Harish Sharma

Abstract


4.5  

Harish Sharma

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लॉक डाउन में दोस्तों की यादें

लॉक डाउन में दोस्तों की यादें

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इस लॉक डाउन में बीते दिन और बीते मित्र एक दूसरे को बहुत याद आ रहे हैं। अच्छी बात है कि मित्रों को खोजने के लिए अब फेसबुक है,व्हाट्स ऐप ग्रुप्स है। इन सब पर बहुत सी पुरानी यादें तस्वीरों और किस्सों के रूप में खूब शेयर की जा रही हैं। हर कोई किसी न किसी मित्र के बारे में पूछ रहा है। अठारह साल या उससे भी पहले की स्मृतियां। कितना कुछ बदल गया है पर वो दिन जैसे अभी कुछ दिन पहले की बात हो। कुछ मित्रों ने न जाने कैसे मोबाइल नम्बर ढूंढकर नए ग्रुप्स बना दिये है,अब खूब चैटिंग और शेयरिंग हो रही है। शरारतों,नजदीकियों और दिल्लगी के भूले बिसरे किस्से खूब चर्चा में हैं। जैसे सब जिंदगी की रील को उल्टा घूमाने में लग गए है। मुझे भी कुछ अधूरे नाम,अधूरे किस्से याद आते है। कुछ को बहुत बेचैनी से फेसबुक पर तलाशने की कोशिश की है पर ....कई किस्से ऐसे होते हैं,जिनकी निरंतर तलाश ही उनकी नियति है।

 बीते दिनों की बात है,एक मित्र को उसके घर मे की गई एक वीकेंड पार्टी में हारमोनियम पर गाते हुए सुना तो बहुत से दृश्य आखों के सामने घूम गए। यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए ,होस्टल के वो दिन। जब हम सब जाने अपने आप मे बहुत कुछ थे। दुनिया रंगीन थे। दिन खुशनुमा और राते हसीन सपनो में डूबी हुई गुनगुनाया करतीं। हमारा एक दोस्त इसी तरह हारमोनियम बजाता हुआ गुलाम अली की गजलें देर रात तक सुनाया करता। 'दोपहर की धूप में....मेरे बुलाने के लिए......' वाह क्या पल थे,क्या दिल मे उठती लहरिया थी और क्या चेहरे थे जो आंखों के आगे छाया करते थे।

हम सब ज्यादातर भाषाओं,संगीत और ललित कलाओं के छात्र थे। एक लड़के का शौंक पेंटिंग था वो अक्सर यूनिवर्सिटी के अलग अलग कोनों का स्केच उतारा करता,घण्टों बैठ कर उन्हें रंगों से भर देता। लगता जैसे दिखने वाला दृश्य किसी ने बड़ी बारीकी से कट कॉपी पेस्ट कर दिया हो। ये बात अलग है कि वो मित्र पहले साल ही फेल हो गया,उसे फाइन आर्ट्स की लिखित परिभाषाओं को रट्टा लगाना नही आया।

होस्टल क्या था,जैसे एक आध्यात्मिक कम्यून। सुबह दस बजे के बाद जब सब अपने अपने डिपार्टमेंट चले जाते तो यही कम्यून किसी उजाड़ की चुप्पी से अपने को ढँक लेता। दोपहर के भोजन पर रौनक लौटती। प्रवेश द्वार के भीतर जाते ही मेस का पूरा वातावरण खाने की खुशबू से महकता। ये खुशबू और कही नही मिली। जाने क्यों,जैसे उस खुशबू में छात्र मित्रो की खिलखिलाती हसी और बेबाक किस्सों का तड़का शामिल था। खाना खाकर सब अपने कमरों में आराम फरमाते। कुछ कॉमन रूम में बैठकर फ़िल्म देखते या कैरम बोर्ड खेलते,सुबह के अखबार में खो जाते। आर्ट्स वालो को डिपार्टमेंट नही जाना होता था पर विज्ञान वालो को दो घण्टे चलने वाले प्रेक्टिकल के लिए जाना पड़ता। 

हमारे पास दोपहर निकालने के लिए किस्से होते,मजाक होते,ऊंचे ठहाके होते,किताबें होती और सुस्ताते पढ़ते कुछ नींद होती। कुछ पढ़ाकू लाइब्रेरी चले जाते। शाम साढ़े चार बजे हॉस्टल में चाय का दौर चलता,ब्रेड पकौड़े और समोसे के चुनिंदा दौर होते। इस चाय से सभी छात्र कुछ गुटों में बट जाते। एक खेल मैदान की तरफ फुटबाल खेलने,एक गर्ल्स हॉस्टल तक चक्कर लगाने और वहाँ जाकर अपनी मित्रों के साथ गप्पे लड़ाने,आंख लड़ाने या किसी नए रोमांस की सम्भावना खोजने निकलता। कुछ यूनिवर्सिटी की छोटी मार्किट में ही मिलन स्थल खोजते और वहां से कई शांत कोनो में जाकर प्रेमी प्रेमिकाओं वाला संवाद रचाते। इस पूरे माहौल में भी कुछ के लिए लाइब्रेरी भी आनन्द देने वाला स्थान थी। यहां इश्क और मुलाकातें किताबो के रास्ते निकला करती थी। यहां जूनियर,सीनियर छात्र,अध्यापक पुरानी नई किताबो के पन्नो की सीली जर्द महक से जीने की ऊर्जा पाते थे। यहां किताबों में लगे बुकमार्क और उनके पन्नो में रखे गुलाब बहुत सी कहानियों के जीते जागते सुबूत थे। यहां प्यार बड़ा पोशीदा और शांत था। रीडिंग हाल की पिन ड्राप साइलेंस में भी इतने चुपके से फुसफुसाता कि उसके अर्थ डिकोड हो जाते। लगता जैसे भाषाएं और शब्द के मायने बहुत बेकार है। प्रेम के लिए इनके शोर से ज्यादा केवल इशारे भर काफी हैं। 'आंखों ही आंखों में इशारा हो गया,बैठे बैठे जीने का सहारा हो गया।'

लाइब्रेरी के बाहर कैफे जैसे उन लोगों के लिए था जो अभी चुप्पियों में बिना चुस्कियों के रहने के आदी नही थे।

शाम जैसे जैसे ढलती ,यूनिवर्सिटी में पक्षियों की चहचहाहट का संगीत जैसे किसी पलायन संगीत के रूप में बजता। किताब,बतकही,प्रेम और ठहाके कुछ देर के लिए वापस अपने हॉस्टलों में लौट जाते। लिंग भेद उन्हें समय की सीमाओं में बांध कर रखता। 

हमारे बॉय होस्टल में तो कोई नहाने लगता तो कोई रात के खाने से पहले अगले दिन के लिए अपने कपड़े सम्भालने लगता। कुछ सीनियर्स विशेष द्रव्यों के सेवन में लग जाते। नए आये छात्र अपनी सलेब्स की किताबों के पन्ने पलटते। 

रात के खाने के बाद यूनिवर्सिटी गेट तक सैर होती ,बातें होती,नए प्रेम प्रसंगों के किस्से होते और वीकेंड पर घर जाने या न जाने के सलाह मशविरे होते। इन सबके बीच ठहाकों के लिए बहुत से किस्से उछाले जाते।

एक रात इसी तरह सैर से लौटने के बाद कुछ सीनियर्स के साथ एक शोध छात्र के कमरे में जाना हुआ। उसका होस्टल हमारे होस्टल से आगे था। सुना था कि यहां सब भूत रहते हैं। ज्यादातर शोध छात्र। यहां ज्यादा सगोर नही होता, बस गम्भीरता छाई रहती है। इसकी सुविधाएं भी तोफा अलग थी।

शोध छात्रों को एक स्पेशल रूम मिलता था,होस्टल के आम कमरों से बड़ा। शौचालय की व्यवस्था भी कमरे में अटैच्ड थी। वाश बेसिन और शीशे की व्यवस्था भी इस कमरे को स्पेशल बनाते। शोध छात्र रसायन विज्ञानं का था। पर पहली बार जाकर अनुभव हुआ कि कई विज्ञान उस कमरे में शोभायमान थे। ओशो की दीवार पर चिपकी तस्वीरें ,हारमोनियम की व्यवस्था,अंग्रेजी अखबार और देबोनोइर मैगजीन के हसीन कवर और कव्वाली के शहंशाह नुसृत् फतेह अली खान की आवाज से लेकर मेहँदी हसन,अताउल्लाह खान,और क्लासिक इंस्ट्रुमेंटल के टेप्स। ऐसा लगता कि ये आदमी विज्ञान के शोध में मां बाप की डिफॉल्ट सेटिंग के चलते आ गया है। वैसे भी आजकल ज्यादातर छात्र अपनी रुचियों के कारण नही,बल्कि भविष्य में अच्छी सेटिंग हो जाने की डिफॉल्ट सेटिंग के हिसाब से विषय चुनते हैं। उन पर वर्तमान से ज्यादा भविष्य का दबाव होता है कि आगे क्या होगा।सम्पन्न परिवारों से आने वाले छात्रों का होना बहुत जरूरी है,क्योकि शायद उनके कारण आनन्द और उत्सव की कुछ तस्वीरें बची रहती है। उन्हें भविष्य की ज्यादा चिंता नही होती। वे सिर्फ इसलिए पढ़ने आये हैं ताकि दीं दुनिया को देख समझ सके,लोगों के बीच रहकर उनकी आमफहम जरूरतों को महसूस कर सकें। एक अच्छा बिजनेस सम्भालने के लिए इतना तो जरूरी ही है।

ये शोध छात्र भी सम्पन्न परिवार का लड़का था,पर बदकिस्मती से इसके माँ बाप नौकरीपेशा थे और एक अच्छे माँ बाप की तरह अपने बेटे के लिए एक बढ़िया नौकरी पा जाने की उम्मीद करते थे।

उसके कमरे में कभी शाम को जाना होता तो सिगरेट के धुएं के बीच कभी गीत संगीत की श्रेष्ठताओं को सुनकर झूमा जाता तो कभी शेखर एक जीवनी की बात करते करते शोभा डे और खुशवंत सिंह के लेखन पर बात चलती। दर्शन का केंद्र आचार्य रजनीश थे ही। पंजाबी,अंग्रेजी ,मनोविज्ञान और भौतिक शास्त्र के मित्र वहाँ हफ्ते में एक बार आते। चाबी दरवाजे के ऊपर ही रख दी जाती कि अकेलेपन का आनन्द लेना हो और कमरा बन्द हो तो उसका बेझिझक प्रयोग किया जा सके। कई बार ऐसी महफ़िल जमती कि समय का पता न चलता और मेस से खाना ऊपर मंगवा लिया जाता। स्पेशल खाने के शौकीन मेस के बहादुर को पटा के रखते और रात को मेस बंद होने के बाद मनचाहा सामान बनवा लेते। यहां जुटने वाले सब मित्रों में एक विशेषता यह थी कि सब घनघोर पाठक और बहस बाज थे।

 उनमे से एक बिल्ली आँखों वाला मेरा मित्र विक्रम मुझे आज भी याद है। विज्ञान का छात्र था और उसकी रुचि बिज़नेस में थी। लाइब्रेरी में बिजनेस स्टैण्डर्ड मैगजीन के पन्ने पलटता। उसे रेस्टोरेंट बिजनेस बड़ा अच्छा लगता। उसी के बारे में स्कीम बताता रहता और सपने देखता। वीकेंड पर वो चिकन खरीद लाता। मेस के बहादुर से सेटिंग कर रखी थी। जब रात साढ़े नौ बजे तक छात्रों के लिए मेस बंद हो गई तो बहादुर के साथ किचन में चिकन बनाना शुरू हुआ। तब तक समय पास करने के लिए बीयर थी और बहादुर की टेप पर चलते पहाड़ी गीत। बहादुर के पास चिकन बनाने की कला थी। विक्रम ने ये कला उसी से सीखी। वाकई जब कोई बहादुर का बनाया चिकन खाना शुरू करता तो वाह वाह करता।

विक्रम का मन भी बड़ा चंचल था। जब उसका कोर्स खत्म हुआ तो विदेश जाने का भूत सवार हो गया। इसी चक्कर मे विदेश से एक रिश्ता आया तो अपनी रिसर्च बीच में ही छोड़ कर विदेश जा बैठा।आजकल कुछ सालों बाद फेसबुक पर मिला तो पता चला कि खुद का रेस्टोरेंट खोलकर बढ़िया बिज़नस कर रहा है। बहादुर के चिकन वाली डिश भी उसके मेन्यू में शामिल है और उसकी खूब डिमांड है। 


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