूटी पर गंभीर और खरे सिध्द हुए थे। डॉक्टर की उपाधि, उन्हें बाद में मिलनी थी, लेकिन उत्कृष्ट कर्तव्य-निर्वहन के जरिये से, वे पहले ही, सफल डॉक्टर सिद्ध हो गए थे। 

अभी ही, उन्हें लेकर हमारे जेठ ने, घर के सामने रोक, कार का हार्न बजाया है।

मैं अपने अव्यवस्थित वस्त्र और खुले बालों की चिंता किये बिना, ख़ुशी से दौड़ी घर के मुख्य दरवाजे पर पहुँची हूँ। 

शौर्य ने, मौजूद बड़ों का लिहाज किये बिना, मुझे बेसब्री से बाँहों में भींचा है। उनके सीने से लग, मेरे होंठों पर मुस्कान है, मगर आँखों से टपक रहे अश्रु, उनके सीने के, वस्त्र के, हिस्से को गीला कर रहे हैं।


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