Yashwant Rathore

Abstract Inspirational Others


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Yashwant Rathore

Abstract Inspirational Others


मान

मान

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एक विचार हममे है और बहुत गहरा है कि हम बाकी लोगों से थोड़े ज्यादा समझदार है. दूसरी तरह से कहे तो आपको अभिमान है कि आपके पास दुसरो से ज्यादा ज्ञान हैं. और आपने ये तर्क की कसौटी पर तोल के देख लिया हैं और आपको बात ठीक भी लगती है.

क्योंकि आप जिनसे मिले हो, उनकी परेशानियां आपने हल की है और उन लोगो ने भी आपको कृतज्ञ होते हुवे अच्छा आदमी, गुरु और भगवान तक कि उपाधि दी हैं.

आप जानते हो कि आप कईयों की परेशानियां हल कर सकते हो. क्योंकि आप अपने आप को भी हैंडल कर सकते हो.

आप अपने जैसे ही लोगो से मिलते हो और आप सामने वाले कि तारीफ भी करते हो, वो भी आपकी तारीफ करता हैं. दोनों ही एक दूसरे को बुद्धिमान, हाई स्टेट ऑफ माइंड मानते हो.

अब जिनके मस्तिक के स्तर नीचे हैं ,उनके साथ उठ बैठ नही पाते. जो नीच, रेपिस्ट, हत्यारे हैं, वैसे आप नही है, इसका संतोष आपको है.

आप में एक नही, बहुत काबिलियत है. आप जहां बुद्धि से तेज़ है, वहीं आप शरीर से शक्तिशाली भी. उसके अलावा भी जिस भी फील्ड में हाथ डालते हो, वहां दुसरो से अच्छा करते हो.

आप अपनी पिछली जिंदगी को भी देखते है तो आपको अपने अनुभव ज्यादा गहरे लगते हैं और आपने जिंदगी में बहुत कुछ देख लिया है.

करीब करीब आप अपने को कृष्ण के समान, सोलह कलाओं से पूर्ण ही मानते हो.

आप परमात्मा के शुक्रगुजार भी हो कि उन्होंने आपको सही गलत की समझ दी है और नेक रास्ता दिखाया है.

साधु संतों की भी आपकी संगत है.

पर क्या ये सच्चाई है या आप ऐसा अपने बारे में सोचते है.

इतना सब अनुभव के बाद भी जिंदगी आपको नीरस क्यों लगती है.

आपका ज्ञान जिसने आप को बदल के रख दिया, क्या वो आपके अंदर से आया था

या

फिर अनुभवी इंसानों ,किताबो और गूगल से आपके पास आया और आप ने समझ लिया और जीवन मे उतार लिया.

चलो समझ तो आपकी अच्छी है. ये तो आपकी खुद की ही है?

अगर आप उस बच्चे की तरह पैदा होते जिसे आजकल स्पेशल चाइल्ड कहा जाता है. तब क्या होता?

यानी समझ भी प्रकृति से मिली है.

अगर शरीर मे कोई ऐब रह जाता, एक आंख, एक पैर, एक हाथ छोटा बड़ा तो क्या आप इतने ही शक्तिशाली होते.

इसलिए दुर्गादास, गुरु गोबिंद सिंह जी, शिवाजी महाराज व्यक्तिगत वीरता के गुलाम नही थे.

गुरु गोबिंद अपने बुद्धि बल व शारीरिक बल को कभी भी अपना न मानते थे, वो आंतरिक तोर से प्रभु ,प्रकृति जो भी आप कहे,उसके सामने नतमस्तक थे.

आपके पास जो ज्ञान है वो ही असल ज्ञान है इसका भी आपको मान है क्योंकि वो आपके आदर्श पुरुष, धर्म या परिवार से आपको मिला हैं.

पर क्या आपको फ़टे जूतों में दस तरह की सिलाई करनी आती है. या एक गांव का ग्वार अपने 100 ऊँटो के पैर के निशानों में अपने खोये ऊंट के पैर के निशान पहचान लेता है. 30 साल ऊंट चराते हुवे उसके सेन्सेस( इन्द्रिय समता) विकसित हुवे है.

एक आदमी बड़े तेज़ चाल में चल रहे हारमोनियम को सुनने मात्र से, बिना एक सेकंड की देर लगाए, सारे सुर गाके सुना देता है.

एक छोटा बच्चा भी कई परिस्थितियों को आपसे अच्छे ढंग से संभाल लेता है, आप अब गुस्से और जानकरी के बोझ में वो लचीलापन खो चुके हो.

लेकिन आपको आपका ज्ञान ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि वह जीवन की वास्तविकताओं और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुवा है. क्या ऐसा नही है?

आप अपने आप को शिवाजी महाराज की तरह मानते हो, आपको लगता है जैसे उनका ज्ञान, उनके भाव आप मे उतरे हो. और क्या की कोई आंगिक के शिक्षक आपको कहे कि आपकी आंगिक भाषा थोड़ा लड़की या किन्नर की तरह है.

क्या 100 लोगों की नज़रों में आपकी इमेज अलग अलग नही हो सकती. आपको कोई बोले भले न पर मन ही मन मानता हो कि आप एक नीच ,आलसी,मतलबी और मूर्ख इंसान हो. जो कि स्वयंम आप अपने बारे नही मानते.

लेकिन आप इतना तो मानते हैं कि आपके जीवन मे बहुत गरीबी और तकलीफे आयी जिसने आपको और मजबूत बनाया, है ना?
इसके लिए तो ताली होनी चाहिए.

पर कितने लोग है जो कॉलेज, स्कूल तक भी पहुंच नही पाते. उनकी माएं कचरा चुग चुग के उनको जिंदा रख रही हो.

और क्या जो गरीबी कोई मापदंड ही न हो?  जैसे बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण...

तो फिर तुम क्या हो.

एक नाली में दारू पीके सोये आदमी में और आप मे रत्ती भर का फर्क नही हैं.

कुछ तो फर्क हैं, नही?

हां हैं, जीवन की संभावनाओं का फर्क हैं.

इसलिए विवेकानंद हमेशा आशावादी व अति उत्साही थे. क्योंकि जीवन मे संभावनाएं है.

जिसको आप ज्ञान दे रहे हो ,वो कल आपका गुरु बन के बैठा होगा और जिसको आप गुरु मानते हो वो 70 साल की उम्र में किसी बच्ची के बलात्कार के जुर्म में सजा भुगत रहा होगा.

पर एक बात तो हैं, आपने रास्ता सही चुना है , नही?

जरा सोचिए ह्त्या तो आप भी करना चाहते थे, किसी के साथ जबरदस्ती  भी करना चाहते थे. आप सोचने में लगे थे और किसी ने कर दिया.

और जो हल्का सा फर्क आप मानते हो ,वही बस आपका मान, अहंकार घमंड हैं, उसको विदा हो जाना चाहिए.

फिर आप सबसे बात कर सकते है. सबके दिल के करीब जा सकते है. फिर आप दोस्त हो सकते है.

इसलिए बुद्ध नतमस्तक हो अंगुलिमाल के पास जा सकते है. आपको क्या लगता है ,उन्होंने एक हत्यारे को ज्ञान दिया और दस मिनट में वो आदमी बदल गया. क्या ऐसा हो सकता है ? या  क्या आपके साथ ऐसा होता है?

अंगुलिमाल से अंगुलिमाल ही मिला था और कुछ बात हो गयी थी बस... और दो बुद्ध साथ हो गए थे.

राम केवट, बन्दर, भालुओं के साथ केवट बन्दर भालू ही थे. यह तरलता , शीतलता तब ही आती हैं जब आप कुछ होते नही है.

अब क्या करे में और आप तो समझदार भी है और अच्छे इंसान भी.

Note - लेख का अर्थ बिल्कुल भी नही है कि आप कुसंगति में रहे. बस ये हैं कि आप अपने को और गहरा जान सको.





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