Dr. Anu Somayajula

Abstract


2.8  

Dr. Anu Somayajula

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कुएं की चौपाल

कुएं की चौपाल

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कुछ अजीब लग रहा होगा आपको। ‘कुआं’ कुंआ है और ‘चौपाल’ चौपाल – कुछ बेमेल सी बात है। हमने अपने गांव का यही नाम रखा है “ कुएं की चौपाल वाला गांव “। ये कैसा नाम हुआ! चलिए आप कुछ और रख लीजिए। अंततः आपको सहमत होना ही पड़ेगा कि हमारा गांव औरों से निराला और अनोखा है। लगता है आपकी उत्सुकता जाग उठी है। चलिए, आप को पूरी बात बताते हैं।

।ये तो आप मानते हैं कि अमूमन हर गांव का ढांचा एक सा ही होता है। एक छोटी सी मुख्य ( ?) सड़क, कुछ कच्चे पक्के घर संभ्रांत परिवारों के रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए एकाध दुकान और एक कुआं। कभी कोई तालाब या छोटी मोटी नदी भी। गांव से दूर कुछ झोपड़ियां। हमारा गांव भी पहली नज़र में कमोबेश ऐसा ही दिखता है। एक छोटी सी कच्ची पक्की सड़क जिसके दोनों तरफ़ भद्रजनों के कुछ घर हैं। सरपंच जी, मुखिया जी , पंडित जी , मास्टर जी और वैद जी वगैरह यहीं रहते हैं। इसे ऊपरी टोला या ऊपर वालों का टोला कहा जाता है।

।सड़क के मुहाने पर परचून की दुकान है। रोज़मर्रे की ज़रूरत का सारा सामान लोग यहीं से लेते हैं। सड़क दूसरे छोर पर कुछ हटकर एक कुआं है – “ऊपर वालों का कुआं”। सुरक्षा और सफाई का यहां पूरा ध्यान रखा गया है। पक्की जगत बनी है, चारों ओर सिमेंट का घेरा है जिसके चारों ओर ईंटें जड़ दी गई हैं। गांव की महिलाओं की यहां बैठक जमती है काम के बीच सुख दुःख बांटे जाते हैं, सास बहू के किस्से साझा होते हैं, पतियों की चुगली और बच्चों के भविष्य पर गहन चर्चा भी होती है। समान्य सी बात, अलग क्या है ?

।इससे आगे हलकी सी ढलान पर एक और कुआं है - छोटी सी ईंटों वाली जगत से घिरा। कुछ दूरी पर गोबर लिपे रास्ते के दोनों ओर छिटकी हुई कुछ झुग्गियां हैं मवेशियों के बेढ़ंगे से दड़बे हैं और है एक बड़ा सा नीम का पेड़ - इन झोपड़ियों बनने-टूटने का, लोगों के सुख दुःख का निरपेक्ष साक्षी। निम्न वर्ण के लोग यहीं बसते हैं। इसे निचलों का टोला कहते हैं।

।चलिए, यह तो हुआ गांव का जुगरफिया। अब आपका गांव से असली परिचय कराते हैं। हमारे गांव में बड़ा एका है, भाईचारा है, कई मानों में सर्व सम भाव है। इन बातों समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि शहर और गांव की मानसिकता में कुछ बुनियादी फ़र्क है। शहरों में इस तरह के टोले नहीं होते। लोग इस तरह घुले मिले होते हैं कि कुछ पता ही नहीं चलता। पर गांवों में लोग अब भी पुरानी परंपराओं को (मानें या न मानें) निभाने में विश्वास रखते हैं। ऊपरी टोले वाले हमसे ऊपर हैं, सम्मान के पात्र हैं यह बात निचलों को घुट्टी में पिलाई जाती है। वैसे ही निचली टोली वाले नीचे ही रहने चाहिए, बराबरी में बिठाये नहीं जाते इन विचारों की घुट्टी पी कर ऊपर वाले बड़े होते हैं। हमारे गांव पर भी यह बात शत प्रतिशत लागू होती है – फ़िर भी....! चलिए एक कर बातों को समझते हैं।

।परचून की दुकान से ही आगे बढ़ते हैं। बनिए का मानना है कि जीने का और जीने के लिए खाने का सब को हक़ है। परंतु गांव की मर्यादा भंग न हो इसलिए उसने सीधा देने का एक रास्ता निकाला। नियम हुआ, निचली टोली वाले तब आएं जब ऊपर वाले आ कर चले जाएं। कभी आवश्यकता वश बीच में आ भी गए तो दो हाथ की दूरी बनाए रखते फिर आगे आते। उन्हें किंतु दुकान के पास आने या किसी चीज़ को हाथ लगाने का अधिकार नहीं है। उन्हें अपने साथ एक टोकरी लानी पड़ती। जो भी सामान बताया जाता पुड़िया बांध कर टोकरी में उछाल दिया जाता। निशाना अचूक, शायद ही कभी कोई पुड़िया खुली हो या छूटी हो। अन्न कभी नीचे नहीं गिरना चाहिए ऐसा बनिये का मानना है। दाम वही जो औरों के लिए। आखिर ईमानदारी भी कोई चीज़ है !

।वैदजी तो भगवान का ही दूसरा रूप हैं। ऊपरवाले जो मर्ज़ी दे दें, निचलों का इलाज मुफत ही करते, पुण्य कमाते। अब उन्हें छुआ तो नहीं जा सकता है इसलिए नाड़ी जांचने का अनोखा तरीका ढ़ूंढ़ निकाला। माचिस की डिबिय़ा पर रेशम बांधकर फेंकते, मरीज़ से कहते अपनी कलाई मपर लपेट ले।

दूसरे सिरे को थाम नब्ज़ जांच लेते। रेशम पवित्र है इससे उन्हें दोष न लगता। फ़िर वही- पुड़िया बंधती है, उछाली जाती है और दवाई खाने का तरीका बताताया जाता है। आप सोचते होंगे हर बीमार के लिए अलग रेशम कहां से आता होगा। तो भई, यह भार पंड़ित जी के ज़िम्मे है। पंड़ितजी जब भी किसी के यहां पूजा पाठ कराने जाते, तो दक्षिणा के साथ रेशम की डोरी का लच्छा भी मांग लेते। लाकर वैदजी को देते, कुछ पुण्य का हिस्सा पाते। बदले में वैदजी पंडितजी और उनके परिवार का मुफत इलाज करते। ऐसी सहयोग की भावना आपने न देखी न सुनी होगी। शहरों में भी आजकल मुफ्त इलाज के लिए आए मरीज़ को देख कर डॉक्टर का चेहरा उतर जाता होगा।

वैसे निचली टोली की जमात को कहीं भी लिखने पढ़ने की आज़ादी नहीं के बराबर होती है। पर हमारे गांव की क्या कहिए ! अगर कोई पढ़ना चाहता तो कक्ष के दरवाज़े के बाहर बैठ सकताहै। मास्टरजी का कहा कुछ कानों पड़ जाए तो बच्चा धन्य हो गया ! किंतु ये न समझा जाए कि निचली टोली के लोग मुफ़त में सब पाना चाहते हैं। स्वाभिमान इनमें भी कूट कूट कर भरा है। कभी किसी का आंगन झाड़ दिया, लीप दिया, लकड़ियां काट दीं, मवेशी चरा दिए - जैसी जिसकी मांग।

।एक बार की बात है, ऊपर वालों के कुएं में एक छोटा बच्चा गिर गया। अब किसका बच्चा था, कैसे गिरा, किसीने देखा क्यों नहीं जैसे दीगर प्रश्नों को छोड़िए। बात इतनी सी है कि इस कुएं में गिरा है तो इधर वालों का ही होगा। अब जो सवाल मुंह बाए खड़ा था वो ये कि अब क्या किया जाए ?

पानी कहां से आएगा, सारे काम कैसे निपटेंगे। दूसरा कुआं भी तो नहीं था। जो था उसका पानी इधर वाले कैसे उपयोग में लाते। पंचों ने गहन चर्चा और विचार के बाद रास्ता निकालने, उपाय बताने का दायित्व पंडितजी को सौंप दिया। पंडितजी स्थिति की गंभीरता समझ रहे थे। पोथी निकाली, पंचांग खोला, कुएं और गांव की कुंडली बनाई। बहुत सोच विचार के बाद बोले महूरत अच्छा था, पानी को ज़यादा दोष नहीं बैठेगा। हवन करना होगा, कुएं में और कुएं के चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करना होगा और शांति पाठ करना होगा बस। फिर इसका पानी यथावत हो जाएगा। (हां बच्चे का शव निकालकर परिवार को सौंप दिया गया) तरंत- फुरंत तैयारियां की गईं और कुएं की शुद्धि हो गई।

।सब कुछ सामान्य हो गया। जीवन सुचारु रूप से चल पड़ा। कुछ समय पश्चात एक और दुर्घटना घटी। निचले वालों के कुएं में बिल्ली का बच्चा गिर गया। बड़ा हंगामा हुआ। बाल्टी डाल कर लाश बाहर निकाली गई। पानी के उपयोग पर रोक लगाई गई। फिर पंडितजी को बुलाया गया। फिर पोथी- पंचांग खुला, बांचा गया और जांचा गया। निष्कर्ष निकला चूंकि कुएं ने एक निरीह मूक प्राणी की बलि ली है इसलिए अब यह अशुद्ध है। इस अपराध के लिए कोई शुद्धि पाठ नहीं हो सकता अतः कुएं को तत्काल पाट दिया जाए। पंचों और पंडितजी की बात सर माथे पर, लेकिन हम क्या करें ! आपात्कालीन पंचायत बैठी। निचलों के जीवन - मरण का प्रश्न था। तय किया गया ऊपर के कुएं से एक पक्की नाली बनवाई जाए कुछ ढलान दे कर जो सिरे पर एक छोटे हौदे में पानी छोड़े। इसे ढंक कर रखने और साफ सफाई की जिम्मेदारी निचलों की होगी। ऊपरी टोले की महिलाएं जब भी पानी भरें एक बाल्टी इस नाले में बहा दें। इस तरह इस समस्या का समाधान हो जाएगा। आनन फ़ानन में काम पूरा कर दिया गया। इस उपकार के बदले निचली टोली वाले ज़िंदगी भर के लिए ऊपरवालों के चरण धोकर पीने की बात करते और ऊपरवाले अपने मानवतावाद की दुहाई देते रहते।

।ज़िंदगी फिर पटरी पर आ गई। कुआं पट चुका था, पर्यायी व्यवस्था भी ठीक चल निकली। किंतु शंकाएं राह ढूंढ़ ही लेती हैं मन में घर करने को। पंचों ने फिर सोच विचार किया। कभी किसी मंद बुद्धि या शरारती बुद्धि ने पटे हुए कुएं को खोदने की सोची तो ? अनर्थ ही हो जाएगा। इसलिए सर्व सम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इस जगह पर ऊंचा चबूतरा बनवाया जाए। धूप से बचने के लिए एक छतरी लगवा दी जाए। आगे से गांव की पंचायत यहीं बैठेगी। सरपंच जी भी ख़ुश, उनके घर के सामने अब भीड़ न होगी। तब से यह पंचायत की बैठक हो गया।

अब रोज शाम को इसी चबूतरे पर चौपाल लगती है, सारे पुरुष इकट्ठे होते हैं, दुनिया जहान की चर्चाएं होती हैं। चबूतरे के नीचे निचली टोली वाले भी आ बैठते और ज्ञान प्राप्त करते। बच्चे भी मिल जुलकर खेलते - ऊपरी टोले वाले चबूतरे के ऊपर और निचलों के नीचे। कभी कोई अतिक्रमण नहीं हुआ, कभी परंपराओं पर आंच न आई। आस पास के गांव हमारे गांव की मिसाल देते थकते नहीं हैं। यह चबूतरा हुआ 'कुएं की चौपाल' और इसी चबूतरे की वजह से हमारे गांव का नाम पड़ गया “कुएं की चौपाल वाला गांव”

अब आप पूरी बात जान चुके हो। देश विदेश घूमे हो। देखा है ऐसा गांव जहां उच्च वर्गीयों के मन में निचले वर्ग के लोगों के लिए सहृदयता है, दया है, करुणा है। जहां परंपरा के नाम पर शोषण (जैसा देखा, सुना या बखाना जाता है) नहीं होता। जहां अपने से कमज़ोर वर्ग के प्रति कोरी सहानुभूति नहीं दर्शाई जाती बल्कि दायित्व भी निभाया जाता है। आप कहोगे बिना स्वार्थ के कौन किसी के लिए कुछ करता है ! सही है जी, आज भाई भाई के बीच दायित्व बोध के पीछे स्वार्थ दिखाई देता है फिर यह तो यह दो विभिन्न वर्गों की बात है। निहित स्वार्थ, प्रत्यक्ष या परोक्ष कभी नकारा नहीं जा सकता। फिर भी कहीं न कहीं अब आप भी मानना चाहोगे कि हमारा गांव वाकई सबसे अलग और अनोखा है।


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