Dr. Anu Somayajula

Abstract


4.5  

Dr. Anu Somayajula

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को(ई) रो(को) ना...

को(ई) रो(को) ना...

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प्रिय डायरी,

एक लंबे समय से एक ही प्रश्न मेरे कानों (मैं नहीं जानता था मेरे कान भी हैं) में गूंज रहा है- ‘कौन हो तुम?’ भूल गए? तुम्हीं ने तो मुझे नाम दिया है “कोरोना”, चलो यही सही। तुमने मेरे सर पर ताज देख लिया और नाम रख दिया। किंतु मैं अभी तक नहीं समझ पाया यदि मैं अशरीरी हूं तो सर कहां से आया और जब सर ही नहीं तो ताज कैसा! खैर इतने में तुम खुश हो तो मैं रोकूंगा नहीं।

एक और प्रश्न- ‘कहां से आए तुम?’ यही प्रश्न मैं तुमसे करना चाहता हूं- कहां से आए हो तुम! तुम कहोगे पिता का बीज लेकर माता के गर्भ से, सारे जीव नर और मादा का ही प्रारूप होते हैं। होंगे, पर मेरे जैसे अशरीरी इस का अपवाद हैं। मेरे जीवतंतु एक हल्के- फुल्के आवरण में लिपटे होते हैं। किसी और के जीवतंतुओं पर अपना अधिकार जमाता हूं और अपने आप को तोड़ तोड़ कर पनपता हूं। तुम मनुष्यों की प्रजनन शक्ति सीमित है एक या दो प्रतिकृतियों की उत्पत्ति तक। अन्य जीव तुमसे कई गुना सामर्थ्यवान हैं इस मामले में। मैं तो अति भाग्यशाली हूं, पलक झपकते हज़ारों लाखों में बंट जाता हूं। मैं अनादिकाल से हूं और रहूंगा, बस अपनी पहचान बदलते रहूंगा, तुम्हें भ्रमित करता रहूंगा।

प्रकृति का नियम है, हर एक को जीने का अधिकार है। तुम भी तो आकाश- पाताल एक कर देते हो अपना अधिपत्य जमाने के लिए, अधिकार बनाए रखने के लिए, सत्ता जताने या बढ़ाने के लिए। तुम्हारे पास सक्षम शरीर है, अस्त्र- शस्त्र हैं और जब चाहो नए विध्वंसक हथियार बनाने का सामर्थ्य है। मेरे पास बस हल्का सा कवच है, छोटे-छोटे हथियारों से जड़ा (इसे ही तो तुम ताज समझ बैठे!); दूसरों के शरीर में घुस पैठने की कला और सामर्थ्य है। इतना सा फ़र्क़ है कि तुम अपने लालच के वश में घुसपैठी, मारा मारी और संहार करते हो और मेरे लिए जीवित रहने का यही एक रास्ता है। कमज़ोर शत्रु हारता है या मरता है- चाहे मनुष्य हो, अन्य कोई जीव हो या मुझ जैसे अशरीरी, परजीवी तत्व! यदि तुम मुझे मात देने या मारने के नए- नए उपाय ढूंढते हो तो मैं भी अपने अस्तित्व को बनाए, बचाए रखने के पैंतरे। हां, मैं अत्यंत ही अल्पायु हूं इसी से मेरी जिजीविशा प्रबल है।

एक आरोप और लगाया जा रहा है मुझ पर कि मैं सीमाओं का अतिक्रमण करता हूं, आक्रामक हूं। अब देखा- देखी ही कोई कुछ सीखता है। तुम अपना ही इतिहास देखो आदि काल से आज तक का। तुम भी तो किसी न किसी बहाने से अपनी सीमाएं लांघते रहे हो। सत्ता हथियाने या सीमा का विस्तार करने के लिए तुम भी आक्रमण करते आए हो। अशोक हो या अकबर, ऍलेक्ज़ांडर हो या हिटलर- तुम्हारा इतिहास तो भरा पड़ा है आक्रमणकारियों से। पुर्तगाली रहे या अंगरेज़ आए किस काम से थे और किस तरह अड्डा जमा कर बैठ गए मैं भी जानता हूं। फिर जहां आक्रमण है वहां हिंसा है और प्रतिकार या प्रतिहिंसा भी। मैं भी अपनी मर्ज़ी से लदा नहीं तुम पर। यदि तुम गांव नगर की सीमाएं न लांघते, जंगलों का सफाया नहीं करते अपने स्वार्थ के लिए, जीव जंतुओं की बलि न चढ़ाते अपने फायदे या ज़रूरतों (?) के लिए तो जंगल तुम तक आते क्यों ? मुझे भी विषम परिस्थितियों से जूझने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है, दिन रात एक करना पड़ता है, निरंतर नित नए- नए रूप बदलने पड़ते हैं ताकि मैं तुमसे एककदम आगे रह सकूं। फिर जहां अतिक्रमण वहां आक्रामकता और हिंसा- यह चक्र शुरू हुआ तो चलता ही रहेगा। परिणाम- ?

तुमने चाहे जिस भी वजह से मेरा नाम ‘कोरोनो’ रखा अब तुम कहने को मजबूर हो गए हो- “को(ई) रो(को) ना”! मेरी सद्भावनाएं और सहानुभूति तुम्हारे साथ है।                            


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