Yashwant Rathore

Romance Fantasy

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Yashwant Rathore

Romance Fantasy

तू ही तू

तू ही तू

10 mins
216


 ( एक बड़ा सा कमरा, जो किसी हाल से भी बड़ा हो.. 10x10 का पलंग लगा हुआ हैं. उसके बाद में भी 70 परसेंट एरिया खाली हैं. बैठने के लिए महंगे से सोफे लगे हैं..टेबल पर कई तरह के फ्रूट्स रखे हैं.. कई तरह के फूल रखे हुवे हैं..जो हर दिन बदल दिए जाते हैं..)


प्रेम : लगता हैं आज भी खिड़कियां लॉक हैं..


प्रीत : आप इतने उतावले क्यों हो. उन्होंने बोला है ना.. वह वक्त आने पर खोल देंगे.


प्रेम: हां ठीक है.. उतावला नहीं ..लेकिन मुझे ऐसा लगता है एक तरफ यहां नदी या समंदर हैं.. लहरों का शोर सुनाई देता.. दूसरी तरफ जंगल.. या बहुत सारे पेड़.. पक्षी कितना चहकते हैं ना.. 


प्रीत: हां , मुझे अक्सर एक कोयल की कूक सुनाई देती है..


प्रेम: कोयल! अजीब बात है मुझे चिड़िया के चहकने की.. मोरनी की हूक .... और भी बहुत सारे पक्षी होंगे ..सब की बहुत मधुर आवाजे सुनाई देती हैं.. कोयल की कूक ,मैंने ध्यान नहीं दिया ..आज ध्यान से सुनूंगा.. इसलिए बाहर निकलना चाहता हूं


प्रीत: क्यों! आपको मेरे साथ अच्छा नहीं लगता यहां, फैसेलिटीज भी तो अच्छी है .. ..फ्रेश फ्लावर्स , फ्रेश फ्रूट्स ..हर दिन आ जाते हैं.. एयर कंडीशंड रूम हैं.. और आप हैं..


प्रेम: नहीं ऐसा नहीं है ..मुझे आपके साथ बहुत अच्छा लगता है, लेकिन.. लेकिन फिर भी.. मैं कौन हूं... आप कौन हैं ..हमारे नाम क्या हैं?..आप जानते हैं..


प्रीत: नहीं.. मुझे भी नहीं पता ..लेकिन आपको जब देखा.. मुझे डर नहीं लगा ... आप अजनबी नही लगे ..फिर आपसे बातें शुरू हुई.

 अब ठीक है.. उन्होंने कहा है ना.. धीरे-धीरे खुद ब खुद पता लग जाएगा। मुझे यह लोग खराब नहीं लगते.. उल्टा अच्छे ही है।


प्रेम: हां अच्छे ही है लेकिन हमे साथ रहते काफी दिन हो गए हैं और हमें बाहर भी नहीं जाने दिया जा रहा ..


प्रीत: यह सब छोड़िए ना ...अच्छा सुनिए ...मुझे कल रात एक ख़्वाब आया.. हम दोनो ˈहज़्‌बन्‍ड्‌ वाइफ थे..


प्रेम: अच्छा!


प्रीत : आपने शायद कोई क्राइम किया था... क्या किया था ,यह पता नहीं... तो हम दोनों अपने दो बच्चों के साथ; एक बग्गी में छुप के कहीं भाग रहे थे ..फिर भागते भागते एक फोर्ट जिसका नाम मेहरानगढ़ था.. उसमे जा छुपे..


प्रेम : किसी किले में क्यो?


प्रीत : क्योंकि वहां पर बड़ा सा मेला लगा था और भीड़ ज्यादा थी.. जिससे हम लोग वहां पर छुप सकते थे... सुरक्षित रह सकते थे.. वहां पर पूजा और हो रही थी...


प्रेम: फिर क्या हुआ..


प्रीत : वहां पर भी राजा के सैनिक हमे ढूंढ रहे थे ..मैंने बच्चों को सुरक्षित जगह पर छुपा दिया था... हम फोर्ट में ही छुपने वाले थे ..आपको प्यास लगी ... मैं पानी लेने बाहर गई.. कुछ सैनिकों की नजर मुझ पर पड़ी.. मेरी वजह से आप और बच्चे ना पकड़े जाएं तो मैं वहां से भाग गई..


प्रीत-- : लेकिन फिर आपका और बच्चों का सोच... मैं फिर किले की तरफ आई ...उस समय रात के 8:00 रहे थे .. यह फोर्ट के दरवाजे बंद होने का समय था..


प्रेम : फिर!


प्रीत : आप वहां नहीं थे जहां मैंने आपको छुपाया था.. मैंने आपको आवाज दी ..आपने मेरी आवाज सुनी भी थी.. लेकिन आप मुझे छोड़कर घाटी से नीचे उतर गए और सागरिया फाटक वाले दरवाजे से..भागते हुवे बहुत दूर चले गए ..


प्रेम : अरे! लेकिन हमारे बच्चे ...


प्रीत-- : उनको मैंने छुपा तो दिया था ..लेकिन उसके बाद वो सपने में नहीं थे ..


प्रेम-- : बड़ा कहानी टाइप का सपना हैं जी आपका..


प्रीत-- : हां, हैं तो.. 


प्रेम: मन बहुत खुश हुआ ..


प्रीत : अच्छा ( हंसती हैं).. सपना ही हैं.. कोई खास बात नही..


प्रेम: : हम्मम.. ठीक है ..कोई बात नहीं ...कम से कम मुझे खुश तो हो लेने दो


प्रीत : हां होइए खुश.. बिल्कुल होइए..


प्रेम-- : मेरे साथ एक चीज़ होती हैं


प्रीत-- : क्या?


प्रेम: : अक्सर मुझे तुम्हारी आंखे दिख जाती हैं, सोते वक्त .. सपनो में.. काफी बार जागते हुवे भी.. तुम्हारा चेहरा नज़र के सामने रहता हैं.. , without any reason


प्रीत-- : मैं तो कहूंगी बहुत सुंदर बात है ये..


प्रेम: : हांजी..


प्रीत : आप मुझे इतने बड़े किले में अकेला छोड़ कर चले गए.. मुझे अच्छा नहीं लगा.


प्रेम: : ये कैसे हुआ..समझ नही आया..


प्रेम: : आदमी बीवी को तो फिर भी छोड़ दे.. बच्चो को छोड़ के कैसे भाग गया..ऐसा क्या अपराध किया होगा.... या हो सकता हैं, मेरे साथ न होने से तुम और बच्चो को कम खतरा हो, इसलिए मैं चला गया ...लेकिन जो भी हो.... मैं वापस आऊंगा..


प्रीत-- : हाय रे दैया ! मतलब बीवी को छोड़कर जाने का कोई गम नहीं.

..

प्रेम: -- : गम तो होता ही हैं, आदमी कहे भले ना, लेकिन अपनी बीवी बच्चों को ,परिवार को सुरक्षित देखना चाहता हैं..


प्रीत-- : हां ,यह सही बात है..


प्रेम: : कोई वजह होगी, पता करूंगा.. मैं तुम्हे छोड़ के क्यों गया?


प्रीत-- : अरे कोई बात नहीं सपना ही तो था..


( Next Day).


प्रेम : मेरे साथ कल एक अजीब सी बात हुई..


प्रीत : जैसे कि..


प्रेम : जैसे की , मैने भी सपना देखा, फिर तुम्हारे सपने में चला गया... जहां से तुम छोड़ के गई... बाद में मेरे साथ क्या हुआ, जानती हो! ... सारी घटनाएं बैकफ्लैश में देखी.. तब कुछ कुछ पता लगा.. कुछ कुछ धुंधला था..


प्रीत-- : अरे ऐसा थोड़ी होता हैं...


प्रेम: : मेरे साथ क्या हुआ .. सुन तो लीजिए


प्रीत-- : अच्छा ठीक है आप बताइए..


प्रेम: : मुझे ठीक-ठीक याद नहीं की... मेने तुम्हे पहली बार किधर देखा था..हम कैसे मिले..हमारी शादी कैसे हुई.. जहां तक मुझे सपना याद आता हैं...तुम पे राजा का बेटा मरता था... और इस वजह से मेने उसे कुश्ती में पटक पटक के मारा था...उसके बाद ही तुमने मुझे देखना शुरू किया.. नही तो हजारों नज़रे तुम्हारी तरफ थी... उसमे से मेरी छोटी आंखों पर तुम्हारी नज़र क्यूं रुक जाती..


प्रीत-- : हाए...बोलते रहो ..


( प्रेम जैसे होश में नहीं.. वो बोले जा रहा हैं)..


प्रेम: : याद हैं तुम्हे ..जब सखियों के साथ तुर्जि के झालरे पर पानी भरने आती थी... वहां पे पुरुषों का आना मना था.. लेकिन उधर जो पेड़ हैं ना... जहां कोयल बोलती थी और तुम उस तरफ देखती थी.. वहां में छुपा रहता था.. याद हैं तुम्हे कभी कभी कोयल ज़्यादा भी बोलती थी..


( जैसे प्रीत भी होश खो चुकी थी...सुने जा रही थी...)


प्रेम: : मैं अक्सर शहर की उन गलियों से गुजरता था.. जिन पर तुम चली हो... तुम्हारे साथ चलने का ऐहसास होता था..

 तुम्हे मेला याद हैं..जयपुर से व्योपारी आते थे.. तुम्हे चूड़ियां, झुमके और पायल पसंद थी.. मैं भी वही सब खरीद लेता था.. सोचता था.. कभी तुम्हे..

लेकिन तुम एक नज़र भर के देखती थी.. इठलाते हुवे चली जाती थी..मुझे देख कर इतनी हसती क्यों थी?


प्रीत-- : क्योकी तुम मुझे नज़रे चूरा कर देखते थे ... और जब तुम पकड़े जाते थे ....तो भाग जाते थे

 फिर तुमने पहली बार मुझे शादी की रात, मुँह दिखाई मे.. तोहफे मे.. ये सब दिया था..


प्रेम: : ऐसा नहीं है की मैं मेले में तुम्हारा हाथ नही थाम सकता था.. मैं इन लोगो से नही डरता था..डरता था तो तुम्हारी नाराज़गी से, अपना बनाने वाली तुम्हारी आंखों से और मेरे दादाजी से भी.. वो भी तो साथ आते थे ना..


प्रीत-- : मारे शर्म के तुम्हारी आँखे झुक जाती थी..


प्रेम: : हां, और तुमने कहा था..मुझे कबसे जानते हो.. मैने कहा था... पता नही..शायद जब से चांद बना हैं..


प्रीत-- : और दादाजी को भी खूब पता था की तुम उस मेले में उनके साथ क्यूँ आते थे ..तब ही वे मुझे गुस्से की नज़रो से देखते थे..

 और उस रात तुमने पहली बार मेरी आँखो मे देखा था..


प्रेम: : हां ,तब सब कुछ रुक सा गया था, या सब कुछ खो सा गया था... समय.. मैं .. बस बची थी तो सिर्फ तुम.

 मैं तुम था या तुम मैं.. उस रात कोई नही कह सकता था.. या दो थे ही नहीं..क्या योग इसी को कहते हैं..

 दादाजी शहर में फैली वो बात सुन चुके थे .. राजकुमार की नज़र तुम पर हैं और नज़र कितनी बुरी बला हैं वो जानते थे.. ऐसा नहीं की वो तुमसे गुस्सा थे.. वो हम दोनो के खिंचाव को जानते थे.. और दोनो के लिए वो डरते थे..


प्रीत-- : हा, तभी जब हमारी शादी के खिलाफ पूरा परिवार था.. तब दादाजी ही हमारे साथ थे..


प्रेम : हां..

उस रात से दो बच्चो तक का सफ़र.. वो समय क्या था... जैसे बारह महीनो सावन, जैसे मौसम में मिसरी घुली थी...


प्रीत-- : और जैसे चाँद मुस्कुरा रहा हो..


प्रेम: : तुम्हारी चूड़ियों की खनक से चांद शरमा जाता था..तुम्हारी पायल की छमक से सूरज ताल मिला के चलता था.. जैसे शिव ने सालो बाद समाधी तोड़ी हो और पार्वती का आलिंगन किया हो..


प्रेम: : जैसे फूल हवाओं में तैर रहे हो और तितलियां सुंदर धुन में नाच गा रही हो..

संयासियों ने केशरी चोला त्याग कर फूलों का शृंगार कर लिया हो..


प्रेम: : बस तुम थी..तुम्हारे बालों की महक, बदन की नरमायी.. सुबह तुम्हारे टूटे बदन की वो अंगड़ाई..


प्रीत-- : मेरा वो चूड़िया, पायल, वो बिन्दी सब तुम्हारे लिए ही तो था। मेरे लिए तो शिव भी तुम और चाँद भी तुम। मेरा जन्म ही तुमसे प्रेम करने के लिए हुआ था।


प्रेम: लेकिन मुझे आज भी याद नहीं की उस दिन क्या हुआ.. जब तुम मेरे लिए ज़माने से लड़ रही थी.. हम दोनो भाग रहे थे... तुम वापस आने का कह कर गई.. और फिर मैं अकेले ही भाग रहा था..


हां, याद आया..धूनी बाबा ने मुझसे कहा था की तुम दोनो.. आज के नही..अभी नही मिले.. हमेशा से साथ हो..जीवन को ही सत्य, प्रेम बनाने में लगे हो..लेकिन सफ़र आसान न होगा..


प्रीत-- : काश आज धूनी बाबा होते... हमने कितनी बार उनकी तपती धूनी के पास.. चांद को निहारते हुवे...सर्दियों की वो ठंडी राते गुजारी थी..


प्रेम: : धूनी बाबा ने कहा था, तुम्हारी लड़ाई तो खुद प्रकृति और परमात्मा से हैं... बूंद सागर में मिल ,सागर हो जाती हैं.. तुम दो बूंदे मिल, सागर हो जाना चाहती हो...


 मैने उनसे पूछा भी ,की हुवे या नहीं? और वो मुस्कुरा उठे... बोले तुम्हारा प्रेम ही तुम्हारा कवच है.. वो तुम दोनो को क्षमता देगा, रक्षा करेगा.. फिर तुम्हे मैने अकेले क्यों छोड़ दिया?


प्रीत : पता नही...


प्रेम: : याद हैं तुम्हे ,मैं जयपुर गया था..तुम्हारे लिए सितारे और काँच लगा लहंगा लाया था.. जब तुम उसे पहन के घूमर करती थी...

हम दो थे तो जीवन था.. हमारे होने का मतलब था...अकेले तो मैं नहीं.. तुम नही..कुछ भी नही..


प्रीत-- : और उन काँच की खास बात पता है क्या थी?


प्रेम: : क्या?


प्रीत-- : की घूमर करते वक़्त उन काँच में तुम ही तुम दिखाई देते थे..


प्रेम: : हां, उस दिन तुम राधा बनके नाची थी... पसीने से तर बतर..पर तुम मोहिनी सी.. नाचे ही जा रही थी.. और सब लोगो के सामने .. मुझे कैसे बाहों में भर लिया... मैं घबरा गया था.. शायद सब देख रहे होंगे..पर पता नही..तुम्हारी आंखों से नज़र ही नहीं हटी.. उस दिन तुमने मुझे आगे बढ़कर..अपने गुलाब.. मेरे होटों पर... बाक़ी सबने भी कांटो का काम किया.. घर जैसे वृंदावन का बाग बन गया था..


प्रीत-- : मुझे भान नही था लोगो का.. मै तो अपने ..कान्हा के लिए .. कान्हा से रास ... 


प्रेम: : दादाजी अक्सर कहते थे..दुकान चलो..सोता ही रहेगा क्या?... हां, अक्सर मैं सो जाता था.. खो जाता था.. तुम्हारी बाहों में... तुम्हारी बाते सुनते हुवे, जिंदगी जैसे portrait mode पे चल रही थी...सब कुछ धुंधला हो जाता था..दुकान भी, दादाजी की आवाज भी.. शहर भी.. बस तुम थी..बस तुम ..


( अचानक प्रेम कहते कहते रुकता हैं, ज़मीन पर घिर पड़ता हैं)

( प्रीत पानी के छींटे मारती हैं.. प्रेम को पानी पिलाती है )


प्रेम : प्रीत..


प्रीत : हां ,प्रेम..


प्रेम: मैं तुम्हें छोड़ के नही भागा था प्रीत.. राजा के बेटा उसी दिन राजा बना था...वो मेले में सब को.. निर्दोषों को भी मार देते.. मुझे सामने आना पड़ा...

बच्चे अपनी आंखों के सामने मुझे.. मरते न देख ले.. इसलिए मैं वहा से..


प्रीत-- : हां... हां...हां.. ( रोती हैं)


और मैं ये जुदाई बर्दाश्त ना कर सकी और चली आई तुम्हारे पास...

हमारे बच्चो को दादाजी के पास छोड़ कर..


प्रेम: : रोओ मत प्रीत.. लेकिन फिर भी देखो ..हम मरे नही..हमारे प्रेम ज़िंदा हैं.. हमारे बच्चे..हमारे एक होने का सुख..


प्रीत-- : तुम इतना प्रेम क्यूँ करते हो ,प्रेम..


प्रेम: : क्योंकि तुम प्रेम थी... बस प्रेम..


प्रेम: : अब तो समझ भी नही आता प्रीत, की मैं था, तुम थी या बस प्रेम था..


प्रीत-- : तुम और मै ही तो प्रेम है..


प्रेम: लेकिन हम अभी है कहां ..


प्रीत: मुझे कल जब  सपना आया , तभी इन लोगो  ने बताया कि ..हम वहां हैं जहां प्रेमी होने चाहिए... एक साथ में...ये लोग इसे Heaven या स्वर्ग कहते हैं..

मैं इंतजार कर रही थी ..बस तुम्हे सब याद आ जाए.. तुम लौट आओ मेरे पास..  

क्या अब भी तुम इन खिड़कियों को खोलना चाहोगे?

इनके पार वैभव हैं, अपार सुख हैं..


प्रेम: नही.. हम चले वापस अपनी धरा पर.. फिर से प्रेम करने के लिए.. बार बार प्रेम करने के लिए..


( दोनो विलीन होने लगते हैं....)


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